उत्तराखंड की पवित्र धार्मिक चारधाम यात्रा की शुरुआत एक बेहद महत्वपूर्ण और अनूठी परंपरा ‘गाड़ू घड़ा’ (Gadu Ghada) तेल कलश यात्रा से मानी जाती है, जो बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले श्रद्धा और विधि-विधान के साथ प्रारंभ होती है। इस यात्रा में उत्तराखंड की सुहागिन महिलाओं द्वारा निकाले गए तिलों के तेल को एक विशेष कलश जिसे गाड़ू घड़ा कहते हैं बद्रीनाथ धाम तक पहुँचाया जाता है।
चारधाम यात्रा 2026 के लिए गाडू घड़ा तेल कलश यात्रा 8 अप्रैल को नरेंद्र नगर (टिहरी गढ़वाल) से प्रारंभ हो गई है। 20 अप्रैल को यह यात्रा ज्योतिर्मठ और 22 अप्रैल की शाम बद्रीनाथ धाम पहुँच जाएगी । 23 अप्रैल को धाम के कपाट खुलने पर भगवान बद्रीविशाल जी के इस गाड़ू घड़े के तेल से महाभिषेक किया जायेगा।
गाडू घड़ा तेल कलश यात्रा का मुख्य उद्देश्य भगवान बद्रीनाथ के महाभिषेक और अखंड ज्योति के लिए पवित्र तिलों के तेल को मंदिर तक पहुंचाना होता है। यह तेल साधारण नहीं होता, बल्कि इसे अत्यंत पवित्र प्रक्रिया के तहत निकाला जाता है। टिहरी जनपद के नरेंद्रनगर स्थित राजमहल में इस तेल को निकालने के लिए विशेष आयोजन होता है, जहां राजमहल की महारानी की देखरेख में सुहागिन महिलाएं पारंपरिक ओखली, मूसल और सिलबट्टे से तिलों की पिराई कर तेल निकालती हैं। इस दौरान महिलाएं पीत वस्त्र धारण कर व्रत रखती हैं, जो इस प्रक्रिया की पवित्रता और शुचिता को बढ़ाते हैं ।
जब यह तिल का तेल तैयार हो जाता है, तो उसे एक विशेष कलश पात्र में भरा जाता है। इसी तेल से भरे कलश को ‘गाडू घड़ा’ कहते हैं। इसके बाद डिमरी पुजारियों द्वारा इसे नरेंद्रनगर से बद्रीनाथ धाम तक एक भव्य और पारंपरिक यात्रा के रूप में ले जाया जाता है। बद्रीनाथ धाम तक गाडू घड़े को पहुँचाने की प्रक्रिया गाडू घड़ा तेल कलश यात्रा कहलाती है। यह मात्र एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि सामूहिक आस्था और भक्ति का प्रतीक भी होती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं और भगवान बद्रीविशाल के प्रति अपनी श्रद्धाभाव दिखाते हैं।
गाडू घड़ा तेल कलश यात्रा के साथ ज्योतिर्मठ से आदिगुरु शंकराचार्य जी की डोली भी शामिल होती है। योग ध्यान बद्री मंदिर पांडुकेश्वर पहुँचने पर इस यात्रा में भगवान उद्धव एवं भगवान कुबेर की डोलियाँ भी गाडू घड़ा कलश यात्रा और आदिगुरु शंकराचार्य जी की डोली के साथ बद्रीनाथ धाम तक जाती है।
गाडू घड़े के तेल का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग उस दिन होता है, जब शीतकाल के बाद भगवान बद्रीविशाल के कपाट खोले जाते हैं। कपाट खुलने के अवसर पर होने वाले पहले महाभिषेक में इसी गाड़ू घड़े के तेल से भगवान बद्रीविशाल का अभिषेक किया जाता है और फिर उनका विशेष श्रृंगार किया जाता है।
गाडू घड़ा तेल की महत्ता सिर्फ इसी दिन तक सीमित नहीं रहती बल्कि यह तेल अगले छः महीनों तक बद्रीनाथ धाम में ब्रह्म बेला की पूजा में भगवान के श्रृंगार के लिए उपयोग किया जाता है। इस तरह यह परंपरा केवल एक दिन की नहीं, बल्कि पूरे तीर्थकाल में निरंतर चलने वाली श्रद्धा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
सदियों से चली आ रही यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को प्रगाढ़ करती है, बल्कि समाज में एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी संदेश देती है। नरेंद्रनगर राजमहल से शुरू होकर बद्रीनाथ धाम तक पहुंचने वाली यह यात्रा हर वर्ष चारधाम यात्रा के शुभारंभ का प्रतीक है और श्रद्धालुओं के मन में एक नई सकारातमक ऊर्जा और विश्वास का संचार करती है।
‘गाडू घड़ा तेल कलश यात्रा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उत्तराखंड के लोगों की आस्था और विश्वास का वह दीप है, जो हिमालय की गोद में बसे बद्रीनाथ धाम तक कठिन रास्तों को पार कर भक्ति की लौ को प्रज्वलित करता है। भगवान बद्रीविशाल आपकी मनोकामना पूर्ण करें।










