उत्तराखण्ड की कुमाऊंनी होली, जो ब्रज की लठमार होली के बाद भारत की सबसे अनूठी और प्रसिद्ध होली है। यहाँ की होली में रंगों से अधिक शास्त्रीय रागों और लोक संगीत के साथ गायन की विशिष्ट परंपरा है। पौष महीने के प्रथम रविवार से प्रारम्भ हुई बैठकी होली में वसंत पंचमी तक भक्तिपरक (निर्वाण) होली गीतों का गायन होता है। वहीं शिवरात्रि तक अर्द्ध श्रृंगारिक और उसके बाद श्रृंगारिक होली गीतों का गायन हारमोनियम, तबला, मजीरे की धुन पर होता है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन यहाँ एक ख़ास परंपरा ‘चीर बन्धन’ के साथ खड़ी होली गाने की शुरुआत होती है।
यहाँ हम कुमाऊं में चीर बंधन के अवसर पर गाई जाने वाले एक खड़ी होली गीत के बोल प्रस्तुत कर रहे हैं। जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को साक्षी मानते हुए देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है। इस होली गीत के लिरिक्स इस प्रकार हैं –
Kaile Bandhi Cheer Holi Lyrics
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
गणपति बांधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
ब्रह्मा, विष्णु बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
शिव शंकर बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
रामचन्द्र बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
लछीमन बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
श्रीकृष्ण बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
बलीभद्र बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
नवदुर्गा बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
भोलानाथ बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
इष्टदेव बाँधनी चीर, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा
सबै नारी छिड़कत गुलाल, हो रघुनंदन राजा।
कैले बांधी चीर, हो रघुनंदन राजा

कैले बांधी चीर-भावार्थ
कैले बाँधी चीर का अर्थ है- चीर किसने बांधी ? (चीर यानि कपड़ा या कपड़े का टुकड़ा।) हे रघुनंदन राजा (भगवान श्रीराम) ! यह होली की चीर किसने बाँधी है? फिर इन्हीं पंक्तियों में उत्तर है – यह चीर गणपति यानि सिद्धि के दाता भगवान गणेश बांधते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश समेत सभी देवी-देवताओं का उल्लेख इस खड़ी होली में है। फिर अंत में कहते हैं सभी नारी गुलाल छिड़कते हुए इस चीर बांधते की परम्परा को पूर्ण करते हैं।
यहाँ उल्लेखनीय है चीरबंधन कुमाऊनी खड़ी होली की मुख्य परंपरा है। जिसके बिना कुमाऊं की होली अधूरी मानी जाती है। इस परंपरा के अंतर्गत होलिकाष्टमी या एकादशी तिथि पर किसी मंदिर के प्रांगण या सार्वजानिक स्थल पर भद्रारहित शुभमुहूर्त में पदम् की शाखा के साथ एक लंबे लट्ठे (डंडे) पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ रंग – बिरंगे कपड़े के टुकड़ों को बांधते हैं। इसी प्रकिया को चीर बंधन कहते हैं। इसी चीर को नचाते हुए होली गीतों को गाते हुए होल्यार घर-घर पहुँचते हैं। चीर बंधन के बारे में और अधिक पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ – इस परंपरा के बिना अधूरी है कुमाउनी खड़ी होली।
होली के प्रसिद्ध गीत –
- तुम सिद्धि करो महाराज।
- कुमाऊनी होली के लोकप्रिय गीत।
- हरि खेल रहे देवा तेरे द्वारे में।
- जोगी आयो शहर से ब्यौपारी।
- जल कैसे भरूँ जमुना गहरी।
यह थे कुमाऊंनी होली गीत के लिरिक्स और उसके बारे में कुछ खास जानकारी। यह पोस्ट आपको उत्तराखंड की विशिष्ट परम्परा से अवगत कराने और यहाँ की संस्कृति से जोड़े रखने के उद्देश्य से यहाँ प्रकाशित की गई है। यह जानकारी आपको अच्छी लगी तो शेयर कर अन्य लोगों तक पहुँचाने की भी कोशिश करें। ताकि हमारे इस छोटे से प्रयास को और बल मिल सके। उत्तराखंड की संस्कृति के बारे में और जानने के लिए ई-कुमाऊँ डॉट कॉम को विजिट करते रहें।












