Ghughutiya Festival Story
बात उस समय की है जब कुमाऊँ में चंद राजा कल्याण चंद का शासन था। राजा की कोई संतान नहीं थी। राजा का कोई उत्तराधिकारी न होने के कारण उसका सेनापति को समझता था कि राजा की मृत्यु के बाद पूरा राज्य उसे प्राप्त हो जायेगा।
एक बार राजा कल्याण चंद बागेश्वर स्थित बागनाथ मंदिर गए और उन्होंने बाबा बागनाथ से संतान प्राप्ति की कामना की। उनकी कृपा से राजा को पुत्र प्राप्ति हुई। जिसका नाम निर्भय चंद रखा गया। निर्भय को घुघुती (जंगली कबूतर) से बेहद प्रेम था। राजकुमार का घुघूती के लिए प्रेम देख एक कौवा चिढ़ता था।
उधर, राजा का सेनापति राजकुमार की हत्या कर राजा की पूरी संपत्ति हड़पना चाहता था। इस मकसद से सेनापति ने एक दिन राजकुमार की हत्या की योजना बनाई। वह राजकुमार को एक जंगल में ले गया और पेड़ से बांध दिया। ये सब उस कौवे ने देख लिया और उसे राजकुमार पर दया आ गई। इसके बाद कौवा तुरंत उस स्थान पर पहुंचा जहां रानी नहा रही थी। उसने रानी का हार उठाया और उस स्थान पर फेंक दिया जहां राजकुमार को बांधा गया था।
रानी का हार खोजते-खोजते सेना वहां पहुंची जहां राजकुमार को बांधा था। राजकुमार की जान बच गई तो उसने अपने पिता से कौवे को सम्मानित करने की इच्छा जताई। कौवे से पूछा गया कि वह सम्मान में क्या चाहता है तो कौवे ने घुघते का मांस मांगा। इस पर राजकुमार ने कौवे से कहा कि तुम मेरे प्राण बचाकर किसी और अन्य प्राणि की हत्या करना चाहते हो यह गलत है।
राजकुमार ने कहा कि हम तुम्हें प्रतीक के रूप में मकर संक्रांति को अनाज से बने घुघते खिलाएंगे। कौवा राजकुमार की बात मान गया। इसके बाद राजा ने पूरे कुमाऊं में कौवों को दावत के लिए आमंत्रित किया। राजा ने आदेश दिया कि पूरी जनता घुघुते बनाकर कौओं को खिलाये। राजा का यह आदेश कुमाऊं में पहुंचने में दो दिन लग गए। इसलिए यहां दो दिन घुघत्या का पर्व मनाया जाता है।
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घुघुतिया त्यौहार पर प्रचलित दूसरी लोककथा
कहा जाता है कि पुराकाल में घुघुत नाम का एक राजा हुआ करता था। उस दौरान एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि मकर संक्रांति की सुबह कौवों द्वारा राजा की हत्या कर दी जाएगी। इस संकट से बचने के लिए राजा ने राज्यभर में घोषणा करवाई कि सभी लोग गुड़ मिले आटे के विशेष आकार के पकवान बनाकर अपने बच्चों से कौवों को खिलवाएँ।
राजा का अनुमान था कि पकवानों में उलझे कौवे आक्रमण करना भूल जाएंगे। प्रजा ने राजा के आज्ञानुसार मकर संक्रांति के दिन अपने बच्चों से इस ख़ास पकवान को राजा घुघुत के नाम से कौओं को खिलाया। राजा की जान बच गई और यह परंपरा चल पड़ी।
मारक ग्रहयोग टालने की जनश्रुति
एक अन्य मान्यतानुसार, पहाड़ों में एक राजा पर मारक ग्रहदशा चल रही थी। ज्योतिषी ने सलाह दी कि यदि वह कौवों को घुघुत (फाख्ता) खिलाए तो संकट टल सकता है। राजा अहिंसक था, वह निर्दोष पक्षियों को नहीं मारना चाहता था। इसलिए उसने प्रतीकात्मक रूप से गुड़-आटे के प्रतीकात्मक घुघुते बनवाकर बच्चों से कौवों को खिलवाया। तभी से यह परंपरा लोकपर्व का रूप ले गई।












