कुमाऊनी होली 2026 : उत्तराखंड की संगीत, परंपरा और रंगों से सजी अनोखी होली

जानें कुमाऊनी होली का इतिहास, धार्मिक महत्व, बैठकी और खड़ी होली की परंपराएँ, चीर बंधन और गीतों से सजी उत्तराखंड की अनोखी सांस्कृतिक विरासत।

कुमाऊनी होली

HIGHLIGHTS

  • रंगों से अधिक राग और शास्त्रीय संगीत पर आधारित अनोखी होली।
  • बैठकी होली और खड़ी होली इसकी दो प्रमुख पारंपरिक शैलियाँ हैं।
  • चीर बंधन और चीर दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक हैं।
  • ढोल-दमुवे, मंजीरे की लोकधुनों से गूंजती उत्तराखंड की वादियाँ।
  • आपसी एकता, सांस्कृतिक विरासत और अपनी जड़ों से जोड़ने वाला पर्व।

होली भारत के प्रमुख और लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। यह ऐसा उत्सव है जिसे बच्चे, युवा और बूढ़े, सभी उमंग और उत्साह के साथ मनाते हैं। रंगों का यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है जो सर्दियों की समाप्ति तथा वसंत ऋतु के आगमन का संदेश भी देता है। साथ ही यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक पर्व भी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में होली की अपनी-अपनी परंपराएँ और अपने -अपने रंग हैं, लेकिन उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मनाई जाने वाली कुमाऊनी होली इस पर्व को एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान देती है।

होली का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

होली का संबंध प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार प्रहलाद और उनकी बुआ होलिका से जुड़ा है। इस कथा के अनुसार असुरराज हिरण्यकश्यप ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करने के बाद स्वयं को ईश्वर मानने लगा था, इसके विपरीत उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। अपने अहंकार के कारण हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने की विभिन्न कोशिशें की लेकिन ईश्वर की कृपा से नन्हा बालक प्रह्लाद बच जाता था। एक बार क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से प्रहलाद को मारने के उद्देश्य से आग में लेकर बैठने को कहा, क्योंकि होलिका को आग से न जलने का वरदान प्राप्त था। किंतु ईश्वर की कृपा से यहाँ भी प्रहलाद सुरक्षित बच गया और होलिका आग में दहन हो गई। तभी से होलिका दहन बुराई के अंत और सत्य की विजय का प्रतीक बन गया।

होलिका दहन के अगले दिन देश में रंगों की होली खेली जाती है, जो आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। लोग पुराने मतभेद भुलाकर एक-दूसरे को रंग, गुलाल लगाते हैं और एक दूसरे का मुँह मीठा करते हैं।

उत्तराखंड की कुमाऊनी होली

जब बात आती है उत्तराखंड की, तो यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता हर किसी को आकर्षित करता है। इसी राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में होली का स्वरूप बेहद ख़ास है। कुमाऊं की सुरम्य वादियों में मनाई जाने वाली कुमाऊनी होली रंगों से अधिक रागों, संगीत और परंपरा का पर्व है।

यहाँ होली केवल रंग, अबीर, गुलाल या मिठाई तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शास्त्रीय संगीत, लोकधुनों और सामूहिक सहभागिता का अद्भुत मिलन है। इस दौरान सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र विभिन्न होली के गीतों के साथ पारम्परिक धुनों से गूंज उठता है और पूरे परिवेश में एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।

कुमाऊनी होली की विशिष्ट पहचान

देश के अन्य भागों में जहाँ होली मुख्य रूप से रंगों और मस्ती से जुड़ी होती है, वहीं कुमाऊं क्षेत्र में यह संगीत-प्रधान उत्सव के रूप में जानी जाती है। यहाँ लोग घरों, मंदिरों और सामुदायिक स्थलों पर एकत्र होकर लोक वाद्यों के साथ विभिन्न रागों पर आधारित होली गीत गाते हैं।

कुमाऊंनी होली की खास बात यह है कि इसमें शास्त्रीय संगीत की झलक मिलती है। कई गीत राग भैरव, काफी, जोगिया आदि पर आधारित होते हैं। जो ढोल, मंजीरा, हारमोनियम और हुड़के जैसे वाद्ययंत्रों की संगत के साथ और भी मधुर बना देती है।

कुमाऊनी होली के दो प्रमुख रूप

हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड में कुमाऊं की होली दो रूपों में मनाई जाती है, जिसमें पहली है बैठकी होली और दूसरी खड़ी होली।

बैठकी होली

बैठकी होली का आयोजन मंदिरों या किसी सार्वजनिक स्थल में पौष माह के प्रथम रविवार से प्रारम्भ किया जाता है, जहाँ लोग एकत्रित होकर शास्त्रीय शैली हारमोनियम, तबले और मजीरे की संगत के साथ होली गीत गाते हैं। इसमें रागों का विशेष महत्व होता है और गीतों में भक्ति रस, अर्द्ध श्रृंगार और श्रृंगार रस की प्रधानता होती है। बैठकी होली विशेष रूप से विद्वानों और संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। यह मुख्यतः कुमाऊँ के शहरी क्षेत्रों में आयोजित की जाती है।

खड़ी होली

खड़ी होली की शुरुआत फाल्गुन महीने की अष्टमी (मंदिरों में) अथवा एकादशी (सार्वजनिक स्थल ) में चीर बंधन के साथ होती है। यहाँ होली कुमाऊँ के ग्रामीण क्षेत्रों में मनाई जाती है , जो अपेक्षाकृत अधिक जीवंत और उत्साहपूर्ण होती है। इसमें लोग पारंपरिक सफेद कुर्ता-पायजामा और सिर पर सफ़ेद टोपी पहनकर गोल घेरे में खड़े होकर हाथों और पैरों की ताल को मिलाते हुए होली गीतों का गायन करते हैं। ढोल, नगाड़े और दमुवे की थाप पर सामूहिक स्वर में गाए जाने वाले गीत पूरे आयोजन स्थल को रोमांचित कर देते हैं।

उपरोक्त बैठकी और खड़ी होली के अलावा यहाँ महिलाओं की भी अलग से होली होती हैं। जिसमें सिर्फ महिलायें ही प्रतिभाग करती हैं। महिला होली बैठकी और खड़ी दोनों रूपों में मनाई जाती है। इस होली में महिलाओं का समूह एकत्र होकर भक्ति और श्रृंगार रस से परिपूर्ण गीत गाता है। यह आयोजन सामाजिक मेल-मिलाप का माध्यम भी बनता है। महिलाएँ पारंपरिक परिधानों में सुसज्जित होकर होली के गीतों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान को सहजने का कार्य करती हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

उत्तराखंड में कुमाऊंनी होली का इतिहास 15वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों का मानना है कुमाऊँ में जब चंद वंश का शासन स्थापित हुआ, तब उनके दरबार में प्रचलित शास्त्रीय संगीत की परंपराएँ स्थानीय लोकसंस्कृति से घुल-मिल गईं।

चंपावत से शुरू होकर यह परंपरा धीरे-धीरे पूरे कुमाऊं क्षेत्र में फैल गई। इस प्रकार दरबारी संगीत और पहाड़ी लोकधुनों का अद्भुत संगम कुमाऊनी होली के रूप में विकसित हुआ। आज भी इस उत्सव में उस ऐतिहासिक विरासत की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

चीर बंधन और चीर दहन की परंपरा

कुमाऊनी होली की एक विशिष्ट परंपरा ‘चीर बंधन’ है। इसमें एक विशेष ध्वज या कपड़े (चीर) को एक स्तम्भ में स्थापित किया जाता है, जो पूरी खड़ी होली का नेतृत्व करता है। चीर बंधन फाल्गुन महीने की एकादशी के दिन गांव में निर्धारित अखाड़े में किया जाता है। चीर बांधने के बाद सभी लोग इसकी रक्षा करते हैं और इसे सम्मानपूर्वक घुमाते हुए घर पर आमंत्रित करते हैं । जहाँ लोग चीर की भेंट देकर अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं। कपड़े के लम्बे टुकड़े पर एक सिक्के को गांठ बांधकर चीर के ध्वज पर बांधा जाता है। यह परम्परा सभी घरों द्वारा अपनाई जाती है।

अंत में पूर्णिमा की रात को सुझाये गए मुहूर्त में सभी होल्यारों की उपस्थिति में विधि-विधान के साथ ‘चीर दहन’ किया जाता है। यह प्रहलाद की विजय और अधर्म के अंत का प्रतीक है।

ग्रामीण जीवन और खड़ी होली की रौनक

उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में खड़ी होली का दृश्य बेहद दर्शनीय होता है। लोग पारंपरिक सफेद कुर्ते और सफ़ेद टोपी पहनकर समूह में विभिन्न हाव-भावों के साथ नृत्य करते हैं। ढोल -दमुवे, मजीरे की लयबद्ध ध्वनि के साथ सामूहिक स्वर में गाए जाने वाले होली गीत जो मुख्यतः रामायण , महाभारत और कृष्ण, राधा और गोपियों के प्रसंगों पर आधारित होते गाये जाते हैं। जिनमें ब्रज और अवधि भाषा का प्रभाव देखा जाता है।

उत्तराखंड की होली का यह दृश्य न केवल सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक है, बल्कि सामूहिक जीवन की सादगी और यहाँ के लोगों की एकजुटता को भी दर्शाता है।

कुमाऊंनी होली में संगीत

यदि कहा जाए कि कुमाऊनी होली की आत्मा संगीत है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ के होली गीत मनोरंजन का साधन न होकर एक सांस्कृतिक धरोहर हैं। जिनमें भक्ति, प्रेम, हास्य और सामाजिक संदेश का समावेश होता है राग-आधारित होली गीतों को गाने की परंपरा कुमाऊँ की होली को एक विशिष्ट पहचान देती है।

परंपराएँ और स्वाद

कुमाऊनी होली केवल संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वादिष्ट व्यंजनों का भी उत्सव है। इस अवसर पर घर-घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। वैसे तो यहाँ के ग्रामीण अंचलों में होली पर गुड़ की भेली देने की परम्परा है। लेकिन समय के साथ -साथ आधुनकिता का तड़का भी लगने लगा है।

ठेठ पहाड़ी कुमाऊंनी होली के खानपान की बात करें तो लोग होल्यारों को आलू के गुटके और पकौड़ी खिलाकर स्वागत करते हैं।

होली के अंतिम दिन छलड़ी मनाने के बाद लोग स्नान और पकड़े धोने के बाद होली पूजन भी करते हैं। बड़े-बड़े तांबे के तौलियों में पहाड़ी घी और आटे से हलवा तैयार किया जाता है। पहाड़ी आलू के गुटके बनाये जाते हैं। सभी मिल बांटकर खाते हैं और घरों में प्रसाद स्वरुप हलवे को ले जाते हैं।

सामाजिक एकता और सामुदायिक भावना

कुमाऊँ की होली का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सामुदायिक भावना है। यहाँ होली व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक आयोजन है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर होली गीत गाते हैं और सभी को शुभ आशीष देते हैं।

उत्तराखंड की यह परंपरा सामाजिक रिश्तों को मजबूती देती है और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

वर्तमान में कुमाऊंनी होली

आज के समय में भले ही लोगों की जीवनशैली बदल गई हो, लेकिन कुमाउनी होली की परंपराएँ अब भी जीवित हैं। विभिन्न शहरों में बसे कुमाऊनी लोग इस उत्सव को उसी श्रद्धा और उत्साह से साथ मनाते हैं। उनकी सांस्कृतिक संस्थाएँ और समाजिक संगठन बैठकी और खड़ी होली के आयोजन कर इस धरोहर को संरक्षित करने का प्रयास भी कर रहे हैं।

निष्कर्ष

होली भारत की सांस्कृतिक विविधता में एकता का प्रतीक पर्व है और कुमाऊनी होली इस विविधता का अनमोल सांस्कृतिक विरासत है। यह केवल रंगों का पर्व नहीं, अपितु इतिहास, संगीत, परंपरा और आपसी एकता का अद्भुत मिलन भी है।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जब ढोल-दमुवे की थाप और मजीरे की खनक पर राग के रंग गूंजते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं इस पर्व में प्रतिभाग करने आई हो। कुमाऊनी होली हमें यह सीख देती है कि त्योहार केवल मनाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने, अपने अन्तर्सम्बन्धों संबंधों को मजबूत करने और जीवन में खुशियों के रंग बिखेरने के लिए होते हैं।

इस प्रकार, कुमाऊं की होली सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहाँ हर सुर में इतिहास है, हर रंग में उल्लास है और हर व्यंजन में अपनापन है।

Vinod Singh Gariya

ई-कुमाऊँ डॉट कॉम के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। इस पोर्टल के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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