टेक्वा : गढ़वाली लोकजीवन का सहारा, संबंध और सांस्कृतिक रूपक

हमने अपने बुजुर्गों के मुँह से टेक्वा या टेकुआ शब्द अवश्य सुना होगा। पुराने समय में गढ़वाल के लोक जीवन में यह एक प्रथा के रूप में प्रचलित थी, वहीं कुमाऊँ के कुछ क्षेत्रों में भी इसका प्रभाव देखने को मिलता था। क्या है टेक्वा का अर्थ ? पढ़िए इस पोस्ट में -

tekwa garhwali culture

गढ़वाल में “टेक्वा” (Tekwa) शब्द की पहचान लंबे समय तक स्त्री-जीवन के संदर्भ में रही। इसका कारण यह था कि लोकजीवन में “टेक्वा” केवल विवाह का पर्याय नहीं था। अनेक परिस्थितियों में कोई पुरुष बिना औपचारिक वैवाहिक संस्कार के भी किसी स्त्री का टेक्वा बन सकता था। वह उसका सहचर, संरक्षक, श्रम-साझेदार, विश्वासपात्र या जीवन-संकट का सहारा होता था। दोनों के बीच संबंध का स्वरूप परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता था; वह केवल दांपत्य तक सीमित नहीं था। बाद के समय में इसी लोकव्यवस्था को सामान्यतः “टेक्वा विवाह” कहकर संबोधित किया जाने लगा, जिससे “टेक्वा” शब्द का व्यापक अर्थ धीरे-धीरे एक सामाजिक प्रथा तक सीमित होकर रह गया। जबकि लोकभाषा और लोकस्मृति में “टेक्वा” का मूल अर्थ आज भी वही है—वह व्यक्ति जो किसी के जीवन का संबल बन जाए।

टेक्वा का अर्थ

टेक्वा” शब्द का मूल “टेक” है, जिसका अर्थ है—सहारा, अवलंब या आधार। लोकभाषा में टेक केवल शरीर का सहारा नहीं, बल्कि मन, जीवन और संबंधों का भी संबल है। इसलिए टेक्वा का अर्थ केवल किसी सामाजिक व्यवस्था के पात्र से नहीं, बल्कि उस मनुष्य से है जो दूसरे मनुष्य के जीवन में भरोसे का आधार बनता है।

गढ़वाल के सामाजिक इतिहास में यह शब्द एक विशिष्ट व्यवस्था से जुड़ गया। साहित्यकार और इतिहासकार भजन सिंह ‘सिंह’ ने अपनी पुस्तक आर्यों का आदि देश मध्य हिमालय में “टेक्वा” का उल्लेख करते हुए बताया है कि यह व्यवस्था मुख्यतः विधवा, परित्यक्ता अथवा अकेली स्त्री के सामाजिक संरक्षण से संबंधित थी। टेक्वा केवल पति नहीं होता था; वह सहचर, रक्षक, श्रम-साझेदार और परिवार का आधार भी होता था। यह व्यवस्था शास्त्रीय विधान से अधिक लोकजीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं से उपजी थी। मध्य हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, पुरुषों का प्रवास और सामुदायिक जीवन की संरचना ने इसे जन्म दिया। इसलिए टेक्वा को केवल विवाह की दृष्टि से देखना उसके वास्तविक सामाजिक अर्थ को संकुचित कर देना होगा।

लेकिन लोकभाषा किसी शब्द को एक अर्थ में बाँधकर नहीं रखती; वह समय और समाज के साथ उसके अर्थों का विस्तार भी करती है। “टेक्वा” इसका सबसे सुंदर उदाहरण है। सामाजिक इतिहास में जहाँ यह शब्द एक व्यवस्था का द्योतक है, वहीं लोकस्मृति में वह फिर अपने मूल अर्थ—सहारे—की ओर लौट आता है। यही कारण है कि नरेंद्र सिंह नेगी के मार्मिक गीत “क्वी सुणदौ मेरी खैरी, क्वी गणदौ मेरा दुख” गीत की एक अंतरा की पंक्ति है क्वी बणदौ मेरु टेक्वा देन्दु मैं सारू ।, में “टेक्वा” किसी सामाजिक प्रथा का पात्र नहीं, बल्कि उस आत्मीय मनुष्य का प्रतीक बनकर उभरता है जो बिना किसी अपेक्षा के मन की बात सुन सके, दुख में साथ खड़ा रह सके और जीवन की कठिन राहों में संबल बन सके। वहाँ टेक्वा किसी संबंध-विशेष का नाम नहीं, बल्कि उस मानवीय उपस्थिति का रूपक है जो अकेलेपन को बाँट लेती है। लोकगीत इस प्रकार शब्द को उसके सबसे व्यापक और मानवीय अर्थ में पुनः प्रतिष्ठित कर देता है।

इसी अर्थ का सबसे सशक्त साहित्यिक विस्तार साहित्यकार नरेंद्र कठैत के व्यंग्य-संग्रह आर-पारै लड़ैं में मिलता है। उनके व्यंग्य “टेक्वा” में यह शब्द एक मार्मिक रूपक बन जाता है। लेखक टेक्वा की तुलना हाथ की छड़ी से करते हैं। जब तक मनुष्य को सहारे की आवश्यकता होती है, वह छड़ी उसके लिए अनिवार्य होती है; लेकिन जैसे ही वह स्वयं को समर्थ समझने लगता है, सबसे पहले उसी छड़ी को भुला देता है। व्यंग्य का लक्ष्य छड़ी नहीं, बल्कि मनुष्य की कृतघ्नता है। जीवन में जिन लोगों ने कठिन समय में हमें संभाला, संकट में साथ दिया और गिरने से बचाया, वही लोग समय बदलते ही उपेक्षित हो जाते हैं। कठैत का “टेक्वा” वस्तुतः मनुष्य की स्मृति, संवेदना और नैतिक उत्तरदायित्व पर लिखा गया व्यंग्य है।

इतिहास, लोकगीत और आधुनिक साहित्य—इन तीनों संदर्भों को एक साथ रखकर देखें तो स्पष्ट होता है कि “टेक्वा” गढ़वाली संस्कृति का एक बहुस्तरीय शब्द है। इतिहास में वह एक सामाजिक व्यवस्था है; लोकगीत में आत्मीय सहचर का प्रतीक; और आधुनिक साहित्य में मनुष्य के जीवन के उन अदृश्य सहारों का रूपक, जिनकी कीमत प्रायः उनके छूट जाने के बाद समझ आती है। यही बहुस्तरीयता इस शब्द को केवल एक प्रथा से ऊपर उठाकर एक सांस्कृतिक मूल्य का दर्जा देती है।

आज मनुष्य पहले से कहीं अधिक भीड़ में है, लेकिन शायद पहले से कहीं अधिक अकेला भी। संबंधों का विस्तार हुआ है, आत्मीयता का नहीं; परिचित बढ़े हैं, पर भरोसे के लोग कम हुए हैं। स्वार्थ ने सामाजिक व्यवहार को इस तरह घेर लिया है कि मनुष्य अब दूसरे मनुष्य का टेक्वा बनने के बजाय उसका उपयोग करना अधिक सीख गया है। ऐसे समय में गढ़वाली लोक का यह शब्द हमें याद दिलाता है कि सभ्यता का वास्तविक आधार संपत्ति या शक्ति नहीं, बल्कि वह मनुष्य है जो दूसरे मनुष्य का संबल बन सके। इसलिए “टेक्वा” केवल अतीत की एक लोकव्यवस्था नहीं, बल्कि आज के समाज के लिए भी एक नैतिक और सांस्कृतिक आवश्यकता है।

लेख : श्री शैलेन्द्र जोशी

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