चौमास के प्रचलित पुराने कुमाऊंनी लोकगीत।

कुमाऊंनी लोकगीतों में चौमास यानी सावन-भादो का महीना केवल बारिश का मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति, प्रेम, विरह और लोकजीवन का जीवंत उत्सव है। इस पोस्ट में पढ़िए विभिन्न रचनाकारों की रचनाएँ एवं लोकगीत-

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हिंदी फिल्मों में बरसात के मौसम पर कई खूबसूरत गीत बने हैं। सावन का महीना पवन करे शोर…और रिमझिम गिरे सावन… जैसे कई गीत बरसों बाद भी काफी लोकप्रिय हैं। वहीं कुमाऊंनी में भी ऐसे कई लोकगीत प्रचलित हैं जो चौमास (बरसात) में पहाड़ के सुंदर प्राकृतिक सौंदर्य के साथ ही इस मौसम में विरह और मिलन की कल्पना का सटीक चित्रण करते हैं। (Kumaoni Folk Song on Sawan)

पहाड़ों में गर्मी के बाद जब रिमझिम बारिश शुरू होती है तो हरे-भरे पहाड़ियों का सौंदर्य खिल उठता है। यहाँ जगह-जगह झरने बहने लगते हैं। इस मौसम पर कुमाऊंनी लेखकों / संगीतकारों ने कई खूबसूरत गीत लिखे हैं। बरसात के मौसम का चित्रण करता यह कुमाऊंनी न्योली भी काफी लोकप्रिय है-

काटनियां-काटनियां पौली ऊं छो।
चौमासी का वना।
बगनियां पाणि थामी जां छो।
नि थामिनो मना…

(अर्थात बरसात में पेड़ की टहनियों को जितना काटो वह उतना अधिक पनपती है। बहते पानी को रोका जा सकता है, लेकिन मन को नहीं थामा जा सकता।)

इस तरह कुमाऊंनी कवि स्व. पीतांबर पांडे द्वारा लिखा यह गीत आज भी काफी लोकप्रिय है-

कसी काटू पालुरी को घासा।
नि थामिनो हिया को उदासा।
कां देखिनी य ऋतु य मासा।
चार दिना रंगीलो चौमासा।

(इस गीत में नवविवाहिता कहती है- बारिस के मौसम में कोमल पत्तों की घास कैसे काटूं। मुझसे दिल की उदासी नहीं थामी जाती। ऐसी ऋतु और ऐसा महीना कभी-कभी ही दिखता है। रंगीन बरसात तो सिर्फ चार दिन की है।)

नव विवाहिता अपने पति को उलाहना देते हुए आगे कहती है-

धन तेरी बेरुखी पराणि।
मैं जोग्याणी हूं चिट्ठी ले हराणि।
भगवाना कैं आला उ दिना।
बिछुड़ी मिलुल जै दिना….

(अपने पति के लिए कहती है कि तुम्हारा यह कैसा बेरुखापन है कि मेरे लिए एक चिट्ठी तक नहीं भेजी। हे भगवान वह दिन कब आएगा, जब हम दोनों बिछुड़े मिल सकेंगे। )

वरिष्ठ रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली के अनुसार कई दशक पहले इस लोकगीत को गीत नाटिका के रूप में भी मंचित किया जाता था। एक अन्य कुमाऊंनी गीत भी बहुत लोकप्रिय है। (Kumaoni old folk song on Chaumasa)

झूलो सौंण भदो चौमास सुआ भिजी आलो ।
भिजी आलो सुआ भिजी आलो..
कां सुखूल आंगेड़ी सुआ कां सुखूल पाग, सुआ भिजी…

(सावन, भादो के महीने में लोग झूम रहे हैं। मेरा प्रियतम भीगकर घर आएगा। ऐसे में प्रियतम के कपड़े और पगड़ी कैसे सुखाऊंगी।)

कुमाऊंनी कवि स्व. शेर सिंह अनपढ़ की इस कुमाऊंनी कविता में बारिश का अच्छा चित्रण है-

बादव भिन निझूत कनई, साई पौणि चाव।
इंद्रैणि नौलि हालनै, हौल कैं अंगाव।
डान काना काखिन हंसनै चौमासिक ब्याव…

(बरसात में बादल जीजा के रूप में आकर अपनी छोटी और बड़ी साली को भिगो रहे हैं और इंद्रधनुष इस तरह घिर आया है जैसे कोहरे को गले लगा लिया हो। पहाड़ की चोटियां मुस्कुराते हुए बरसात की शाम को और भी खूबसूरत बना रही हैं।)

कुमाऊंनी कवि नवीन बिष्ट की इस कविता में भी बारिश का दृश्य उजागर हो रहा है-

सणमण-सणमण सणमण-सणमण लागो चौमास।
दण-दण दण-दण लागी द्यो की धार
धरती छाजि रै कौली नई ब्योलि जै चार…

(बरसात में बारिश की सनसनाहट हो रही है और दण-दण की आवाज के साथ मूसलाधार बारिश की धार गिर रही है। ऐसे में धरती नई दुल्हन की तरह सज गई है।)

चौमासी बाटो चिफलो- यह पारम्परिक कुमाऊंनी चौमास का लोकगीत है। जिसमें प्रकृति के सौंदर्य, हरियाली, बहते झरनों और बरसात में रास्तों की फिसलन व कठिनाइयों का वर्णन के साथ ही लोक जीवन के अनुभवों का वर्णन है। इस गीत के लिरिक्स कुछ इस प्रकार हैं –

चौमासी बाटो चिफलो, कैं सुवा रड़ी पड़लि।
चौमासी झड़ी बादली म्यर सुवा रड़ी पड़लि।
गाड़-गंगा औली ऐ रै,
गाड़-गंगा औली ऐ रै
झन जाए घास कटाण।
त्यार खुट्टा झांवरी मधुली
सर सर सरकि जालि।
बरखा को तौड़ ऐ रौ
बरखा को तौड़ ऐ रौ
हाथ कुटली त्वैलै धरी
तलि ढुङ्ग आंसि उध्याली
कैं म्यर मधु रड़ी पड़लि।
चौमासी बाटो चिफलो, कैं सुवा रड़ी पड़लि।
चौमासी झड़ी बादली म्यर सुवा रड़ी पड़लि।

(चौमास यानि बरसात के फिसलन भरे मार्ग में प्रिये कहीं आप फिसले पड़ोगी, बरसात की झड़ी और बादलों में आप कहीं फिसल सकते हो। गाड़-गधेरे यानि नदी-नाले उफान पर होंगे इसलिए हे प्रिये आप घास काटने मत जाना।)

इसी प्रकार ‘सौंण की रात बरखा की छण मण’ लोकगीत भी है, जिसे स्वर्गीय प्रहलाद सिंह मेहरा ने लिखा है। इस गीत के लिरिक्स इस प्रकार हैं –

सौंण की रात बरखा की छण मण
अकेली लाग छी, बाली उमर स्वामी परदेस।
कलेजी काटी खां छी।

सौंण की रात बरखा की छण मण,
अकेली लाग छी, छोड़ि मुलुक मी आयों परदेस।
कलेजी काटी खां छी।
सौंण की रात बरखा की छण मण,
सौंण की रात बरखा की छण मण
,

रात स्वीणां में स्वामी देख्छुं तुमुकैं,
मेरी याद में आंसूं बगुण।
बटुवै बे मेरी फोटक निकाली,
घड़ी-घड़ी छाती पर लगूँंण।
खुली जब नीना अनेरी रात,
स्वामी डर लागैंछी,
सौंण की रात बरखा की छण मण,
सौंण की रात बरखा की छण मण।

रात खुली सुवा, बटींण ड्यूटी की
सोच तू ऐल मेरा मूख लै हूँनी,
ब्याल हूँ टैम पर घर ऐ जाया,
मेरी सुवा तू मी हैनी कूनी।
त्यार बगैर य परदेश में, मन नै लगाना,
सौंण की रात बरखा की छण मण,
सौंण की रात बरखा की छण मण।

घुट-घुट स्वामी लगैं छि बाटुली
सांस पड़ी जब दिया जलूं छौं,
याद तुमन करि बेर स्वामी,
चुल आग बन रवाट पकूं छौं,
भुर-भुर आग भूर्या छौ,
पराणी झुरैं छी,
सौंण की रात बरखा की छण मण,
सौंण की रात बरखा की छण मण।

ये सिर्फ कुमाऊंनी लोकगीत नहीं हैं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक जीवन, प्रकृति, संस्कृति और मानवीय भावनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं। बरसात जिसे पहाड़ों में लोग अक्सर चौमास कहते हैं पर आधारित ये गीत हमें याद दिलाते हैं कि पहाड़ के लोगों ने इस बरसात को केवल मौसम नहीं माना, बल्कि उसे प्रेम, विरह, आशा, प्रतीक्षा और प्रकृति के उत्सव के रूप में भी जिया है। यही कारण है कि आज भी ये लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाए जाते हैं और कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए हैं।

आज भले ही विकास की अंधी दौड़ और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से प्रकृति असंतुलित होकर कुछ वर्षों से बरसात का यह मौसम हमें एक जख्म दे जाती है लेकिन हमारे आमा-बूबू, ईजा-बौज्यू ने इस चौमास को प्रकृति के उत्सव के रूप में जिया है। बरसात शुरू होते ही अपने मवेशियों को लेकर दूर खरक को चले जाना, प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर मौसम का भरपूर आनंद लेना उनकी जीवन शैली का हिस्सा था। यही प्रकृति के प्रति उनका प्रेम और सम्मान था, जिसने चौमासे की सुंदरता, विरह, प्रेम और लोकजीवन को अमर करने वाले ये कालजयी कुमाऊंनी लोकगीत हमें विरासत में दिए हैं।

संदर्भ – स्वर्गीय दीप जोशी एवं उप्रेती सिस्टर्स

Vinod Singh Gariya

विनोद सिंह गढ़िया इस वेब पोर्टल के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। करीब 15 वर्षों से विभिन्न वेब पोर्टलों के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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