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कोरोना महामारी के बीच जब दिमाग और दिल के बीच जंग चल रही थी तो यह एक बहुत महत्वपूर्ण फैसला बन गया था कि कहीं दूर इस कंक्रीट भरे जंगल से निकला जाए और मशीन बनने का जो क्रम था उससे दूर इंसान बनने की ओर निकला जाए। अचानक से फैसला करा और लगभग 1:00 बजे ऑफिस छोड़ दिया और सीधा निकल गया हल्द्वानी के लिए।

अब हल्द्वानी से अपने दोस्त नैनीताल निवासी Nitesh Pant को फोन करा और वह भी साथ चलने के लिए तैयार हो गया तो प्लान कुछ इस तरह बना कि हल्द्वानी पहुंचकर सोचा जाएगा किस तरफ निकला जाए। कोरोना काल के समय की सरकारी गाइडलाइंस का पालन करते हुए मै यूपी से उत्तराखंड लगभग 7 से 8 महीने बाद पहुंच रहा था और शायद ही हाल के सालों में इतना मुझे टाइम हुआ हो कि मैं पहाड़ से दूर रहा हूं। हल्द्वानी पहुंचते ही सामने पहाड़ देख बचपन का समय याद आ गया जब बस से हल्द्वानी पहुंच कर पहाड़ों को कितनी हसरत भरी नजरों से देखते थे, मन करा था कि रात के 10:00 बजे के समय मैं सीधे पहाड़ के लिए दौड़ लगा दूं लेकिन रुकना उचित समझा और सुबह इस छोटे से शहर को महानगर बनते अपनी आंखों से देख ही रहा था कि नितेश का मैसेज फोन पर घनघनाया कि क्या प्लान है? कब निकलना है? तो उसी समय जल्दी से 7:00 बजे मैं निकल गया पहाड़ों की तरह और नैनीताल-अल्मोड़ा के बॉर्डर पर गरमपानी के छोटे से बाजार में मुलाकात करने का समय निश्चित करा अब समस्या यह थी कि मैं अपने चार पहिए को लेकर आया था और नितेश दो पहिये से था तो हमें एक गाड़ी तो छोड़नी थी तो डिसाइड करा कि चार पहिया को मैं अपने पास के गांव जो कि गरमपानी से 20 किलोमीटर बेतालघाट वाली रोड पर पड़ता है वहां छोड़ आऊंगा और फिर हम आगे की यात्रा दो पहिए से तय करेंगे। यह सब काम करने में हमको कोई दिन का 1:00 बज गया अब हम आगे को निकले तो पहाड़ जाते समय पहाड़ का खाना और पहाड़ की चाय रास्ते में मैं कभी नहीं छोड़ता हूं तो जैसे ही आप खैरना से आगे बढ़ते हो अल्मोड़ा वाली रोड पर तो छडा एक जगह पड़ती है वहां पर एक रेस्टोरेंट कम छोटा सा होटल है हमने वहीं पहाड़ की झोई चावल और रोटी का मजा उड़ाया और हम करीब 2:00 बजे वहां से निकले अपने सफर के लिए। रास्ते में अल्मोड़ा पार करते-करते हमको शाम हो गई और इस भाग-दौड़ में हमने यह तो निर्णय कर लिया था कि हमको जाना तो पिथौरागढ़ ही है और जहां तक मैं अपने मन में यह सोच रहा था कि हम मुंसियारी जाएंगे और जिसकी मन ही मन सहमति मैंने नितेश से भी ले ली थी और हम दोनों बढ़ चुके थे मुंसियारी के लिए। 

लेकिन समय हो गया था 6 और हम थे अल्मोड़ा के आसपास तो समस्या यह थी कि हम पिथौरागढ़ पहुंचना चाहते थे, पहाड़ों में इस समय ठंड ने अपनी दस्तक देना शुरू कर दी थी। रुक-रुक आते हम चलते रहे और अंधेरा धीमे-धीमे घना होने लग गया था जल्दी हम अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ की सीमा घाट पहुंच गए। वहां पर एक चाय हम लोगों ने पी और फिर निरंतर चलते रहे। अंधेरे में मोटरसाइकिल दौड़ाते हुए हम किसी तरह 8:30 बजे पिथौरागढ़ रात को पहुंचे और वही कहीं रुकने का ठिकाना ढूंढा और कब हम बिस्तर में घुसे और हमारी आंखें बंद हो गई हमें खुद ही पता नहीं चला। सुबह जब हम उठे तो आंखों के सामने सोर घाटी का दौड़ता जीवन हमारे सामने था। हमने भी देर नहीं करी और जल्दी से करीब 6:30 बजे हमने पिथौरागढ़ छोड़ दिया और ट्रैफिक से बचने के लिए मैं अमूमन यह काम करता हूं किसी भी शहर को सुबह जल्दी छोड़ देता हूं ताकि जो शहर के आउटर का जाम है और जो शहर में है जाम है उससे हम बच सकें। हालांकि पहाड़ों में ऐसा बहुत कम होता है कि आपको जाम मिले। पिथौरागढ़ से बढ़ गए हम और पार करते हुए सामने हिमालय की चोटियां मन को आनंदित कर रही थी। हमें महसूस हो रहा था कि हम थोड़ी ही देर में उन्हें और पास से देख सकते हैं। पिथौरागढ़ को पार करते हुए हम जब आगे बढ़ रहे थे तो एक जगह ओगला पड़ती है। यह कोई सुबह की 10:00 बजे हम पहुंच चुके थे और चाय का आनंद ले रहे थे कि तभी मैंने अस्कोट के अपने दोस्तों में उमेश पुजारी को फोन करा और पूछा कि क्या दारमा घाटी खुल चुकी है वहां से जानकारी मिली कि हां दारमा घाटी दो-तीन दिन पहले ही खुली है। क्योंकि अक्सर वहां मलबा गिरने के कारण बरसात के समय वह बंद हो जाती है। जैसे ही मुझे वहां से कंफर्मेशन मिला की दारमा घाटी खुल चुकी है तो हमने तुरंत निर्णय लिया कि हम मुनस्यारी नहीं अब दारमा की ओर बढ़ेंगे। दारमा घाटी देखने का मैं प्लान पिछले दो-तीन सालों से बना रहा था लेकिन हर बार कुछ ना कुछ हो जाता था और एक बार तो आधे रास्ते से मैं वापस आया। यह समय बिल्कुल मन मुताबिक था हमारे पास कुल जमा 3 दिन थे। 


दारमा घाटी हमारे सामने थी तो हम सीधे निकल पड़े दारमा की ओर। रास्ते में असकोट में उमेश भाई से मुलाकात कर थोड़ी जानकारियां इकट्ठा करी और उस अनदेखे रास्ते की तरफ बढ़ गए जिसके बारे में हमने अभी तक सुना था। अस्कोट से आगे जौलजीबी होते हुए हम काली नदी के किनारे- किनारे धारचूला पहुंच गए जो नेपाल और भारत की सीमा पर बसा एक तुलनात्मक रूप से बड़ा कस्बा है। धारचूला शहर से कोई 3 किलोमीटर पहले ही एक रास्ता धारचूला शहर की तरफ जाता है और एक रास्ता ऊपर की तरफ चला जाता है। तवाघाट की तरफ जहां हमें आगे बढ़ना था तो हम उस रास्ते पर आगे बढ़ गए और इस रास्ते पर मैं कोई पांच छह बार ही आया हूंगा तो यह रास्ता मेरे लिए अभी भी नया जैसा था और बहुत रोमांचक भी था। क्योंकि  कुमाऊं के इस हिस्से में पहाड़ अधिक खड़े लंबे और थोड़े-थोड़े से डरावने भी लगते हैं और नीचे बहती काली नदी का उफान उनको और रास्ते को और रोमांचित करता है। हमें नहीं पता था कि कुछ ही घंटों में हमारी असल परीक्षा होने वाली है। असल परीक्षा माने रोड से हमारी जंग शुरू होने वाली है। किसी तरह हम आगे बढ़ते हुए तवाघाट पर पहुंचे। यहां पर धौली नदी और काली नदी का संगम होता है और यहीं से दो रास्ते जाते हैं। एक व्यास घाटी को जाता है जहां से कैलाश मानसरोवर की यात्रा होती है और दूसरा रास्ता जाता है दारमा घाटी और चौदास। व्यास घाटी नेपाल से बॉर्डर बनाती है और बीच में काली नदी बहती है जो काला पानी से निकलती है जबकि दोनों अन्य घाटिया नेपाल से विपरीत दिशा में बढ़ती हुई जाती हैं और फिर आगे दारमा घाटी और चौदास के रास्ते अलग होते हैं  कन्च्योती, सोबला नामक जगह पर, जहां से दारमा घाटी सीधे जाती है और चौदास के लिए आपको दाएं मुड़ना पड़ता है। जिस पर नारायण आश्रम आगे पड़ता है। वर्तमान में दारमा घाटी में 17 गांव हैं ऐसी जानकारी मुझे मिली। पहले बताते हैं 15 गांव थे, 2 गांव शायद अभी जुड़े हैं। ऐसी जानकारी मुझे गांव में मिली चलते-चलते अब हम दारमा घाटी में एंटर कर गए थे और अब दारमा घाटी के गांव आना शुरू हो चुके थे, दरसेला, नांगलिंग, बॉलिंग गाँव पार करते हुए हम दुग्तू गांव करीब 4:00 बजे पहुंचे। दुग्तूगाँव पंचाचूली  बेस कैंप के लिए ट्रैकिंग इसी गांव से शुरू होती है यहां पर छोटे-छोटे दो तीन होटल हैं, जहां पर रुकने का और खाने की व्यवस्था हो जाती है। बात करते हुए पता चला कि दुग्तू गांव में करीब 100 परिवार रहते हैं। इस कठिन परिस्थिति में भी इन लोगों ने अपना गांव नहीं छोड़ा है हालांकि इस समय में अभी भी माइग्रेशन होता है और यह लोग धारचूला में बसी अपनी छोटी-छोटी बस्तियों में चले जाते हैं। यहां के सारे गांव माइग्रेशन करते हैं जाड़ा अक्टूबर के आखिरी से पड़ना शुरू हो जाता है और अक्टूबर आखिरी से ही माइग्रेशन चालू हो जाता है जो दिसंबर तक चलता रहता है और फिर गांव में वापसी अप्रैल के महीने में ही हो पाती है। थोड़ी देर गांव में रुकने के बाद हमने पंचाचुली बेस कैंप की ओर बढ़ना सही समझा। हमने नीचे दुग्तूगांव में  ईश्वर सिंह दुग्ताल जी से बात करी उन्हीं के लड़के ऊपर पंचाचूली बेस कैंप में रुकने की व्यवस्था देखते हैं। वहां रुकने की व्यवस्था कंफर्म होने पर हम बेस कैंप की तरफ बढ़ चुके थे। गांव से निकलते ही एक खड़ी चढ़ाई आपका स्वागत करती है और उस चढ़ाई से दुग्तूगांव दिखता है और सामने दिखता है दातू गांव, करीब दो-तीन किलोमीटर का यह ट्रैक है और जहां पर आप भोजपत्र के जंगल से गुजरते हैं। मैंने अपने जीवन में भोजपत्र पहली बार देखा था और जिसकी एक छोटी सी टहनी में अपने साथ लखनऊ भी लाया। 

एक डेढ़ घंटे की ट्रैकिंग के बाद हम बेस कैंप पहुंच चुके थे और जहां पहले से ही हमारे आने की सूचना थी। हमसे पहले बस एक ही ग्रुप डीडीहाट से यहां आया था और हम यहां आने वाले दूसरे लोग थे। बेस कैंप से पंचाचुली साफ तो दिख रही थी लेकिन उसकी दो चोटी एक पहाड़ के पीछे छुपी थी। पंचाचुली को मुंसियारी से हम लगातार देखते रहे हैं लेकिन पहली बार इतने पास से देखना रोमांचित करने जैसा था। हमने रात को वहां रुक रहे और हमारी व्यवस्था देख रहे लड़कों से बात करी और वह भी बिल्कुल अपनेपन के साथ हमसे मिले, हमने बहुत बातें करी गांव की बातें करी, इधर-उधर की बातें करी। उनकी बातें करी, अपनी बातें करी। 8:00 बजे हमें गरमा गरम खाना परोस दिया गया और हमने वहीं रसोई में बैठकर वह खाना खाया और दिन भर की थकान के बाद उस खाने का स्वाद और भी बढ़ गया था। हमें बताया गया कि सुबह 6:00 बजे के आसपास सूरज की पहली किरण पंचाचुली की चोटियों पर पड़ती है और वह दृश्य अवश्य देखा जाना चाहिए और हमें यह भी बताया गया कि हमें उठा दिया जाएगा। हम नियत समय पर अपने इग्लू रूमा कमरे में चले गए और दिनभर के सफर को याद करते हुए कब आंख लगी पता ही नहीं चला। सुबह पंचाचुली को देखने की हसरत लिए हम 4:30 बजे ही उठ गए और बाहर आकर देखा तो रात के अंधेरे में भी पंचाचुली हमें साफ दिख रही थी। अब धीमे-धीमे सुबह का उजाला होने को था और एक-एक रात का अंधेरा सिमट रहा था, पंचाचुली और भी स्पष्ट दिखने लग गई थी। हम तैयार थे और फिर वह समय भी आ गया जब वह अद्भुत नजारा हमारे सामने था। हमने पंचाचुली की चोटी पर सूरज की पहली किरण देखी और वह नजारा अपनी आंखों से देखना मतलब लाइफटाइम एक्सपीरियंस था। अब हम चल चुके थे जीरो पॉइंट की तरफ। बेसकैंप को छोड़कर भोजपत्र के जंगलों से आगे बढ़ते हुए अब कहीं-कहीं पर हमें सपाट मैदान भी मिल रहे थे और अब जल्दी ही बेसकैंप हमारी नजरों से दूर हो चुका था और हम पंचाचुली के और करीब पहुंच रहे थे। बेस कैंप से जीरो पॉइंट कोई 3 किलोमीटर का एक छोटा सा ट्रैक है जिस पर चलते हुए आपको तमाम अनेक तरह की वनस्पतियां दिखती हैं ग्लेशियर का पानी निकलते हुए दिखता है और बीच-बीच में बड़े-बड़े बर्फ के भूखंड टूटते हुए भी आप सुनते हैं और अचानक से कहीं से झरना भी फूटते हुए आप देखते हैं। अद्भुत नजारा था जीरो पॉइंट पहुंचने के बाद आपके सामने बस पंचाचुली होती है और आप होते हैं। बीच में कोई अवरोध नहीं होता है आप उसकी बनावट उसकी जड़ से देखते हैं और खुद को कितना छोटा महसूस करते हैं यह शब्दों में बयां नहीं कर सकते। वहां आकर आपको अपनी तुच्छता का एहसास होता है और उस महान हिमालय को बस देखते ही जाने का मन होता है। आधा घंटा करीब बिताने के बाद हम बेस कैंप की तरफ लौट आए क्योंकि आज की हमें पिथौरागढ़ के लिए निकलना था तो हम उस जल्दी में भी थे और जल्दी जल्दी हम करीब 10:00 बजे नीचे दुग्तु पहुंच चुके थे। 


रास्ते में हमें भेड़-बकरी चराते हुए अन्वाल मिले जो अपनी भेड़-बकरियों को यहां बुग्यालो की घास खिलाने लाए थे और जल्द ही अब वह भी नीचे भाभर की तरफ निकलने वाले थे। दुग्तु गांव पहुंचने के बाद हम आगे दातु गांव भी गए जहां जसुली आमा का गांव है और वहां हमने वह मूर्ति भी देखी जो हाल ही में लगाई गई है। यहां से यह रोड आखरी सीपू गांव तक जाती है जहां आइटीबीपी का कैंप भी है। वेदांग में उसके बाद यह रास्ता पूरा पैदल है और इसी रास्ते पर आगे सिन्ला पास का ट्रैक भी होता है जो दार्मा से होकर व्यास घाटी मे निकलता है, हम जल्दी में थे इसलिए लौट आए। 12:00 दुग्तु गांव से निकलते हुए हम कोई रात को 8:00-8:30 बजे पिथौरागढ़ पहुंचे और अगले दिन सुबह 6:00 बजे पिथौरागढ़ छोड़ते हुए मैं उसी रात करीब 2:00 बजे अपने घर लखनऊ सकुशल पहुंचा और अपने साथ दारमा घाटी की रोमांचक यात्रा के अनुभव लेकर लौटा।



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