सीता बन में अकेली कैसे रही-एक भावपूर्ण पारम्परिक होली गीत है। जो मुख्यतः उत्तराखंड के कुमाऊनी होली में होल्यारों द्वारा गाई जाती है। इस होली गीत में भगवान श्री राम के 14 वर्ष के लिए वनवास को जाने पर सीता जी द्वारा भी स्वयं उनके साथ चलने और वनवास के दौरान झेले विभिन्न प्रकार के कष्टों का वर्णन है। गीत के बोल इस प्रकार हैं-
Sita Ban Mein Akele Kaise Rahe Lyrics
हां जी सीता बन में अकेली कैसे रही..
कैसे रही दिन रात, सीता वन में अकेली कैसे रही..
राम जी रोके, कौशल्या रोके
नहीं छोड़ा पति का साथ, सीता वन में अकेली कैसे रही..
हां जी सीता रंग महल को छोड़ चली है
वन में कुटिया बनाई.. सीता वन में अकेली कैसे रही..
कैसे रही दिन रात, सीता वन में अकेली कैसे रही..
हां जी सीता षटरस भोजन छोड़ चली है
बन में कन्दमूल खाई, सीता वन में अकेली कैसे रही..
कैसे रही दिन रात, सीता वन में अकेली कैसे रही..
हां जी सीता खाट पलंग सब छोड़ चली है
बन में पतिया बिछाय, सीता वन में अकेली कैसे रही..
कैसे रही दिन रात, सीता वन में अकेली कैसे रही..
हाँ हाँ जी हाँ, सीता तेल फुलेल को छोड़ि चली है
वन में धूल रमाई, सीता वन में अकेली कैसे रही..
कैसे रही दिन रात, सीता वन में अकेली कैसे रही..
हाँ हाँ जी हाँ, सीता कंदकारो छोड़ चली है
कंटक चरण चलाई, सीता वन में अकेली कैसे रही..
कैसे रही दिन रात, सीता वन में अकेली कैसे रही..
आई विपदा, हरण हुई सीता
राम चले आखेट, सीता वन में अकेली कैसे रही..
कैसे रही दिन रात, सीता वन में अकेली कैसे रही..

यह होली सीता जी के त्याग जैसे रंग महल को छोड़ना, स्वादिष्ट भोजन का त्याग, अपना श्रृंगार न करना और रामायण काल में उनके द्वारा झेले गए विभिन्न कष्टों व अकेलेपन का चित्रण करता है।
कुमाऊनी होली गीतों में इसी तरह के सैकड़ों होली गीत हैं जिनमें देवी-देवताओं की स्तुति, धर्म-ग्रंथों के कथानक, राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाएं, राम-रावण, कौरव-पांडव युद्ध और अन्य पौराणिक बातों का सार होता है।
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