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रानीबाग (काठगोदाम) स्थित घाघरे के आकार का रंगीन शिला जिसे आज पूजा जाता है।

लगभग 800 साल पुरानी बात है जब कुर्मांचल और केदारेश्वर में कत्यूरी राजवंश का न्यायकारी राज या प्रभाव था। कत्यूरी राजवंश की राजधानी 5वीं 6वीं शताब्दी से नौवीं शताब्दी तक जोशीमठ रही। इसके बाद उन्होंने अपनी राजधानी कार्तिकेयपुर रणचुलिहाट ( गरुड़)  कत्यूर घाटी बागेश्वर में स्थापित की थी और शीतकालीन राजधानी लखनपुर बैराठ (चौखुटिया) जिसे नाम से जाना जाता है। इस बीच 12वीं सदी से दिल्ली में अफगानों, तुर्को का शासन स्थापित हो गया था। तुर्कों ने गढ़वाल हरिद्वार के रास्ते  उत्तराखंड लूटने के लिये  हमला किया तथा कुमाऊँ में हल्द्वानी के रानीबाग से हमला किया था,  जिसमें विदेशी आक्रांताओं को कत्यूरी सेना से मुंह की खानी पड़ी और बुरी तरह हार गये।

इसी कत्यूरी राजवंश की एक रानी थी जिया जो खातस्यूंगढ़ के राजा और रानी पियुलों देवी की पुत्री थी। उनका बचपन का नाम मौला देवी था तथा उनके दो भाई थी जिनका नाम अजब राय और गजब राय था। उस समय कत्यूरी वंश के राजा प्रीतमदेव यानि पृथ्वीपाल थे जिनसे मौला देवी का विवाह हुआ था। राजा प्रीतमदेव की पहली पत्नी धर्मा यानि गंगावती थी। मौला देवी उनकी दूसरी रानी थी। न्याय, शक्ति, भक्ति, प्रजापालन के कारण उन्हें राजमाता का दर्जा प्राप्त था। पहाड़ों में मां को जिया भी कहा जाता है तथा मौला देवी प्रजापालक थी इसलिए लोग उनकी नंदा देवी के रूप में पूजा करने लगे थे। लोग उन्हे नंदा देवी का अवतार मानने लगे थे और इस तरह से मौला देवी का प्रचलित नाम जिया रानी हो गया था।     

राजा प्रीतमदेव और राजमाता जिया रानी के पुत्र थे कत्यूरी वंश के महान शासक धामदेव जिन्होंने दिल्ली के शासक को सागरघाट के युद्ध में पराजित किया था। जब धामदेव छोटे थे तो राजमाता जिया रानी राज्य का कार्यभार देखने के लिये अपने पुत्र के साथ चित्रशिला गोलाघाट चली गयी। जहां उन्होंने खूबसूरत रानी बाग बनवाया था। जिया रानी यहां बहुत समय तक रही तथा रानीखेत का नाम भी मां जिया रानी के नाम पर पड़ा है।  

इस बीच समरकंद के शासक तैमूर लंग ने भारत पर आक्रमण कर दिया। उसने मेरठ से आगे बढ़कर हरिद्धार, गढ़वाल और कुमांऊ पर भी हमला कर दिया। हरिद्वार में तब सामंत राजा का शासन था। उन्होंने तैमूर की सेना का डटकर सामना किया लेकिन आखिर में उनकी पराजय हुई। तैमूर की सेना ने वहां पर भयंकर मारकाट मचायी, जबरन धर्म परिवर्तन करवाया। राज परिवार ने उत्तराखंड में नकौट क्षेत्र में शरण ली। तैमूर की सेना की एक टुकड़ी पहाड़ों पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ी। जब सूचना राजा पृथवीदेव पाल को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने कुमांऊ में एक बड़ी सेना तैयार कर दी। तैमूर की सेना और कत्यूरी वीरों के बीच रानीबाग क्षेत्र में युद्ध हुआ था। कत्यूरी सेना का नेतृत्व कोई और नहीं बल्कि राजमाता जिया रानी कर रही थी। उनकी वीरता, साहस और पराक्रम के सामने तैमूर की सेना की एक नहीं चली। उनके छक्के छूट गये। तैमूर की सेना को मुंह की खानी पड़ी। उसके बचे हुए सैनिक कायरों की तरह भाग खड़े हुए लेकिन वे कायर ही नहीं धूर्त भी थे। तैमूर की एक दूसरी अतिरिक्त सेना ने कत्यूरी सेना पर छिपकर हमला किया। राजा प्रीतमदेव को जब इसका पता चला तो वह स्वयं सेना लेकर आये और उन्होंने मुस्लिम हमलावरों को मार भगाया। इस तरह से तैमूर लंग को दो बार कत्यूरी सेना से हार का सामना पड़ा था।

जब प्रीतमदेव का निधन हुआ तब धामदेव छोटी उम्र के थे और ऐसे में राजमाता जिया रानी ने उनके संरक्षण में राजा धाम देव हुये और स्वयं राजकाज संभाला था। अपने न्यायप्रिय, धर्मप्रिय शासन के कारण राजमाता जिया रानी की पूरे देश में जय जयकार होने लगी थी।

अब बात करते हैं राजमाता जियारानी के दैवीय प्रभाव की। कुमांऊ में काठगोदाम से एक जगह है रानीबाग। कहा जाता है कि राजमाता जियारानी एक बार यहां चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने के लिये आयी थी। जब रानी नहाने के लिये गौला नदी में पहुंची तो तब एक दीवान काफी आगे अपनी सेना के साथ नदी पार कर रहा था। जब मां जिया स्नान कर रही थी तो उनके कुछ केश टूटकर नदी में प्रवाहित हो गये थे। कहते हैं कि दीवान जब नदी पार कर रहा था तब नदी के बीच में घोड़े के पांव इन बालों पर उलझ गये थे। दीवान नदी में गिर गया। उसने जब घोड़े के पांवों पर उलझे बालों को देखा तो वह उन पर मोहित हो गया। वह सोचने लगा कि जिस स्त्री के केश इतने सुंदर हैं वह कितनी सुंदर होगी। वह यह पता करने के लिये नदी के किनारे आगे बढ़ने लगा। वह उस स्थान पर पहुंच गया जहां मां जिया रानी स्नान कर रही थी। तब तक जिया मां स्नान करके वस्त्र सुखा रही थी। उन्होंने एक विशाल शिला पर अपना घाघरा सुखाने के लिये डाल रखा था। तभी उस दीवान ने सेना की सहायता से रानी मां को घेर लिया। मां के रक्षक भी तब साथ में नहीं थे लेकिन वह अकेली ही दीवान की सेना से भिड़ गयी और उन्हें पराजित करने में सफल रही। मां जिया रानी उस स्थान को अपवित्र होने से बचाने के लिये वहां से कुछ दूरी पर स्थित गुफा में चली गयी। इसे आज भी जियारानी की गुफा के नाम से जाना जाता है। उन्होंने गुफा में पहुंचकर भगवान शिव का स्मरण किया। मां जिया रानी वहां से अलोप हो गयी और सीधे राजधानी बैराठ में अपने ईष्ट देव के दरबार में प्रकट हुई। आज भी रानीबाग में मां जिया रानी की गुफा में दो रास्ते हैं। कहते दोनों रास्ते हरिद्वार तथा बैराठ चौखुटिया निकलते हैं। आज आपको वहां दो छिद्र यानी रास्ते गर्भ गुफा देखने को मिलते हैं। 

गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं - मानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था।  माना जाता है कि इस शिला में ब्रह्मा, विष्णु, शिव की शक्ति समाहित है। माँ जिया की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है। कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम स्थित रानीबाग में जियारानी की गुफा का ऐतिहासिक महत्व है। 

उत्तराखंड के कत्यूरी वंशज आज भी राजमाता कुलदेवी जिया रानी पर बहुत गर्व करते हैं, उनकी याद में दूर-दूर बसे उनके वंशज (कत्यूरी) प्रतिवर्ष 13 जनवरी  मकर संक्रांति  के शुभ अवसर पर यहां आते हैं। पूजा-अर्चना करते हैं। कड़ाके की ठंड में भी पूरी रात भक्तिमय रहती है।
 

लेखक : कुॅवर योगेन्द्र सिंह बंगारी 

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