दिवाली पर क्यों बनाए जाते हैं लक्ष्मी पौ ? जानिए अनूठी परंपरा और महत्व

दिवाली पर लक्ष्मी पौ यानि लक्ष्मी पद चिन्ह बनाने की परंपरा क्या है? इस पोस्ट में जानिए उत्तराखंड की ऐपण कला, गेरू-बिस्वार से लक्ष्मी के चरण बनाने की विधि और धार्मिक महत्व।

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HIGHLIGHTS

  • दिवाली पर मां लक्ष्मी के पैरों के निशान बनाने की सदियों पुरानी परंपरा।
  • उत्तराखंड में गेरू और बिस्वार से तैयार किए जाते हैं पारंपरिक लक्ष्मी पौ।
  • घर के मुख्य द्वार से पूजा स्थल तक बनाए जाते हैं माता के पदचिह्न।
  • ऐपण कला में धार्मिक आस्था के साथ झलकती है उत्तराखंड की लोकसंस्कृति।
  • आधुनिक दौर में पारंपरिक ऐपण की जगह ले रहे हैं स्टिकर और सिंथैटिक पेंट।

दीपावली का त्यौहार आते ही मन में दियों की जगमगाती रोशनी, खीले -बतासे की खुशबु और मां लक्ष्मी के स्वागत की तैयारियों का ख्याल आने लगता है। घरों की साफ-सफाई से लेकर रंग-रोगन कर विभिन्न रंग – बिरंगी लाइट्स से प्रत्येक घर सजने लगता है। इस खास त्योहार पर कई तरह की परंपराएं भी निभाई जाती हैं, जिनमें से एक बेहद खूबसूरत और पवित्र परंपरा है—’मां लक्ष्मी के पौ‘ यानी ‘लक्ष्मी पद चिन्ह‘ (Lakshmi Footprints) बनाना।

दीपावली के अवसर पर उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में इस परंपरा का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। यहां लक्ष्मी पौ (पग चिन्ह) केवल घर की सजावट का हिस्सा नहीं, बल्कि लोककला, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं से जुड़ी एक खूबसूरत अभिव्यक्ति है।

क्या आपने कभी सोचा है कि दीपावली के त्यौहार पर घर की सीढ़ी से लेकर दरवाजे और वहां से घर में बने पूजा स्थल तक एक गोल लाल टिक्के पर माता लक्ष्मी के पैर क्यों बनाए जाते हैं और इन्हें अंदर की तरफ ही क्यों रखा जाता है? आइए, इस आर्टिकल में जानते हैं इस परंपरा के पीछे के जुड़े धार्मिक महत्व और हमारी प्राचीन कुमाऊंनी लोककला के बारे में।

क्या है लक्ष्मी पद चिन्ह बनाने की परंपरा?

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में सैकड़ों वर्षों से विभिन्न धार्मिक/मांगलिक कार्यों, त्योहारों पर ऐपण बनाने की परम्परा रही है। जिसके लिए लाल मिट्टी अथवा गेरू और चावल के घोल (बिस्वार) का उपयोग किया जाता हैं। सबसे पहले घर के आंगन, देहरी और दीवारों पर गेरू या लाल मिट्टी से पृष्ठभूमि तैयार की जाती है। इसके सूखने के बाद भिगोये चावल के विस्वार (एक सफ़ेद रंग का घोल) से ऐपण, वसुधारे डाले जाते हैं। (Diwali Lakshmi Footprints)

दीपावली के दिन इसी तरीके से ऐपण के साथ-साथ एक गोल लाल टिकिया में माता लक्ष्मी जी के पैरों के निशान (लक्ष्मी पद चिन्ह) बनाये जाते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में “लक्ष्मी पौ” कहते हैं। । घर की सीढ़ी, देहरी से लेकर पूजा स्थल तक लक्ष्मी पौ बनाने की यह परंपरा उत्तराखंड में देखी जाती है। इसके अलावा घरों की सीढ़ी, पुराने घरों की खोली और दीवारों पर लाल सतह के ऊपर अलग-अलग लंबाई की सीधी सफेद लकीरें भी डाली जाती हैं, जिन्हें वसुधारे कहा जाता है। उत्तराखंड की यह पारंपरिक सजावट भी ऐपण कला का एक अहम हिस्सा है।

ऐपण उत्तराखंड की पारम्परिक लोककला की ऐसी पहचान है, जिसमें सामान्य रेखाओं और ज्यामितीय आकृतियों के माध्यम से धार्मिक भावनाओं और शुभ अवसरों को अभिव्यक्त किया जाता है। विवाह, नामकरण, जनेऊ, पूजा-पाठ और विभिन्न त्योहारों के लिए अलग-अलग प्रकार के ऐपण बनाए जाते हैं।

मां लक्ष्मी पद चिन्ह बनाने का क्या है धार्मिक महत्व?

हिंदू सनातन धर्म में माता लक्ष्मी को धन, वैभव, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। दीपावली की रात्रि मां लक्ष्मी के आगमन और उनके स्वागत की मान्यता इस त्यौहार से जुड़ी हुई है।

धार्मिक मान्यतानुसार, दीपावली की रात्रि मां लक्ष्मी लोगों के घरों में आती हैं। इसी भावना के साथ लोग अपने घरों के सीढ़ी, प्रवेशद्वार से होते हुए मंदिर तक उनके पैरों के निशान बनाते हैं। पैरों का ऐसा डिज़ाइन बनाया जाता है, मानो लक्ष्मी जी घर पर आईं हैं । इसलिए यह निशान माता के घर में आगमन और उनके स्वागत का प्रतीक माने जाते हैं।

लोग मानते हैं कि दीपावली के दिन मां लक्ष्मी जी के चरण जिस घर में पड़ते हैं, वहां सुख-समृद्धि, धन-धान्य और खुशहाली बनी रहती है। इसलिए दीपावली से पूर्व घर की साफ-सफाई करने, मुख्य द्वार को सजाने और लक्ष्मी पौ बनाने की ख़ास परंपरा निभाई जाती है।

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लक्ष्मी पद चिन्ह और ऐपण से सजी घर की सीढ़ी

लक्ष्मी पद चिन्ह घर के अंदर की ओर क्यों बनाए जाते हैं?

आपने देखा होगा कि दीपावली पर मां लक्ष्मी के पैरों के निशान मुख्य दरवाजे पर बनाये जाते हैं और कई घरों में सीढ़ी से लेकर घर के अंदर मौजूद पूजा स्थल तक बनाए जाते हैं।

इसके पीछे भी लोगों में एक धार्मिक भावना जुड़ी है। पैरों के निशानों की दिशा घर के भीतर की ओर रखना मां लक्ष्मी के घर में प्रवेश करने का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि माता घर में पधारें और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहे।

दीपावली पर कैसे बनाएं मां लक्ष्मी पद चिन्ह?

दीपावली से पूर्व घर के रंग-रोगन के बाद मुख्य द्वार, पूजा स्थल, तुलसी चौरा को धारे, ऐपण और लक्ष्मी पौ से सजाएँ। इसके बाद पारंपरिक और शुद्ध रूप में लक्ष्मी जी के पैरों के निशान बनाने के लिए लाल मिट्टी से बेस तैयार करने के बाद चांवल के पेस्ट का उपयोग करें। यदि लाल मिट्टी न हो तो गेरू का उपयोग करें। सफ़ेद रंग के लिए चांवल करीब २ – 3 घंटे तक भिगाएं। फिर पानी निकालकर सिलबट्टे में पीस कर घोल तैयार करें। फिर अँगुलियों से ऐपण,धारे और लक्ष्मी पौ बनायें। लक्ष्मी जी के पौ बनाते समय उन्हें घर के प्रवेश द्वार से पूजा स्थल की ओर बनायें। सीढ़ियों में वसोधारा डालें। जिनकी संख्या विषम जैसे 5, 7, ९ या 11 होनी चाहिए। पूजा स्थलों में वसोधारा के बिना ऐपण अधूरा माना जाता है। यह पूर्ण रूप से पारंपरिक विधि है। चांवल के बिस्वार से तैयार बेहद शुभ माने जाते हैं।

ऐपण और लक्ष्मी पौ बनाने के लिए वर्तमान में बाजार में मिलने वाले सिंथैटिक लाल रंग और सफ़ेद रंगों का उपयोग होने लगा है। और यह लोकप्रिय भी है। वहीं अब बाजार में बने बनाये स्टीकर भी उपलब्ध हैं।

बदलते दौर में बदल रहा है ऐपण बनाने का तरीका

वर्तमान में उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला में भी काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां बेटियां या महिलाएं अपने हाथों से गेरू और चावल के बिस्वार (घोल ) से ऐपण लिखती थी, वहीं अब बाजार में ऐपण के डिजाइन वाले स्टिकर आसानी से उपलब्ध हैं। इन्हें दरवाजों, दीवारों और फर्श पर सुविधापूर्वक चिपकाया जा सकता है।

इसके अलावा पारंपरिक गेरू और बिस्वार की जगह लाल और सफेद सिंथेटिक पेंट का इस्तेमाल भी बढ़ा है। इससे ऐपण काफी टिकाऊ होता है, लेकिन हाथों से बनाई जाने वाली पारंपरिक कला की अपनी अलग महत्व, सुंदरता और आत्मीयता है।

दरअसल, ऐपण सिर्फ आकृतियां बनाने की एक कला नहीं है। इसके साथ पहाड़ की बेटियों और महिलाओं की रचनात्मकता, पारिवारिक परंपराएं और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत जुड़ी हुई है। घर की देहरी पर अपने हाथों से ऐपण बनाना, खोली या सीढ़ियों में धारे डालना और सतह पर लक्ष्मी पौ उकेरना एक भावनात्मक अनुभव भी रहा है।

केवल सजावट नहीं, आस्था और परंपरा का प्रतीक हैं लक्ष्मी पौ

उत्तराखंड में दीपावली पर मां लक्ष्मी के पैरों के निशान बनाने की परंपरा का महत्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। यह हमें अपने घर को साफ रखने, सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण करने और परिवार की सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना करने का संदेश भी देती है।

उत्तराखंड की ऐपण कला में लक्ष्मी पौ (Lakshmi Footprint) इसी आस्था और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सुंदर समागम हैं। आधुनिकता के इस दौर में भले ही ऐपण बनाने के तरीके बदल रहे हों, लेकिन इनसे जुड़ी भावनाएं आज भी वैसी ही हैं।

आज आवश्यकता है कि हमारी नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक कला को समझे, सीखे और इसे आगे बढ़ाए। हर बार दीपावली पर लक्ष्मी पौ, ऐपण और धारे डाले जाएँ, और सकारात्मक ऊर्जा से हमारा घर परिपूर्ण हो, वहीं हमारी लोकसंस्कृति हमारी पहचान बनकर हमेशा जीवित रहें।

Vinod Singh Gariya

विनोद सिंह गढ़िया इस वेब पोर्टल के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। करीब 15 वर्षों से विभिन्न वेब पोर्टलों के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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