नई दिल्ली: उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा नई दिल्ली में पद्म भूषण (Padma Bhushan) से सम्मानित किया जाएगा। उत्तराखण्ड की जनता के बीच ‘भगत दा’ के नाम से लोकप्रिय श्री कोश्यारी को यह सम्मान उनकी दशकों लंबी जन सेवा, सामाजिक कार्यों और राष्ट्र निर्माण में उनके अमूल्य योगदान के लिए दिया जा रहा है।
एक प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, प्रखर पत्रकार और समर्पित राष्ट्रवादी नेता के रूप में ‘भगत दा’ का जीवन समाज के गरीब और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित रहा है। आइए जानते हैं उनके जीवन और इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बारे में।
सुदूर गांव से आगरा यूनिवर्सिटी तक का सफर (प्रारंभिक जीवन)
भगत सिंह कोश्यारी का जन्म 17 जून, 1942 को उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले के कपकोट ब्लॉक स्थित एक सुदूर और पर्वतीय गांव ‘पलानधुरा’ (नामती चेटाबगड़) में माता मोतिमा देवी और पिता गोपाल सिंह कोश्यारी के घर हुआ था। ग्रामीण और विषम परिस्थितियों के बावजूद उनके भीतर शिक्षा के प्रति अटूट लगन थी। उन्होंने अपने दृढ़ संकल्प शक्ति के बलबूते वर्ष 1964 में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध अल्मोड़ा कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर (M.A.) की डिग्री पूरी की।
शिक्षा और समाज सेवा से शुरुआत
पोस्ट ग्रेजुएशन के तुरंत बाद, उन्होंने 1964-1965 के दौरान उत्तर प्रदेश के एटा जिले के ‘राजा का रामपुर’ में एक लेक्चरर के रूप में अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की। हालांकि, उनका लक्ष्य सिर्फ नौकरी करना नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करना था।
- शैक्षणिक योगदान: उन्होंने पिथौरागढ़ में ‘विवेकानंद इंटर कॉलेज’ की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई और नैनीताल के ‘सरस्वती विहार’ से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे।
- संगठन से जुड़ाव: उन्होंने कई वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विभाग कार्यवाह के रूप में अपनी सेवाएं दीं। बाद में वह ‘उत्तरांचल उत्थान परिषद’ के सचिव बने, जिसने राज्य में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के विकास में ऐतिहासिक काम किया।
- पत्रकारिता: सामाजिक चेतना जगाने के लिए उन्होंने पिथौरागढ़ से हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र “पर्वत पीयूष” का प्रकाशन भी शुरू किया।
- आपातकाल में जेल यात्रा: राष्ट्रीय आपातकाल (Emergency) के दौरान जनता की आवाज उठाने के कारण उन्हें आंतरिक सुरक्षा रख-रखाव अधिनियम (MISA) के तहत गिरफ्तार भी किया गया था।
‘भगत दा’ का राजनीतिक सफर: मंत्री से राज्यपाल तक
श्री कोश्यारी का राजनीतिक जीवन उपलब्धियों और जनसेवा की मिसालों से भरा पड़ा है:
| वर्ष | पद / जिम्मेदारी | मुख्य योगदान |
| 1997 | उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य | विधायी कार्यों में सक्रिय भागीदारी। |
| 2000 | उत्तराखण्ड के पहले कैबिनेट मंत्री | नए राज्य के गठन के बाद प्रशासनिक नींव रखी। |
| 2001 | उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री | थोड़े समय के कार्यकाल में जनहित के कई फैसले लिए। |
| 2002 | नेता प्रतिपक्ष (उत्तराखण्ड विधानसभा) | विपक्ष के रूप में जनता के मुद्दों को प्रखरता से उठाया। |
| 2008 | राज्य सभा सांसद | राष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखण्ड की समस्याओं को रखा। |
| 2014 | लोक सभा सांसद (नैनीताल-ऊधम सिंह नगर) | संसदीय क्षेत्र के विकास को नई गति दी। |
| 2019 | महाराष्ट्र के राज्यपाल | राज्य के लगभग सभी जिलों और ऐतिहासिक किलों का दौरा कर जनता से जुड़े। |
| 2020 | गोवा के राज्यपाल (अतिरिक्त प्रभार) | अतिरिक्त जिम्मेदारी का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। |
बुनियादी ढांचे के विकास में ऐतिहासिक योगदान
उत्तराखण्ड के ऊर्जा मंत्री रहते हुए उन्होंने लंबे समय से रुकी हुई ऐतिहासिक टिहरी हाइड्रो परियोजना को आगे बढ़ाया और टिहरी शहर व जिला मुख्यालय के सफल विस्थापन को सुनिश्चित किया। इसके अलावा, संसद की याचिका समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ‘वन रैंक वन पेंशन’ (OROP), ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन और पर्वतीय क्षेत्रों में रेल कनेक्टिविटी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत और प्रभावी सिफारिशें प्रस्तुत कीं।
एक प्रखर लेखक के रूप में पहचान
राजनीति और समाज सेवा के अलावा ‘भगत दा’ एक लेखक भी हैं। उन्होंने उत्तराखण्ड के विकास, उसकी समस्याओं और संभावनाओं को करीब से देखा और उन्हें अपनी किताबों में पिरोया। उनके द्वारा लिखित दो प्रमुख पुस्तकें हैं:
- “उत्तरांचल प्रदेश क्यों”
- “उत्तरांचल प्रदेश: संघर्ष एवं समाधान”
ये पुस्तकें उत्तराखण्ड के विकास के प्रति उनकी दूरदृष्टि और संकल्पना को साफ तौर पर दर्शाती हैं।
निष्कर्ष
भगत सिंह कोश्यारी को मिलने वाला यह पद्म भूषण सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत तप और त्याग का सम्मान है, बल्कि यह पूरे उत्तराखण्ड की जनता और देवभूमि का गौरव है। एक छोटे से पर्वतीय गांव से निकलकर देश के शीर्ष पदों तक पहुँचने और हमेशा जमीन से जुड़े रहने वाले ‘भगत दा’ का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्र सेवा और अटूट समर्पण का एक महान प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।













