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उत्तराखण्ड का पारम्परिक आभूषण-पौंची: इतिहास, महत्व, बनावट और आधुनिक रूप

On: December 11, 2025 10:23 PM
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pauchi

उत्तराखण्ड के पारम्परिक आभूषणों में से एक पौंची (Pauchi) अथवा पौंछी यहाँ की विवाहित महिलाओं के लिए शुभता, सौभाग्य और सांस्कृतिक गरिमा का प्रतीक रही है। कलाईयों में पहने जाने वाला यह आभूषण सोने का बना होता है, जिसे कुमाऊँ और गढ़वाल की महिलाओं द्वारा शादी-विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर पहना जाता है। पौंछी मात्र एक ही गहना नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति की पहचान भी है। इस पोस्ट में हम पौंची (Paunchi) के इतिहास, परंपरा और महत्व के बारे में विस्तृत में जानेंगे।

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पौंची का इतिहास

पौंची का शुरुआती स्वरूप राजस्थान के पारम्परिक आभूषण ‘पाहुंची’ से प्रभावित माना जाता है। मुग़ल काल के दौरान हुई परेशानियों के कारण राजस्थान से कई परिवार उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में आकर बसे, और अपने साथ आभूषण निर्माण की परंपरा और डिज़ाइन भी साथ लाए। इसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान के परिणामस्वरूप लोगों ने अपने परम्परागत आभूषण को जीवित रखा और धीरे-धीरे पौंची का प्रचलन बढ़ते गया। 

कुमाऊँ और गढ़वाल की विशिष्ट पहचान

पौंची, समय के साथ-साथ उत्तराखण्ड की स्थानीय परंपराओं का हिस्सा बन गई। यह विशेष रूप से कुमाऊँ और गढ़वाल की विवाहित महिलाओं का प्रिय गहना है जो उनके लिए बेहद शुभ मानी जाती है। विवाह, तीज-त्योहार, पूजा-पाठ और अन्य शुभ अवसरों पर इसे पहनना पहाड़ी परंपरा का हिस्सा है।

पौंची का सांस्कृतिक महत्व

एक बेटी सर्वप्रथम “पौंची” को अपने अन्य सभी गहनों के साथ कन्यादान के समय अपने कलाईयों में पहनना प्रारम्भ करती है। इस दौरान पौंची को विशेष स्थान दिया जाता है, क्योंकि इसे सौभाग्य, संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। पारंपरिक मान्यतानुसार विवाहित महिला के सोलह श्रृंगार में पौंची की उपस्थिति आवश्यक होती है। यह महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का भी द्योतक हुआ करती थी।

पौंची कैसे बनाई जाती है?

पौंची बनाने की कला उत्तराखण्ड के स्वर्णकारों में पीढ़ियों से चली आ रही है। जिसे आईये जानते हैं बनाने की प्रक्रिया –

  1. Pauchi आमतौर पर 1 तोले या उससे अधिक के वजन में बनाया जाता है।
  2. सर्वप्रथम ख़ास डिज़ाइन के युक्त छोटे-छोटे शंक्वाकार (Conical) सोने के मनके तैयार किए जाते हैं और इन सभी मनकों में लाख पिघलाकर भरा जाता है, जिससे वे मजबूत रहते हैं।
  3. इन मनकों को लाल रंग के शनील/मखमली कपड़े के आधार पर एक मजबूत धागे या तार में क्रम से पिरोया जाता है।
  4. दोनों किनारों पर हुक/कुंडी या डोरी लगाई जाती है।
  5. पौंछी को प्रायः 3 से 5 पंक्तियों में बनाया जाता है।
  6. इसमें औसतन 20 से 30 दाने पिरोए जाते हैं।
  7. लाल मखमल का रंग पौंची की सुंदरता को और बढ़ा देता है।

पहनने की परंपरा

  • इसे आमतौर पर महिलाओं द्वारा दोनों कलाईयों में पहना जाता है।
  • दुल्हन के हाथों में चूड़ियों के साथ पौंची का संयोजन बेहद सुंदर लगता है।
  • बुजुर्ग महिलाएँ भी पर्व-त्योहार में इसे धारण करती हैं।
  • कुमाऊँ क्षेत्र में अधिकतर सोने की पौंजी, जबकि गढ़वाल में चाँदी की पौंजी ज्यादा लोकप्रिय है।

वर्तमान समय की लोकप्रियता

  • आधुनिक समय में फैशन चाहे कितना भी बदल जाए, पौंछी का आकर्षण कम नहीं हुआ है।
  • शादी-विवाह, किसी धार्मिक उत्सव या किसी ग्लैमरस पहाड़ी लुक के लिए पौंची आज भी पहाड़ी महिलाओं की पहली पसंद है।
  • फैशन के दौर में आधुनिक डिजाइनरों ने इसे नए रूप में भी प्रस्तुत किया है, जैसे इसके बीच में गोल चंदक डिज़ाइन और उसके बीच में मन पसंद नग, इसके अलावा हल्के वजन में, मिक्स मेटल के साथ, रंगीन मखमली बेस, कस्टम आकार के पौंची आज बनाये जा रहे हैं।
  • वर्तमान में बाजार में अन्य मेटल्स के स्वर्ण पॉलिश युक्त बनावटी पौंची उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत 200 से 500 रूपये तक गुणवत्ता और डिज़ाइन के हिसाब से होती है। 

सोशल मीडिया पर भी पौंची को पुनः लोकप्रियता मिल रही है, जिससे यह युवा पीढ़ी के बीच फिर से ट्रेंड में है।

Pauchi क्यों विशेष है?

  • पहाड़ की संस्कृति, परंपरा और सौंदर्य का प्रतीक। 
  • विवाहित महिलाओं की शुभता का प्रतीक।
  • सादगी और सुंदरता का अद्भुत मेल। 
  • राजस्थान का ऐतिहासिक प्रभाव, पर स्थानीय रूप में एक अलग पहचान। 
  • उत्तराखंड के पहाड़ी हस्तशिल्प और कारीगरी की अनूठी मिसाल। 

यहाँ भी पढ़ें : Pahadi Nath Design : शानदार पहाड़ी नथ, देखें लेटेस्ट और ट्रेडिशनल डिज़ाइन। 

उत्तराखण्ड का यह पारम्परिक आभूषण “पौंची” केवल एक गहना नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, सौंदर्य और परंपरा का जीवंत प्रतीक है। बदलते समय में भी इसका अस्तित्व और लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि अपनी जड़ों से जुड़ा फैशन कभी पुराना नहीं होता।

Vinod Singh Gariya

ई-कुमाऊँ डॉट कॉम के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। इस पोर्टल के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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