लाटू देवता मंदिर: जहाँ पुजारी भी आँखों पर पट्टी बाँधकर करते हैं पूजा, 1 मई को खुलेंगे कपाट

चमोली के वाण गाँव में स्थित लाटू देवता मंदिर के कपाट 1 मई को खुलेंगे। जानिए क्यों यहाँ पुजारी आँखों पर पट्टी बाँधकर पूजा करते हैं और क्या है माँ नंदा के धर्म भाई की पौराणिक कथा। पढ़ें पूरी यात्रा गाइड।

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HIGHLIGHTS

  • लाटू देवता मंदिर के कपाट 1 मई को दोपहर 1 बजे खुलेंगे
  • श्रद्धालु 6 महीने तक कर सकेंगे पूजा-अर्चना
  • वाण गांव हिमालय का अंतिम आबाद और राजजात का प्रमुख पड़ाव
  • दिल्ली से मंदिर की दूरी 432 किमी, लगभग 12 घंटे का सफर
  • लाटू देवता के दर्शन रहस्यमयी—पुजारी भी आंखों पर पट्टी बांधकर करते हैं पूजा

उत्तराखंड की पावन भूमि अपनी रहस्यमयी परंपराओं, अटूट श्रद्धा और आस्था के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं में सीमान्त चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में स्थित लाटू देवता का मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं के लिए जाना जाता है। यह वही मंदिर है जहाँ देवता के दर्शन खुद पुजारी नहीं कर पाते और वे आँख और मुँह पर पट्टी बाँधकर पूजा संपन्न करते हैं। मंदिर के मुख्य कपाट सिर्फ एक दिन के लिए बैसाख पूर्णिमा के दिन खुलते हैं।

इस वर्ष (2026)में विख्यात लाटू देवता मंदिर के कपाट आगामी 1 मई को दोपहर करीब 1 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। ऐतिहासिक वाण गाँव में स्थित इस मंदिर के कपाट खुलने की प्रक्रिया पूर्ण वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न होगी। कपाट खुलने के साथ ही मंदिर में अगले 6 महीने तक श्रद्धालु मंदिर परिसर से ही दर्शन-पूजन कर सकेंगे।

बैसाख पूर्णिमा पर खुलते हैं द्वार

धार्मिक परंपरा के अनुसार, लाटू देव मंदिर के कपाट प्रतिवर्ष बैसाख माह की पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा) को खोले जाते हैं। छह महीने की पूजा के बाद, मंगसीर पूर्णिमा के दिन मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए पुन: बंद कर दिए जाते हैं। उल्लेखनीय है लाटू देवता को माँ भगवती नंदा का धर्मभाई और भगवान शिव का साले माने जाते हैं, जो पूरे पिण्डर और दशोली इलाके के आराध्य देव हैं।

रहस्यमयी पूजा पद्धति: क्यों बाँधी जाती है आँखों पर पट्टी?

लाटू देवता का यह मंदिर अपनी अनोखी एवं रहस्यमयी परंपरा के लिए देशभर में चर्चा का विषय रहता है। यहाँ मंदिर के अंदर क्या है, यह आज तक एक रहस्य बना हुआ है। परम्परानुसार मंदिर के अंदर पुजारी भी आँखों और मुँह पर पट्टी बाँधकर प्रवेश करते हैं। मंदिर प्रांगण से कोई अंदर न देखे इसके लिए मंदिर के मुख्य कपाट पर एक लम्बा पर्दा लगाया जाता है।

लोगों का मानना है कि लाटू देवता मंदिर के अंदर साक्षात रूप में नागराजा मणि के साथ विराजमान हैं। जिसकी चमक सहने की शक्ति किसी साधारण मनुष्य में नहीं है। स्थानीय लोग यह भी कहते हैं कि पुजारी के मुंह की गंध देवता तक न पहुंचे इसलिए उसके मुंह पर पूजा के दौरान भी पट्टी बंधी रहती है। पुजारी स्पर्श के आधार पर ही पूजा सम्पन्न करते हैं। यहाँ श्रद्धालुओं को मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं होती, वे मंदिर परिसर से ही अपनी मन्नतें मांगते हैं।

हिमालय का अंतिम गाँव बनता है साक्षी

समुद्र तल से करीब 8 हजार फीट की ऊंचाई पर बसा वाण गाँव इस आयोजन का साक्षी बनता है। यह गाँव देवाल और नंदानगर ब्लॉक की सीमा पर स्थित हिमालय का अंतिम बसावट वाला क्षेत्र है। इससे आगे निर्जन हिमालयी क्षेत्र प्रारम्भ हो जाता है।

मंदिर के कपाट खुलने के अवसर पर यहाँ स्थानीय महिलाओं द्वारा पारंपरिक परिधानों और आभूषणों में माँ नंदा देवी के लोकगीत, जागर के साथ ही झोड़ा और चाँचरी लोकनृत्य प्रस्तुत किया जाता है। जो हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देता है।

यह गाँव विश्व प्रसिद्ध ‘नंदा देवी राजजात यात्रा’ का भी महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस दौरान यहां लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, जहां देव नृत्य, झोड़ा-चांचरी और पारंपरिक लोकगीत से पूरा क्षेत्र में भक्तिमय हो जाता है। मान्यता है कि वाण से आगे निर्जन मार्गों पर लाटू देवता ही माँ नंदा की यात्रा की अगुवाई करते हैं।

पौराणिक संदर्भ

प्रचलित लोक मान्यताओं के अनुसार, लाटू कन्नौज के कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। जब माँ नंदा का विवाह भगवान शिव से हुआ, तो वे भी उनके साथ कैलाश की ओर चल पड़े। मार्ग में प्यास लगने पर उन्होंने अनजाने में घड़े से पानी की जगह मदिरा पी ली। मदिरा के असर से वे उत्पात मचाने लगे। लाटू की इस हरकत को देखकर माँ नंदा ने क्रोधित होकर उन्हें इसी स्थान पर कैद कर दिया था। जहाँ आज मंदिर विद्यमान है। यहाँ प्रचलित लोकगीतों और जागरों के अनुसार एक बार माँ नंदा कैलाश जाते समय वाण गांव से आगे रणकधार के बाद रास्ता भटक गई। तभी वह अपने धर्मभाई लाटू का स्मरण करती है और आगे का मार्ग प्रशस्त हो पाया । लाटू से प्रसन्न होकर माँ ने तभी उन्हें अपनी 12 वर्ष में होने वाली यात्रा का रक्षक और वाण गांव से आगे का मार्गदर्शक नियुक्त किया। आज भी वाण गांव से आगे नंदा राजजात यात्रा की अगुवाई लाटू देवता द्वारा की जाती है।

पर्यटन की दृष्टि से महत्व

वाण गाँव न केवल धार्मिक अपितु पर्यटन की दृष्टि से भी बेहद खास है। यह गांव रूपकुंड, बेदनी बुग्याल, ओली बुग्याल और मोनाल टॉप जैसे विश्व प्रसिद्ध ट्रेकिंग रूट का बेस कैंप भी है। लाटू देवता मंदिर कपाट खुलने के दौरान यहाँ हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के जुटने की उम्मीद श्रद्धालु और पर्यटक पहुँचते हैं।

कैसे पहुंचें

दिल्ली से चमोली स्थित लाटू देवता मंदिर की दूरी लगभग 432 किलोमीटर है। इस यात्रा को पूरा करने में लगभग 10 से 12 घंटे का समय लगता है। दिल्ली, हरिद्वार, ऋषिकेश, देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, गौचर होते हुए कर्णप्रयाग तक पहुंचा जाता है। यहाँ से वाण गांव की दूरी करीब 104 किलोमीटर है। यहां से आपको ग्वालदम मोटर मार्ग से होते हुए वाण गांव तक पहुंचना होता है।

Vinod Singh Gariya

ई-कुमाऊँ डॉट कॉम के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। इस पोर्टल के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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