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Hari Narayan Das dedicated to Environmental Protection - पर्यावरण संरक्षण को समर्पित हरी नारायण दास।

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उत्तराखण्ड स्थित बागेश्वर मुख्यालय से करीब 45 किमी दूर गैनाड़ ग्राम पंचायत के पोखरी की सुरम्य पहाड़ी स्थित श्री गुरुगोसाईं गोरखनाथ के मंदिर में आसन जमाए 57 वर्षीय हरी नारायण दास बचपन से ही कर्मयोगी रहे हैं। उन्होंने अब तक दस हजार से भी अधिक पौधों का रोपण कर दिया है। 
कपकोट तहसील स्थित तोली गांव के हीरा सिंह गड़िया के घर जन्मे हरी नारायण दास निर्धनता के कारण कक्षा चार से आगे नहीं पढ़ सके। 18 वर्ष की उम्र में वह गूलरभोज नैनीताल जाकर सरकारी अस्पताल में वार्ड ब्वाय बन गए, लेकिन यहां उनका मन नहीं लगा और नौकरी छोड़ कर हरिद्वार चले गए। जूना अखाड़े में एक साल रहने के बाद वह पंजाब के संगरूर जिले के डंगाले खुर्जा स्थित उदासीन अखाड़े के श्री महंत बद्री नारायण दास के सानिध्य में आ गए। श्री महंत ने उन्हें दीक्षा दी। इसके बाद 1991 में दोनों भनार गांव स्थित शिखर पर्वत पर आ गए। श्री महंत के नेतृत्व में श्री मूल नारायण, नौलिंग देव सनगाड़, धोबी नौलिंग पचार के भव्य मंदिरों का निर्माण शुरू किया। भनार में बंज्यैण मंदिर के निर्माण के दौरान उनके गुरु बद्री नारायण दास ब्रह्मलीन हो गए। गुरु की आ…

Deewali of Uttarakhand-बूढ़ि दीवाली, हरिबोधिनी एकादशी और इगास .

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दीपावली के 11 दिन बाद उत्तराखण्ड में एकादशी पर्व पर इस ख़ास पर्व मनाया जाता है जिसे मानस खण्ड में बूढ़ि दीवाली और केदार खण्ड में इगास नाम से जाना जाता है। किवदन्ती है कि राम जी के आगमन की सूचना यहां 11 दिन बाद मिली थी। दूसरा यह भी कहा जाता है कि वीर भड़ माधो सिंह दीवाली के दौरान तिब्बत युद्ध क्ष्रेत्र में थे और आज के ही दिन जीतकर लौटे, इसलिए दोबारा दीवाली मनाई गई। आज का दिन वैसे यहां हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, सुबह पशुधन पूजा जाता है शाम को पकवान बनाये जाते हैं, फिर पूरा गांव सामूहिक रूप से भैलो खेलता है।

वहीं मानस खण्ड में इसे बूढ़ि दीवाली के नाम से जाना जाता है। आज एक सूप में पीछे की ओर दलिदर की प्रतिकृति भुइयां चित्रित किया जाता है और आगे की ओर विष्णु और लछमी को चित्रित किया जाता है। घर की महिला सुबह भुइयां को रिखू से पीटते हुए घर से बाहर " भाज भुइयां भाज" कहती हुई आती है और आंगन में ओखल के पास दिया जलाकर अखरोट और दाड़िम फोड़ती हैं, उसके बाद सूप से खील बिखेरते हुए घर के अंदर जाती हैं। इस दौरान "आओ भैठो लछमी नरैण, भाज भुइयां घर से बाहर" कहा जाता है और आज ही दिन में…

चोड़ा : जौनसार बावर के पारम्परिक परिधान में प्रधानमंत्री मोदी।

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केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का परिधान देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। ख़ास बात यह है कि प्रधानमंत्री के लिए यह ख़ास परिधान जौनसार बावर के विशेषज्ञ दर्जी रण सिंह ने तैयार किया था। जौनसार बावर के इस पारम्परिक परिधान को चोड़ा कहा जाता है।


चोड़ा जौनसार बावर क्षेत्र का पारम्परिक परिधान है। यह शुद्ध स्थानीय ऊन से तैयार किया जाता है। पूर्व में चोड़ा क्षेत्र में काफी प्रचलित था। चोड़ा विशेषकर सर्दियों में पहने जाने वाला ऐसा परिधान है जो शरीर के लगभग पूरे हिस्से को ढककर सर्दी से बचाये रखता है।

Gopal Babu Goswami -The Legend of Uttarakhand | गोपाल बाबू गोस्वामी

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उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक गोपाल बाबू गोस्वामी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं परंतु उनके गीत हमें आज भी उनकी उपस्थिति का अहसास कराते हैं। जीवन के हर पहलू को छूते उनके गीतों की सूची लंबी है। हर किसी को रूला देने वाला दुल्हन की विदाई का उनका मार्मिक गीत 'न रो चेली न रो मेरी लाल, जा चेली जा सौरास' तथा 'उठ मेरी लाड़ू लुकुड़ा पैरीले, रेशमी घाघरी आंगड़ी लगै ले' गीत की आज भी जबरदस्त मांग।

उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोक गायक स्व. गोपाल गिरी गोस्वामी को लोग गोपाल बाबू के नाम से जानते हैं। उनका जन्म चौखुटिया बाजार से लगे ग्राम पंचायत चांदीखेत में दो फरवरी 1942 को मोहन गिरी गोस्वामी के घर हुआ था। बचपन से ही गीतकार बनने के जुनून में उन्होंने पांचवीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया। वह 12 साल की उम्र से ही गीत लिखने और गाने लगे थे। जीवन के 54 साल में उन्होंने साढे़ पांच सौ गीत लिखे। उनका पहला गीत "कैलै बजे मुरूली औ बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूमा" आकाश वांणी नजीबाबाद से प्रसारित हुआ था। 1972 में भारत सरकार के गीत और नाटक प्रभाग में नियुक्ति के बाद गोस्वामी को अपना हुनूर दिखाने का अच्…

Ghughutiya Festival | Uttarayani | घुघुतिया- उत्तराखण्ड का लोक पर्व।

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उत्तराखंड़ के लोक पर्वों के प्रचार-प्रसार हेतु हर वर्ष मैं इन लोक पर्वों पर एक पोस्टर डिज़ाइन करता हूँ। इस साल घुघुतिया पर यह पोस्टर डिज़ाइन किया है।  आप सभी को लोकपर्व घुघुतिया, उत्तरायणी एवं मकरैणी की हार्दिक शुभकामनायें।


उत्तराखण्ड के इस मंदिर में है अनूठी परम्परा। जानिये इस परम्परा को।

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उत्तराखण्ड स्थित बागेश्वर जिले के कपकोट तहसील मुख्यालय से करीब 8 किलोमीटर दूर पोथिंग गांव में माँ नंदा भगवती का एक भव्य मन्दिर है।  जहाँ हर वर्ष भाद्रपद नवरात्रों में माँ नंदा की विशेष पूजा की जाती है। प्रतिपदा से लेकर अष्टमी तक होने वाली इस पूजा में माता नंदा सहित उनके गणों की विशेष पूजा की जाती है। प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तिथि तक हर रात्रि मंदिर में जागरण होता है। सप्तमी तिथि को मंदिर में कदली वृक्ष के तनों से माँ नंदा की मूर्ति का निर्माण किया जाता है। अष्टमी तिथि को माँ नंदा के मुख्य मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और विधिवत पूजा की जाती है। इस दिन दूर-दूर से भक्तजन माँ नंदा के धाम पोथिंग में पहुँचते हैं और माता के दर्शन कर उन्हें सोने-चांदी के आभूषण, छत्र, घंटे, ढोल-नगाड़े, झांजर, भकोरे, चुनरी, निशाण आदि अर्पित करते हुए सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस दिन विशाल पोथिंग का मेला भी लगता है। नंदा अष्टमी को भगवती मंदिर पोथिंग में मोटी वजनी पूड़ियाँ बनाने का रिवाज़ सैकड़ों वर्षों से चले आ रहा है। एक पूड़ी का वजन करीब 300 ग्राम से लेकर 500 तक होता है। यहाँ ये पूड़ियाँ हजारों के हिसाब से बनाई जा…

Devbhumi- श्रद्धा की देवभूमि

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