देवभूमि उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित हेमकुंड साहिब विश्व के सबसे ऊंचे और पवित्र धार्मिक स्थलों में से एक है। सप्तऋषि पर्वतों के बीच समुद्र सतह से लगभग 15,000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित यह तीर्थस्थल सिख धर्म के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह की तपस्थली मानी जाती है। वहीं हिंदू धर्म में इसे “लोकपाल” यानी विश्व के रक्षक नाम से जाना जाता है, जहां त्रेतायुग में मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम के अनुज लक्ष्मण जी ने एक मंदिर बनाकर तपस्या की थी। इसी कारण हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) सिख और हिंदू दोनों धर्म के अनुयाईयों की साझा आस्था और संस्कृति का प्रतीक माना जाता है।
हेमकुंड नाम का अर्थ
हेमकुंड, संस्कृत भाषा का शब्द है। जो दो शब्दों हेम और कुंड से मिलकर बना है। जिसका अर्थ होता है – बर्फ का कटोरा या बर्फ का कुंड । संस्कृत में बर्फ को हेम कहते हैं और कुंड यानी कटोरा/सञ्चय। चारों ओर से बर्फ से भरा यह स्थल वास्तव में एक बर्फ के कुंड की भांति है। यहाँ उल्लेखनीय है उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पवित्र जल के तालाबों को कुंड कहते हैं। यहाँ पर जो बर्फीले पानी का तालाब है वही हेमकुंड है। इसी के नाम से इस क्षेत्र का नाम हेमकुंड पड़ा।
हेमकुंड साहिब का धार्मिक महत्व
सिख परंपरा के अनुसार उनके 10वें गुरु गोविंद सिंह जी ने अपनी आत्मकथा दशम ग्रन्थ “बचित्तर नाटक” में उल्लेख किया है कि उन्होंने अपने पूर्व जन्म में हिमालय के “हेमकुंड” नामक स्थान पर पूजा अर्चना और तपस्या की थी। गुरु जी लिखते हैं—
अब मैं अपनी कथा बखानो
तप साधत जिह बिध मुंह एनो
हेमकुंड पर्वत है जहां
सपत श्रृंग सोभित है तहां।
सपत श्रृंग तहं नाम कहावा।
पाण्डु राज जहाँ योग कामया।
तहां हम अधिक तपस्या साधि।
महाकाल कालिका आराधना।
एहि बिधि करत तपस्या भयो।
द्वै ते एक रूप ह्वै गयो।
अर्थात, अब में आपको अपनी पूर्व जन्म की कहानी का बखान करता हूँ कि मुझे किस विधि द्वारा इस संसार में लाया गया और मैंने कैसी तपस्या की। वह स्थान जहाँ हेमकुंड पर्वत है और जहाँ सात पर्वत चोटियां शोभायमान हैं। जहाँ कभी पांडु राजा ने योग साधना की थी। वहां मैंने बहुत अधिक तपस्या की और महाकाल (शिव) और कालिका (देवी शक्ति) की आराधना की। इस विधि से तपस्या करते-करते मुझे एक लंबा समय बीत गया। (उस गहन साधना की अवस्था में) द्वैत भाव समाप्त हो गया और दोनों (साधक और आराध्य / शिव-शक्ति) एक रूप हो गए।
उपरोक्त घटना गुरु गोविन्द सिंह द्वारा हेमकुंड में किये गए तपस्या का उल्लेख करती है और परमात्मा के दिव्य आदेशानुसार उनका जन्म पटना साहिब में गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी के घर हुआ। इसीलिए सिख धर्म के अनुयायी हेमकुंड साहिब को गुरु गोविंद सिंह के पूर्व जन्म की तपस्थली मानते हैं ।
गुरु गोविंद सिंह और हेमकुंड का संबंध
बचित्तर नाटक में गुरु गोविंद सिंह बताते हैं कि वे हेमकुंड की पर्वत श्रृंखलाओं में ईश्वर की साधना में लीन थे। वे इस नश्वर संसार में पुनर्जन्म नहीं लेना चाहते थे, लेकिन परमात्मा के आदेश पर उन्हें यह मनुष्य रूप धारण करना पड़ा।
गुरु गोविन्द सिंह का यह उल्लेख सिख इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी आधार पर अनेक सिख संतों और विद्वानों ने हेमकुंड की वास्तविक स्थिति खोजने का प्रयास किया।
हेमकुंड साहिब की खोज और स्थापना
हेमकुंड साहिब के आधुनिक इतिहास की शुरुआत सन 1934 में हुई, जब बाबा मोदन सिंह और संत सोहन सिंह ने इस पवित्र स्थल की पहचान की। इसके बाद प्रसिद्ध सिख साहित्यकार और संत भाई वीर सिंह के सहयोग से वर्ष 1936 में यहां गुरुद्वारे के निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ।
वर्तमान गुरुद्वारे के डिज़ाइन और निर्माण की शुरुआत 1960 के दशक के मध्य में हुई। उस समय भारतीय सेना के इंजीनियर-इन-चीफ मेजर जनरल हरकीरत सिंह (KCIO) ने हेमकुंड साहिब का दौरा किया और यहां एक स्थायी एवं भव्य गुरुद्वारे की आवश्यकता महसूस की। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए उन्होंने सैन्य इंजीनियरिंग सेवा (MES) के प्रसिद्ध वास्तुकार मनमोहन सिंह सियाली को डिजाइन और निर्माण कार्य का दायित्व सौंपा।
वास्तुकार मनमोहन सिंह सियाली ने कई वर्षों तक हर वर्ष हेमकुंड साहिब की यात्रा कर निर्माण कार्य की योजना बनाई और उसका प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण किया। अत्यधिक ऊंचाई, सीमित संसाधन, प्रतिकूल मौसम, बर्फबारी, दुर्गम मार्ग और निर्माण सामग्री की ढुलाई जैसी अनेक चुनौतियों के बावजूद कार्य को सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
हेमकुंड साहिब के प्रथम ग्रंथी: नन्दा सिंह चौहान
हेमकुंड साहिब के इतिहास का एक अत्यंत प्रेरणादायक अध्याय स्थानीय गांव पुलना के निवासी नन्दा सिंह चौहान से जुड़ा हुआ है। सन 1937 में गुरुद्वारा हेमकुंड साहिब में गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश होने के बाद नन्दा सिंह चौहान को यहां का पहला ग्रंथी नियुक्त किया गया था।
नन्दा सिंह चौहान ने लगभग 47 वर्षों तक, सन 1937 से 1984 तक, पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ इस पवित्र गुरुद्वारे में सेवा दी। यह तथ्य और भी आश्चर्यजनक है कि उन्होंने केवल कक्षा पांच तक हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने कभी औपचारिक रूप से गुरुमुखी भाषा नहीं सीखी थी, फिर भी गुरु की कृपा और निरंतर अभ्यास से उन्हें सुखमनी साहिब कंठस्थ हो गया था तथा वे नियमित रूप से गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ भी करते थे।
चमोली के पुलना गांव निवासी और नन्दा सिंह चौहान के भतीजे भवान सिंह चौहान बताते हैं कि उनके परिवार को इस बात पर गर्व है कि उनके बुजुर्ग ने हिन्दू और सिख धर्म के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करते हुए हेमकुंड साहिब के प्रथम ग्रंथी के रूप में निःस्वार्थ सेवा दी।
गोविंदघाट स्थित हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा के मुख्य प्रबंधक सरदार सेवा सिंह भी इस ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि करते हैं। उनके अनुसार हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) गुरुद्वारा के पहले ग्रंथी स्थानीय गांव पुलना के नन्दा सिंह चौहान ही थे, जिन्होंने दशकों तक श्रद्धालुओं की सेवा और गुरुद्वारे की धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया।
लोकपाल और लक्ष्मण जी की तपस्थली
हिंदू मान्यताओं के अनुसार हेमकुंड का प्राचीन नाम “लोकपाल” है, जिसका शाब्दिक अर्थ है – “विश्व का रक्षक“। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्री राम के अनुज लक्ष्मण जी ने इसी स्थान पर तपस्या की थी।
हेमकुंड से जुड़े पौराणिक प्रसंग महाभारत काल से भी जुड़े हुए हैं। कहा जाता है कि पांडुकेश्वर के समीप स्थित यही वह क्षेत्र है जहां से बलशाली भीम द्रौपदी के लिए ब्रह्मकमल तोड़कर लाये थे। आज भी हेमकुंड साहिब के समीप लक्ष्मण जी का एक प्राचीन मंदिर स्थित है, जहां श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। एक एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ सीता – राम के बगैर लक्ष्मण की पूजा की जाती है।

सात पर्वत चोटियों से घिरा दिव्य सरोवर
हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थित पवित्र झील (कुंड) है, जिसे श्रद्धालु अमृत सरोवर कहते हैं। लगभग 400 गज लंबा और 200 गज चौड़ा यह कुंड चारों ओर से सात हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ है।
इन पर्वत श्रृंखलाओं का रंग समय और सूर्य की किरणों के अनुसार बदलता रहता है। कभी ये बर्फ की तरह सफेद दिखाई देते हैं, तो कभी सुनहरे, लाल, भूरे और नीले रंग की छटा बिखेरते हैं। जब इन पर्वतों का प्रतिबिंब इस कुंड के जल में दिखाई देता है तो यह दृश्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
ग्रीष्म काल में बर्फ पिघलने के बाद वर्षा ऋतू प्रारंभ होते ही यहां उत्तराखंड का राज्य पुष्प ब्रह्मकमल खिलता है, जो इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को और अधिक मनमोहक बना देता है।
गुरुद्वारे की वास्तुकला
हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे की वास्तुकला पारंपरिक गुरुद्वारों से बेहद अलग है। इसकी संरचना कमल के फूल की तरह है। बहुभुजाकार संरचना और ढलानदार छत को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि भारी बर्फबारी के बाद भी भार आसानी से सहन किया जा सके। बर्फीले तूफ़ान और तेज हवाओं को दृष्टिगत तैयार की गई यह संरचना आज भी अपनी मजबूती और आकर्षण के लिए जानी जाती है।
हिमाच्छादित पर्वतों और पवित्र कुंड के बीच स्थित यह गुरुद्वारा प्रकृति और वास्तुकला का अद्भुत संगम है। यहाँ निर्माण के समय जिन चुनौतियों का सामना किया गया होगा, उसे देखते हुए इसकी अभिकल्पना और निर्माण को इंजीनियरिंग का एक अनूठा चमत्कार माना जाता है।
समय की कसौटी पर खरा उतरा निर्माण
करीब 6 दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा हिमालय की जटिल जलवायु, भारी हिमपात और प्राकृतिक चुनौतियों का मजबूती से सामना कर रहा है। इसकी टिकाऊ संरचना और उत्कृष्ट निर्माण गुणवत्ता आज भी इंजीनियरिंग और वास्तुकला के क्षेत्र में प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
इस प्रकार हेमकुंड साहिब केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि मानवीय संकल्प, सेवा भावना और अद्वितीय इंजीनियरिंग कौशल का भी जीवंत स्मारक है।
हेमकुंड यात्रा और कर सेवा की परंपरा
अत्यधिक ऊंचाई और भारी हिमपात के कारण हेमकुंड साहिब वर्ष में केवल कुछ महीनों के लिए ही खुलता है। सामान्यतः इसके कपाट जून माह में खुलते हैं और अक्टूबर में बंद कर दिए जाते हैं।
अक्टूबर के बाद आगामी अप्रैल तक पूरा क्षेत्र बर्फ की मोटी परत से ढका रहता है। हर वर्ष मई माह में सबसे पहले पहुंचने वाले सिख श्रद्धालु मार्गों की मरम्मत और सफाई का कार्य करते हैं। इस सेवा को “कर सेवा” कहा जाता है, जो सिख धर्म के अनुयाइयों की महत्वपूर्ण परंपरा है। इसका उद्देश्य समाज और धर्मस्थलों की निःस्वार्थ सेवा करना है।
यात्रा मार्ग
हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) की यात्रा का मुख्य पड़ाव गोविंदघाट है। यहां से श्रद्धालु पैदल यात्रा करते हुए घांघरिया तक पहुंचते हैं और फिर वहां से हेमकुंड साहिब तक कठिन चढ़ाई पूरी करते हैं।
वायुमार्ग
निकटतम हवाई अड्डा देहरादून का जौलीग्रांट हवाई अड्डा है। यहाँ से गोविंदघाट की दूरी 268 किलोमीटर है।
रेलमार्ग
निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश और हरिद्वार हैं। इसके अलावा देहरादून तक भी रेलमार्ग से आ सकते हैं। ऋषिकेश से हेमकुंड की दूरी करीब 200 किलोमीटर है।
सड़क मार्ग
हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून और कोटद्वार से सड़क मार्ग द्वारा बद्रीनाथ हाईवे होते हुए गोविंदघाट पहुंचा जा सकता है।
यात्री सुविधाएं
यात्रियों की सुविधा के लिए मार्ग में बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति, जीएमवीएन, निजी विश्राम गृहों तथा अन्य धर्मशालाओं की व्यवस्था उपलब्ध है। गोविंदघाट और घांघरिया में भोजन एवं ठहरने की पर्याप्त सुविधाएं मिल जाती हैं।
प्रकृति और अध्यात्म का अनूठा संगम
हेमकुंड साहिब सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम भी है। बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाएं, शांत अमृत कुंड , दुर्लभ ब्रह्मकमल, प्रभु श्री राम के भाई लक्ष्मण की तपोभूमि और गुरु गोविंद सिंह की तपस्थली होने का गौरव इसे विशेष स्थान बनाता है।
यही कारण है कि हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक खड़ी पैदल चढ़ाई कर दिव्य धाम Hemkund Sahib के दर्शन करने पहुंचते हैं। सिख और हिंदू आस्था के इस साझा तीर्थ में भारत की सांस्कृतिक एकता, आध्यात्मिक परंपरा और हिमालय की अद्भुत सुंदरता का अनुपम दर्शन होता है। भ्यूंडार घाटी जिसे अब वैली ऑफ़ फ्लॉवर्स कहते हैं, इसी यात्रा मार्ग में है। चारधाम समेत विभिन्न आस्था के स्थल इसी देवभूमि उत्तराखंड में स्थित हैं। जिसे यहाँ के लोगों ने सदियों से संरक्षित किये हैं।
नोट : हम अपने आस्था के इन स्थलों के दर्शन के लिए उत्तराखंड जायें, हर वर्ष जाएँ लेकिन वहां के नियम और कायदे-कानूनों का हमें अवश्य पालन करना होगा। ये पहाड़ बेहद संवेदनशील हैं, यहाँ हिमालय का सम्मान आवश्यक है। इस क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त रखें। शोर- शराबा, हुड़दंग न करें। स्थानीय लोगों की मर्यादाओं/भावनाओं का सम्मान करें। तभी आपकी यात्रा सफल मानी जाएगी।













