उत्तराखंड की लोकसंस्कृति जितनी समृद्ध और विविधतापूर्ण है, उतने ही यहाँ के लोकनृत्य भी हैं, जो हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन्हीं लोकनृत्यों में एक विशिष्ट एवं आकर्षक नृत्य है पौंणा नृत्य, जो प्रदेश के सीमांत जनपद चमोली के नीती और माणा घाटियों में रहने वाली भोटिया जनजाति की सांस्कृतिक पहचान और परंपरा का अभिन्न अंग है। यह नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, उत्सव और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।
क्या है पौणा नृत्य
पौंणा नृत्य (Pauna Dance) भोटिया जनजाति का एक पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसे सभी उत्सवों और शुभ अवसरों पर किया जाता है। हालांकि, इसका सबसे अधिक प्रचलन शादी -विवाह के शुभ अवसरों में देखने को मिलता है। ‘पौणा’ शब्द का अर्थ है – बाराती यानी दूल्हे के मेहमान। यह नृत्य विवाह के दौरान दूल्हे के रिश्तेदारों और उसके मित्रों द्वारा किया जाता है, इसीलिये इसे पौणा नृत्य कहा जाता है। यह नृत्य पारंपरिक वेशभूषा में हाथों में रुमाल के साथ ढोलों की उपस्थिति और इसके तालों एवं थापों पर नृत्य बेहद आकर्षक लगता है। वहीं अलग-अलग ताल पर अलग-अलग नृत्य किये जाते हैं।
भोटिया परम्परानुसार यह नृत्य मुख्यतः बारात के दूल्हे के घर से दुल्हन के घर जाने पर मेहमानों (पौणों) द्वारा किया जाता है। यहाँ उल्लेखनीय है कि कुमाऊं में भी मेहमानों को ‘पौंण’ कहा जाता है।
नृत्य की विशेषताएं
पौणा नृत्य (Pauna Dance) उत्तराखंड का एक व्यवस्थित और लयबद्ध लोकनृत्य है, जिसमें महिलाएं और पुरुष दोनों समान रूप से भाग लेते हैं जो कदम से कदम मिलाते हुए ढोल की पारम्परिक धुनों पर नृत्य करते हैं । इस दौरान ढोल-दमाऊं की थाप वातावरण में ऊर्जा और उत्साह भर देती है।
ग्रामीण एक-दूसरे के साथ कदम से कदम मिलाकर तालबद्ध नृत्य करते हैं। ढोल की अलग-अलग थापों और तालों पर नृत्य की भंगिमाएं भी बदलती रहती हैं, जिससे यह नृत्य और अधिक जीवंत व दर्शनीय होता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
पौणा नृत्य केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह आतिथ्य सत्कार, सामूहिक सहभागिता और लोकजीवन की खुशियों का उत्सव भी है। विवाह जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर यह नृत्य रिश्तों में मधुरता, सामंजस्यता और सामुदायिक एकता को बल देता है। (Bhotia Tribe Folk Dance)
संरक्षण की आवश्यकता
गौरतलब है कि उत्तराखंड की लोकविरासत समुद्र की भांति विशाल और गहन है, जिसमें अनेक सांस्कृतिक विरासत रूपी अमूल्य रत्न विद्यमान हैं। लेकिन आधुनिकता और समय की चकाचौंध में कई लोकनृत्य और लोकगीत धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं।
पौणा नृत्य जैसे पौराणिक और पारंपरिक लोकनृत्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित और हस्तांतरित करना आज की नितांत आवश्यकता है, ताकि हमारी भावी पीढ़ियां भी इस सांस्कृतिक धरोहर से रूबरू हो सके और इसकी जीवंतता सदा बनी रहे।
भारतीय डाक विभाग ने वर्ष 2023 में इस सांस्कृतिक विरासत को संजोये रखने के लिए एक ख़ास लिफाफा लॉन्च किया, जिसके ऊपर पौंणा नृत्य (Pauna Dance) को चित्रित किया गया है।
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निष्कर्ष
पौणा नृत्य न केवल भोटिया जनजाति की पहचान है, बल्कि यह उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति का एक अमूल्य हिस्सा भी है। इसे संरक्षित करना और प्रोत्साहित करना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है, ताकि यह परंपरा आने वाले समय में भी उसी ऊर्जा और उल्लास के साथ जीवंत रहे।










