16 या 17 जुलाई, कब है हरेला 2026? जानें सही तिथि और शुभ मुहूर्त

उत्तराखंड का लोक पर्व 'हरेला' खुशहाली और हरियाली का प्रतीक है। इस साल कर्क संक्रांति के समय को लेकर लोग असमंजस में हैं कि हरेला 16 जुलाई को है या 17 जुलाई को? आइए जानते हैं इसकी सही तिथि, शुभ मुहूर्त, हरेला बोने की विधि और इसका धार्मिक महत्व।

हरेला 2026 कब है

Harela 2026 kab hai: उत्तराखंड का सुप्रसिद्ध लोक पर्व ‘हरेला’ खुशहाली, हरियाली और नई ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। मुख्यतः कुमाऊं मंडल में मनाया जाने वाला यह त्योहार पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। हर वर्ष कर्क संक्रांति के दिन मनाए जाने वाले इस त्योहार को लेकर इस बार लोगों में दुविधा है कि हरेला 16 जुलाई को है या 17 जुलाई को?

आइए जानते हैं वर्ष 2026 में हरेला पर्व की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और उत्तराखंड में इसका धार्मिक व पर्यावरणीय महत्व।

कब है हरेला 2026? जानें सही तिथि (Harela 2026 Correct Date)

हिंदू पंचांग और ज्योतिष गणना के अनुसार, हरेला पर्व ‘कर्क संक्रांति’ यानी जब सूर्य मिथुन राशि से कर्क राशि में प्रवेश करते हैं के दिन मनाया जाता है। सौर पंचांग के अनुसार इसी दिन से पवित्र सावन महीने की शुरुआत होती है।

हरेला पर्व की तिथि: इस वर्ष सूर्य देव 16 जुलाई 2026, भारतीय समय के अनुसार रात्रि 11:44 बजे मिथुन से कर्क राशि में प्रवेश कर रहे हैं। उदयातिथि और संक्रांति के पारंपरिक नियमों के अनुसार उत्तराखंड में हरेला पर्व 16 जुलाई 2026 (गुरुवार) को ही मनाया जाएगा।

भ्रम का कारण: कुछ विद्वानों और पंचांगों में संक्रांति के समय के कारण 17 जुलाई को लेकर भी चर्चा है, लेकिन उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से कर्क संक्रांति 16 जुलाई को ही सर्वमान्य है। अतः हरेला 16 जुलाई को ही मनाया जायेगा।

हरेला बोने की तिथि और विधि

परंपरानुसार हरेला पर्व से ठीक 9 से 11 दिन पहले घरों में हरेला बोया जाता है। यह लोगों की अपनी पुरानी परंपरा के अनुसार निर्धारित है। कुछ लोग हरेला को 11 दिन, कुछ 10 दिन और कुछ परिवार 9 दिन पूर्व बोते हैं।

हरेला बोने की तिथि : इस वर्ष हरेला 6 जुलाई , 7 जुलाई और 8 जुलाई 2026 को घरों के मंदिरों में हरेला बोया जाएगा।

कैसे बोते हैं हरेला? हरेला बुवाई की शुरुवात एक अच्छी मिट्टी के चयन से होता है। जो मुख्यतः अपने खेत से लाई जाती है। मिट्टी को एक छोटी टोकरी में साफ करके डाला जाता है। सूखी मिट्टी की एक परत बिछाई है। फिर उसमें सात प्रकार के अनाज जैसे जौ , गेहूं, मक्का, चना, गहत, उड़द और सरसों के बीज डाले जाते हैं और मिट्टी की एक और परत इन बीजों के ऊपर डाली जाती है। पुनः ये सभी बीज और डालकर बारीक सूखी मिट्टी परत डालकर ढक दिया जाता है। यह प्रक्रिया चार से पांच बार की जाती है। प्राकृतिक स्रोत जैसे नौले या धारे के जल को इस टोकरी में छिड़का जाता है और इसे घर के मंदिर में रख दिया जाता है और 9 दिनों तक सुबह-शाम इसमें पानी छिड़का जाता है। 9वें दिन इसे सांकेतिक रूप से गुड़ाई कर 10वें दिन या 11वें दिन यानी कर्क संक्रांति के दिन पतीसा (काटा) जाता है।

हरेला पर्व का महत्व (Significance of Harela Festival)

पर्यावरण और हरियाली का संदेश

हरेला का शाब्दिक अर्थ ही है “हरियाली”। यह त्योहार हमें प्रकृति से जोड़ता है। उत्तराखंड में इस दिन बड़े पैमाने पर पौधरोपण करने की प्राचीन परंपरा है। यहाँ लोगों की मान्यता है कि आज के दिन लगाया गया पौधा सदैव हराभरा रहता है।

सुख-समृद्धि का प्रतीक

टोकरी में अनाज के पौधे जिसे हरेला कहा जाता है जितने लंबे और हरे-भरे होते हैं, माना जाता है कि उस वर्ष खेतों में अच्छी पैदावार होगी और घर में उतनी ही अधिक बरकत और खुशहाली आएगी। यह आने वाली नई फसल की समृद्धि का सूचक है।

शिव-पार्वती विवाह का उत्सव

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के महीने में ही भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। हरेला के अवसर पर कुमाऊं में मिट्टी के शिव-पार्वती और गणेश जी की मूर्तियां गड़ी जाती हैं, जिन्हें ‘डिकारे’ कहा जाता है। इनकी पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगा जाता है।

कैसे मनाया जाता है हरेला? (How Harela is Celebrated)

हरेला पर्व की सुबह की पूजा -पाठ कर घर के बुजुर्ग टोकरी में बोये गए हरेला को काटते हैं। इसके बाद अपने ईष्ट देवों को हरेला चढ़ाकर घर के सभी सदस्यों के सिर और कानों पर हरेला की पत्तियां (तिनके) रखते हैं। हरेला सिर में रखने की यहाँ परम्परा हरेला पूजन/हरेला लगाना कहते हैं।
बुजुर्ग अपने अनुजों को हाथ में हरेले के तिनकों को पैर , घुटने, कन्धों को छुआते हुए उनके सिर पर रखते हुए पारंपरिक कुमाऊंनी आशीष देते हैं:

जी रये, जागि रये। यो दिन-यो बार कैं भ्यटनै रये। तेरी दुबकी जस जड़, पाती क जस पौव है जौ। स्याव जस बुद्धि, स्युं जस तराण ऐ जौ। हिमाल में ह्युं छन तक, गंगज्यू में पाणि छन तक। तू जी रये, जागि रए।

हरेला पूजन के पश्चात सभी लोग अपने घरों में पूड़ी, बड़े, खीर और हलवा जैसे पारंपरिक पकवानों का आनंद अपने परिवार साथ बैठकर लेते हैं।

यहाँ भी पढ़ें : उत्तराखंड में हरेला कैसे बोया जाता है ? जानिए पारंपरिक विधि।

निष्कर्ष

उत्तराखंड की लोक संस्कृति और यहाँ के लोगों का पर्यावरण प्रेम का एक अनूठा उदाहरण है हरेला। इस वर्ष 16 जुलाई 2026 को प्रत्येक वर्ष की भांति पूरे हर्षोल्लास के साथ यह पर्व मनाया जाएगा। अगर आप भी प्रकृति प्रेमी हैं, पेड़ों के लगाव रखते हैं तो इस हरेला पर्व पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं और धरती को हरा-भरा बनाने में अपना योगदान दें।

आपको और आपके परिवार को हरेला पर्व की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं!

Vinod Singh Gariya

विनोद सिंह गढ़िया इस वेब पोर्टल के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। करीब 15 वर्षों से विभिन्न वेब पोर्टलों के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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