उत्तराखंड के गांवों के नाम में क्यों लगता है कोट? जानिए रोचक इतिहास

क्या आपने कभी गौर किया है कि उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों में कई गाँवों और स्थानों के नाम के अंत में 'कोट' (Kot) शब्द आता है? चाहे वह अस्कोट हो, कपकोट हो, धुमाकोट हो या कोई अन्य दूरस्थ पहाड़ी गाँव। आखिर अंत में क्यों लगाया जाता है यह "कोट"? क्या अर्थ होता है कोट का ? यहाँ पढ़िए कोट शब्द पर एक विस्तृत लेख -

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अस्कोट, कपकोट, ज्योलीकोट, बड़कोट, सिरकोट, धूमाकोट, बलुवाकोट जैसे आपने कई ऐसे गांवों और स्थानों के नाम सुने होंगे, जिनके नाम के साथ ‘कोट‘ शब्द जुड़ा हुआ है। शायद आप कभी इन गांवों में गए हों, या फिर अपनी यात्रा के दौरान किसी साइन बोर्ड या नक़्शे पर इन नामों को देखा हो। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है- इन नामों के साथ कोट शब्द क्यों जुड़ा हुआ होता है ? क्या सिर्फ यह संयोग है या फिर इसके पीछे कोई इतिहास छुपा हुआ होता है ? आखिर ऐसा क्या था कि उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में बसे इतने सारे गांव और स्थान के नाम के साथ यही एक शब्द बार-बार दिखाई देता है। (Meaning of Kot in Uttarakhand)

पहाड़ों में स्थान के नाम यूं ही नहीं पड़ते, अक्सर उनके पीछे कोई ना कोई कहानी, परंपरा, घटना या ऐतिहासिक कारण छुपा होता है। ऐसे में कोट शब्द भी अपने में एक इतिहास समेटे हुए प्रतीत होता है। यही कारण है कि यह शब्द केवल किसी गांव की पहचान भर नहीं बल्कि उत्तराखंड के अतीत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। तो आखिर कोट का क्या अर्थ है, उत्तराखंड में इतने सारे स्थानों के नाम के साथ यह शब्द क्यों जुड़ा हुआ है ? और क्या है इन नामों का संबंध किसी पुराने दौर से है ? और क्या है इसका इतिहास ? इस पोस्ट में हम इन्हीं सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करेंगे।

उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों के क्षेत्र में आपको बड़ी संख्या में ऐसे गांव, कस्बे और स्थान मिलेंगे जिनके नाम के साथ कोट शब्द जुड़ा हुआ है पहली नजर में यह सिर्फ एक सामान्य नामकरण लग सकता है लेकिन जब इन जगहों की भौगोलिक स्थिति को ध्यान से देखा जाता है तो एक दिलचस्प पैटर्न सामने आता है। ज्यादातर कोट नाम वाले गांव किसी ऊंची पहाड़ी, धार, चोटी या ऐसे स्थान पर बसे हुए हैं, जहां से आसपास का पूरा इलाका साफ दिखाई देता है। इन जगहों पर खड़े होकर कई किलोमीटर दूर तक नजर दौड़ाई जा सकती है। कहीं से घाटियाँ दिखाई देती है, कहीं दूर बसे गांव, तो कहीं जंगलों और पुराने रास्तों का पूरा फैलाव। हालांकि कोट नाम वाली सभी जगह केवल ऊंची पहाड़ियों पर ही स्थित नहीं है। कुछ कोट घने जंगलों के बीच मिलते हैं जहाँ आज भी पहुंचने के लिए लंबी पैदल यात्राएं करनी पड़ती हैं।

उत्तराखंड में कोट नाम वाले स्थान का उल्लेख केवल गांव और बस्तियों के नामों तक सीमित नहीं है, यह शब्द यहां के इतिहास, स्थानीय परंपराओं और पुराने सामाजिक ढांचे से भी गहराई से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि इतिहासकारों, स्थानीय शोधकर्ताओं और लोक परंपराओं में कोट शब्द को विशेष महत्व दिया जाता है। सदियों से यह शब्द लोगों की बोली, लोक कथाओं और स्थान की पहचान का हिस्सा बना हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि समय के साथ बहुत कुछ बदल जाने के बावजूद यह शब्द आज की जीवित है।

पुराने राजवंश समाप्त हो गए, शासन व्यवस्थाएं बदल गई और अनेक प्राचीन संरचनाओं समय के साथ नष्ट हो गई लेकिन कोट नाम आज भी उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में सुनने को मिलता है। यही बात इस शब्द को ज्यादा महत्वपूर्ण बना देती है क्योंकि यह केवल किसी स्थान पहचान नहीं बताता बल्कि उसके अतीत की ओर भी संकेत करता है। अब सबसे पहले यह कोट किसने और क्यों बनवाये थे ? क्या है इसका पूरा इतिहास यह भी इस पोस्ट में पढ़ेंगे लेकिन उससे पहले कोट शब्द का अर्थ जान लेते हैं।

कोट का अर्थ क्या है ?

कोट (Kot) शब्द का अर्थ -किसी दुर्ग, राजमहल या किसी शासक का सुरक्षित निवास स्थान माना जाता है। प्रोफेसर डी. डी. शर्मा कोट के नाम को छोटे किलों से जोड़ते हैं। वह अपनी किताब उत्तराखंड ज्ञानकोष में लिखते हैं कि ‘कोट’ दरसअल छोटा किला होता था। यह अक्सर पहाड़ी सीमाओं और मांडलिक राजाओं द्वारा तैयार कराए जाते थे। उन्हें दुर्ग और बूंगा भी कहा जाता था।

कोट शब्द संस्कृत के कूट शब्द से निकला है और कोर्ट के रक्षक को संस्कृत में कोटपाल कहा जाता था। इन छोटे-छोटे किलो में भी जो और छोटे किले होते थे उन्हें कोटुला या कोटुली कहा जाता था। जैसे कि रदगल कोटुली, गंगाला कोटुली, असवाल कोटुलिया जैसे कई नाम मिलते हैं।

पुराने समय में जब किसी राजा या स्थानीय शासक को किसी क्षेत्र को शासन करना होता था तो वह अपने रहने और प्रशासन चलाने के लिए ऐसी जगह चुनता था जो सुरक्षित भी हो और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भी। इसलिए अक्सर ऊंची पहाड़ियों धरो या ऐसे स्थान पर बनाए जाते थे जहां से दूर-दूर तक नजर रखी जा सके। इन किलों की ऊंची स्थिति केवल रहने की सुरक्षा के लिए नहीं होती थी, उनका उद्देश्य अपने राज्य की रक्षा करना, आने- जाने वाले मार्गों पर नजर रखना और किसी भी संभावित खतरे की जानकारी समय से प्राप्त करना भी था। यही कारण था कि कोट केवल एक इमारत नहीं बल्कि सत्ता, सुरक्षा और शासन का केंद्र हुआ करता था।

किसी क्षेत्र में कोट का होना इस बात का संकेत माना जाता था कि वहां किसी राजा, सामंत या स्थानीय शासन का प्रभाव और नियंत्रण मौजूद है। आम लोगों की बस्तियां धीरे-धीरे विकसित होनी शुरू हो गई और फिर यही बस्तियां गांव और कस्बों में बदल गई। इन किलों का महत्व इतना ज्यादा था कि आसपास रहने वाले क्षेत्र की पहचान भी इसी के नाम से होने लगी। यही वजह है कि सदियों के बाद भी उत्तराखंड के कई गांव के नाम में कोट शब्द आज तक बना हुआ है। यह न केवल भौगोलिक पहचान है बल्कि अपने भीतर इतिहास की कई परतें समेटे हुए हैं।

कोट का इतिहास

इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार प्राचीन काल में इस पूरे क्षेत्र में नाग, खस, किरात और हूँण जैसे समुदायों का निवास था। इन समुदायों का उल्लेख अलग-अलग ऐतिहासिक परंपराओं और लोक कथाओं में मिलता है। सदियों तक इन घाटियों में रहने वाले लोगों ने यहां की संस्कृति सामाजिक व्यवस्था और जीवन शैली को आकार दिया। समय के साथ कुमाऊं में अलग-अलग राजवंशों का उदय हुआ प्रारंभिक काल में सूर्यवंशी शासकों के प्रभाव का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि लंबे समय तक इस क्षेत्र में अलग-अलग हिस्सों पर उनका अधिकार रहा। (History of Kot in Uttarakhand)

इसके बाद कत्यूरी राजवंश का उदय हुआ। जिसे उत्तराखंड के इतिहास के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राजवंश में गिना जाता है। कत्यूरी शासकों के समय कुमाऊं का राजनीतिक और आर्थिक महत्व बड़ा, व्यापारिक मार्गों का विकास हुआ, मंदिरों के निर्माण हुए और प्रशासनिक व्यवस्था में भी मजबूती मिली। कत्यूरी शासन के बाद चंद्रवंश ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति का विस्तार किया। समय के साथ चंद्रवंश ने कुमाऊं के ज्यादातर हिस्सों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और कई शताब्दियों तक इस क्षेत्र पर शासन किया। उनके शासनकाल को कुमाऊं के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इसी काल में कई प्रशासनिक केंद्र विकसित हुए, नये नगर बसे और राज व्यवस्था ज्यादा संगठित रूप में सामने आए। यह वही समय था जब पहाड़ों में बने किले और दुर्ग शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

राजा, सामंत और क्षेत्रीय शासक जिन सुरक्षित दुर्गों या किलों में निवास करते थे, उन्हें ही कोट कहा जाता था। यह केवल रहने की जगह नहीं हुआ करते थे बल्कि सट्टा सुरक्षा और प्रशासन के प्रमुख केंद्र भी थे यहीं से राजा आसपास के क्षेत्र का संचालन किया करते थे और राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे। पर्वतीय क्षेत्रों में किले बनाने के लिए विशेष रूप से ऐसे स्थान चुने जाते थे जो प्राकृतिक रूप से सुरक्षित हों, ऊँची पहाड़ियां, धारें, चट्टानें, उभार, दूर तक दिखाई देने वाले स्थान इस काम के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते थे। ऐसी जगह से आने जाने वाले मार्ग ओपन नजर रखी जा सकती थी और किसी भी संभावित खतरे की जानकारी पहले ही मिल जाती थी। युद्ध या संघर्ष की स्थिति में भी दुर्ग शासकों को अतिरिक्त सुरक्षा भी प्रदान करते थे।

यही कारण है कि आज दिन स्थानों के नाम के साथ कोट शब्द जुड़ा हुआ दिखाई देता है, इनमें से ज्यादातर किसी न किसी ऊंचाई पर स्थित हैं। उनकी भौगोलिक स्थिति यह दिखाती है कि कोट कभी केवल साधारण बस्तियां नहीं रही होंगी बल्कि किसी समय स्थानीय सत्ता, रक्षा व्यवस्था या प्रशासनिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केंद्र रहे होंगे। समय के साथ भले ही किले नष्ट हो गए हैं, राजवंश समाप्त हो गए हैं और शासन व्यवस्था बदल गई लेकिन दुर्गों की स्मृति आज भी गांवों और स्थानों के नाम में जीवित है।

उत्तराखंड में कोट (Kot) नाम से जुड़े कई स्थान आज भी ऐसे प्रमाण देते हैं, जो उनके प्राचीन महत्व को दर्शाते हैं। इनमें सल्ट क्षेत्र का गुजरूकोट विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। स्थानीय परंपराओं और जनश्रुतियों के अनुसार इस स्थान का संबंध राजा समर सिंह और उनके आठवें पुत्र राजा हरूहीत सिंह से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि जहां आज राजा हरूहीत सिंह का मंदिर भी है। वहां कभी उनका दुर्ग या राजमहल हुआ करता था। उस दुर्ग के स्पष्ट अवशेष आज दिखाई नहीं देते लेकिन इस स्थान की भौगोलिक स्थिति खुद उसके महत्व की कहानी कहती हैं। यहां से चारों दिशाओं में दूर-दूर तक फैला क्षेत्र देखा जा सकता है कि अतीत में यह स्थान निगरानी और सुरक्षा के दृष्टि से अत्यंत उपयुक्त रहा होगा।

सल्ट क्षेत्र में ही मटवाँस गांव के पास कोट का ढय्या भी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल माना जाता है। यह स्थान रामगंगा नदी के किनारे एक टापूनुमा ऊंचे भूभाग पर स्थित है, जिसकी प्राकृतिक संरचना इसे आसपास के क्षेत्र से अलग पहचान देती है। यहां कई प्राचीन मंदिर मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ दशक पहले तक यह स्थान साधु संतों, योगी और तपस्वियों का प्रमुख स्थल हुआ करता था। धार्मिक गतिविधियों की वजह से यहां लगातार लोगों का आना-जाना लगा रहता था। खासकर शिवरात्रि की अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता था जिसमें दूर-दूर के क्षेत्र से श्रद्धालु पहुंचते थे। इसी तरह के भिक्यासैंण पास स्थित रानीकोट भी कोट नाम वाले ऐतिहासिक स्थलों में विशेष स्थान रखता है। यह एक दुर्गम पहाड़ी पर स्थित है, जहां तक पहुंचना आज भी कठिन माना जाता है। ऐसे स्थान का चयन प्राचीन समय में अक्सर सुरक्षा कारणों से ही किया जाता था।

रानीकोट में आज भी कुछ प्राचीन अवशेष दिखाई देते हैं जो इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यहां कभी महत्वपूर्ण निर्माण मौजूद रहे होंगे। समय और प्राकृतिक बदलाव के कारण ज्यादातर संरचनाओं नष्ट हो चुकी हैं लेकिन बचे हुए अवशेष अब भी इसके ऐतिहासिक महत्व की झलक देते हैं। गुजरुक का ढय्या और रानी कोट जैसे उदाहरण यह दर्शाते हैं कि कोट नाम केवल एक शब्द नहीं इसके पीछे स्थानीय इतिहास, सत्ता संरचना, धार्मिक परंपराएं और पहाड़ों की राजनीतिक बसावट की एक लंबी कहानी छुपी हुई है।

आज भले ही इन स्थानों में किले और राजमहल समय के साथ मिट गए हो लेकिन उनके नाम आज भी अतीत की याद जीवित रखे हुए हैं। उत्तराखंड के अलग- अलग हिस्सों में फैले कोट (Kot) नाम वाले गांव और स्थान केवल कुछ नाम भर नहीं है। यह ऐसे शब्द है जिनमें सदियों पुराना इतिहास, स्थानीय स्मृतियाँ और पहाड़ की बदलती क्षमताओं के निशान छुपे हुए हैं। जब हम इन स्थानों की भौगोलिक स्थिति, उनसे जुड़ी लोककथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों को एक साथ जोड़कर देखते हैं तो यह एहसास होता है कि कोट कभी केवल एक नाम नहीं था बल्कि सट्टा सुरक्षा और सामुदायिक जीवन का महत्व पूर्ण केंद्र हुआ करता था। ज्यादातर कोट ऐसे स्थान पर है जहां से दूर-दूर तक नजर रखी जा सकती है। यही विशेषता इस बात की ओर संकेत करती है कि इनका संबंध किसी न किसी रूप से प्राचीन दुर्गों, राजमहलों या प्रशासनिक केंद्रों से रहा होगा। समय के साथ राजवंश बदल गए, किले नष्ट हो गए और पुरानी व्यवस्थाएं समाप्त हो गई लेकिन इन स्थानों के नाम आज भी इस इतिहास की गवाही देते हैं।

यह था कोट (Kot) शब्द का पूरा इतिहास, अगर आपके गांव का नाम भी कोट शब्द से जुड़ा हुआ है तो कौन सा कोट है? हमें कमेंट में जरूर बताएं। यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर भी करें।

लेख : घुघूती (वीडियो देखें)

Vinod Singh Gariya

विनोद सिंह गढ़िया इस वेब पोर्टल के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। करीब 15 वर्षों से विभिन्न वेब पोर्टलों के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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