उत्तराखंड समेत पूरे देश में होली का त्यौहार बड़े हर्षोल्लाष के साथ मनाया जाता है। बरसाने की लठ्मार होली के बाद उत्तराखंड में कुमाऊँ की होली अपने गायन परंपरा के कारण देशभर में प्रसिद्ध है, वहीं आपको आश्चर्य होगा कि इस समृद्ध परंपरा वाले प्रदेश के कुछ ऐसे गांव भी हैं जहाँ होली खेलना तो दूर लोग रंग-गुलाल से भी परहेज करते हैं। इन गांवों में न तो होली के गीत गाये जाते हैं और न ही आज तक कभी चीर बाँधी गई।
उत्तराखंड के ऐसे 250 से अधिक गांव हैं जहाँ के लोग होली का त्यौहार नहीं मनाते हैं और न ही वर्तमान में यहाँ की युवा पीढ़ी ने कभी रंगों के इस पर्व को मनाने की पहल की। ऐसा आखिर क्या कारण है जो यहाँ के लोग रंगों से इतना परहेज करते हैं ?
बागेश्वर जिले के कपकोट स्थित बिचला दानपुर के गांव शामा, लीती, भनार, गोगिना, रातिरकेठी, कीमू, नामती चेटाबगड़ समेत कई ऐसे गांव में जहाँ के लोग होली नहीं मनाते हैं और न ही पकवानों का आनंद लेते हैं। यहाँ के लोगों का मानना है कि रंग खेलने से उनके ईष्ट देव नाराज होते हैं और क्षेत्र में ओलावृष्टि, आगजनी, प्राकृतिक आपदा, रोग – व्याधियां जैसी अप्रिय घटनायें हो सकती हैं।
बिचला दानपुर निवासी प्रवीण सिंह कोरंगा का कहना है – इस क्षेत्र में भगवान मूलनारायण जी की बड़ी छत्रछाया है। कार्तिक माह की त्रयोदशी मेले में माता को रंग बिरंगी छाप, जो सीधे हिमालय को, शिवजी और माता नंदा को भेंट दी जाती है उसमें जो तथ्य हैं उसमें भारतीय परंपरा के अनुसार जो भी विधि-विधान है, जितने भी भारत में पर्व होते हैं उनमें एक उत्तर भारत का हिमालय से लगा हुआ क्षेत्र है, उसमें होली दिवाली आदि जो रंगीले त्योहार हैं उनका वर्णन करते हुए उनको पूजा जाता है और उसी में होली के रंगों का त्यौहार इंद्रधनुष के रूप में भेंट की जाती है
इस क्षेत्र में भगवान मूल नारायण जी के द्वारा बताए गए मार्ग में कार्तिक महीने की पूर्णिमा पर सब चीजों को मिलाकर पूजा की जाती है। उसी में होली का रंग बिरंगी छाप भी मां नंदा को अर्पित की जाती है। उसमें श्री कृष्ण की पूजा हो, शिवजी महाराज की पूजा हो, मां पार्वती की पूजा हो और इसमें देवी-देवताओं का मिलन कराया जाता है। पूजा के समय ही आस्था पूर्वक अर्पित रंग-गुलाल देवी-देवताओं को अर्पित कर दिए जाते हैं और लोग होली का त्यौहार नहीं मनाते हैं।
पिथौरागढ़ जनपद स्थित डीडीहाट के करीब 200 गांवों में भी होली नहीं मनाई जाती है। लोगों का कहना है अतीत में उनके पूर्वज मथुरा से होली की चीर लाये थे, लेकिन परंपरानुसार इस चीर का हरण हो गया यानी चोरी कर ली गई और उनसे होली में चीर बांधने का अधिकार समाप्त हो गया। लोगों ने इस घटना को अशुभ माना और होली मनाने का इरादा त्याग दिया। कुछ लोग मानते हैं कि होली में रंग खेलने से उनके गांवों में अप्रिय घटनाएँ होती हैं। यह मिथक यहाँ लम्बे समय से चला आ रहा है। नयी पीढ़ी ने भी इस मिथक को तोड़ने का प्रयास नहीं किया।
मुनस्यारी के तल्ला दारमा और तल्ला जोहार के गॉंवों में भी होली नहीं मनाई जाती है। यहाँ भी लोगों का भी मानना है उनके आराध्य छिपला केदार को रंग-बिरंगे परिधान और इस प्रकार के अन्य आयोजन पसंद नहीं है। इसी कारण लोग अपने आराध्य को मानते हुए होली का पर्व नहीं मनाते हैं।
इसके अलावा रुद्रप्रयाग के खुरजान और क्विली गांव में भी होली मनाने की परम्परा नहीं है। यहाँ के निवासियों की मान्यता है कि उनकी आराध्य देवी त्रिपुरा सुंदरी को चमकीले रंग -गुलाल और शोर शराबा पसंद नहीं है। यदि वे होली खेलते हैं तो देवी रुष्ट होती हैं और जिसके दुष्परिणाम ग्रामीणों को भुगतने पड़ते हैं। कहते हैं 150 वर्ष पहले लोगों ने यहाँ होली मनाने की कोशिश की। जिसके बाद यहाँ भयंकर महामारी फ़ैली और जनहानि हुई। तब से लोगों ने यहाँ होली नहीं मनाई।
इस प्रकार कहा जा सकता है उत्तराखंड के इन गांवों में होली न मनाने का मुख्य कारण उनके देवी-देवताओं के रुष्ट हो जाने से है। जो उनके प्रति आस्था और विश्वास का प्रतीक है। नयी पीढ़ी भी अपनी परंपरा और बुजुर्गों द्वारा कही गई बातों का सम्मान करते हुए आज भी होली मनाने के इच्छुक नहीं लगते और इस परंपरा को बरकरार रखे हुए हैं।










