रूपकुंड झील का रहस्य: हजारों नरकंकाल, नंदा की लोककथा और DNA ने खोले 1000 साल पुराने राज

उत्तराखंड की रहस्यमयी रूपकुंड झील अपने आसपास बिखरी मानव अस्थियों के कारण दशकों से लोगों की जिज्ञासा का केंद्र रही है। नंदा देवी से जुड़ी लोककथाएं इसे एक अलग रहस्यमयी पहचान देती हैं, जबकि 2019 के Ancient DNA शोध ने बताया कि यहां मिले सभी लोग एक ही समय के नहीं थे। आखिर कौन थे ये लोग और रूपकुंड तक कैसे पहुंचे? जानिए इस लेख में रूपकुंड के रहस्य की पूरी कहानी।

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उत्तराखंड के हिमालय में समुद्र सतह से लगभग 5,029 मीटर (16,499 फीट) की ऊंचाई पर स्थित रहस्यमयी रूपकुंड झील आज भी देश-विदेश के लाखों लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई है। हिमाच्छादित ऊंची चोटियों के बीच एक शांत और सुरम्य झील और उसके आसपास बिखरी मानव अस्थियां रूपकुंड के इस दृश्य से जितना रोमांच पैदा करते हैं, वहीं उतने ही प्रश्न भी खड़े करता है।

Table of Contents

  1. आखिर ये नरकंकाल किसके हैं?
  2. इतनी ऊंचाई पर बर्फ से भरे पहाड़ों पर लोग क्यों पहुंचे थे?
  3. क्या वे किसी धार्मिक यात्रा पर थे?
  4. क्या किसी प्राकृतिक आपदा ने उनकी जान ली?
  5. या फिर रूपकुंड की कहानी किसी एक घटना की नहीं, बल्कि अलग-अलग समय में हुई घटनाओं की एक रहस्यमयी कहानी है?

सन 2019 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन ने रूपकुंड के रहस्य को सुलझाने के बजाय उसे और अधिक जटिल बना दिया। प्राचीन DNA के अध्ययन से पता चला कि झील के आसपास मिले सभी मानव अवशेष एक ही समय के नहीं हैं। वैज्ञानिकों ने 38 मानव कंकालों के DNA का अध्ययन किया और उनमें तीन अलग आनुवंशिक समूहों की पहचान की। इनमें 23 लोग दक्षिण एशियाई ancestry से जुड़े थे, 14 में पूर्वी भूमध्यसागरीय ancestry होने के संकेत मिले और एक व्यक्ति में दक्षिण-पूर्व एशिया से संबंधित आनुवंशिक विशेषताएं मिलीं। रेडियोकार्बन डेटिंग से यह तथ्य भी प्रकाश में आया है कि इन समूहों के बीच लगभग एक हजार वर्ष का अंतर था।

हिमालय की गोद में बसा है रहस्यमयी रूपकुंड

उत्तराखंड के सीमावर्ती जिला चमोली के देवाल क्षेत्र में हिमालय के बीच स्थित रूपकुंड झील यहाँ के लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी हुई है। यह क्षेत्र नंदा देवी राजजात यात्रा की परंपरा और उससे जुड़ी लोकस्मृतियों के कारण भी अति महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिक अध्ययन में भी रूपकुंड के संदर्भ में नंदा देवी राजजात के मार्ग का उल्लेख किया गया है।

करीब 40 मीटर व्यास वाली यह छोटी हिमालयी झील चारों तरफ से ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरी है। झील के चारों ओर मानव अस्थियों के बिखरे होने के कारण इसे अंग्रेजी में “Skeleton Lake” भी कहा जाता है। वैज्ञानिक शोध के अनुसार यहां सैकड़ों मानव अवशेष मौजूद हैं।

रूपकुंड से एक जलधारा निकलती हैं, जिसे स्थानीय लोग रूपगंगा के नाम से जानते हैं। बर्फ, चट्टानों और ऊंचे हिमालयी भू-दृश्य के बीच स्थित यह झील देखने में बेहद शांत और मनोहारी लगती है, लेकिन इसके किनारों पर बिखरी मानव अस्थियां इस प्राकृतिक सौंदर्य को एक रहस्यमयी रूप दे देती हैं।

हजारों नरकंकाल आज भी बने हैं पहेली

Roopkund में मौजूद सैकड़ों मानव अस्थियों का रहस्य लंबे समय से लोगों के लिए अबूझ पहेली रहा है। स्थानीय लोकगीतों, जागरों और जनश्रुतियों में इन अस्थियों को माँ नंदा देवी से जुड़ी एक प्राचीन कथा के साथ जोड़ा जाता रहा है।

लेकिन आधुनिक विज्ञान ने इस कहानी को एक अलग दृष्टिकोण से देखा है।

सन 2019 में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने Nature Communications में प्रकाशित अध्ययन के माध्यम से रूपकुंड के 38 मानव कंकालों के प्राचीन DNA का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने DNA के साथ रेडियोकार्बन डेटिंग, स्थिर समस्थानिकों और अस्थि-विज्ञान संबंधी प्रमाणों का भी इस्तेमाल किया। शोध का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष था कि रूपकुंड में मिले सभी कंकाल एक ही समय पर वहां जमा नहीं हुए थे।

DNA ने खोला रूपकुंड का सबसे बड़ा रहस्य

वैज्ञानिकों ने 38 व्यक्तियों के genome-wide ancient DNA का विश्लेषण किया। इसके बाद उन्हें तीन अलग-अलग आनुवंशिक समूह दिखाई दिए।

पहला समूह — दक्षिण एशियाई ancestry

38 में से 23 व्यक्तियों की आनुवंशिक संरचना वर्तमान दक्षिण एशियाई आबादियों में मिलने वाली विविधता के दायरे में थी। ये लोग लगभग 800 ईस्वी के आसपास के माने गए।

महत्वपूर्ण बात यह है कि ये 23 व्यक्ति भी किसी एक समान आनुवंशिक समुदाय के नहीं लगते थे। अध्ययन में इनके भीतर भी आनुवंशिक विविधता पाई गई।

दूसरा समूह — पूर्वी भूमध्यसागरीय ancestry

14 व्यक्तियों की आनुवंशिक संरचना दक्षिण एशियाई समूह से अलग थी। उनका genetic profile पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र की वर्तमान आबादियों के साथ समानता दिखाता था। इन लोगों के अवशेष लगभग 17वीं से 20वीं शताब्दी के कालखंड में रखे गए, यानी पहले समूह से लगभग एक हजार वर्ष बाद।

यह खोज इसलिए बेहद महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे पता चला कि रूपकुंड में ऐसे लोग भी पहुंचे थे जिनकी आनुवंशिक ancestry दक्षिण एशिया के सामान्य genetic spectrum से भिन्न थी।

तीसरा समूह — दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ा एक व्यक्ति

अध्ययन में एक व्यक्ति ऐसा भी मिला जिसकी आनुवंशिक विशेषताएं दक्षिण-पूर्व एशियाई आबादियों से संबंधित थीं। यह व्यक्ति भी बाद के कालखंड से संबंधित था।

इस तरह वैज्ञानिकों को रूपकुंड में तीन genetically distinct groups के प्रमाण मिले।

एक हजार साल का अंतर

रूपकुंड के रहस्य में सबसे चौंकाने वाली बात यही है कि सभी कंकाल एक ही घटना के नहीं हैं। रेडियोकार्बन डेटिंग के अनुसार दक्षिण एशियाई ancestry वाले व्यक्तियों के अवशेष लगभग 7वीं से 10वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य के हैं, जबकि भूमध्यसागरीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई ancestry वाले व्यक्तियों के अवशेष लगभग 17वीं से 20वीं शताब्दी के कालखंड के हैं। इसका अर्थ है कि रूपकुंड में मानव अवशेष कम से कम अलग-अलग कालखंडों में जमा हुए।

इस वैज्ञानिक निष्कर्ष ने उस धारणा को चुनौती दी कि झील के आसपास मिले सभी नरकंकाल किसी एक ही भयंकर प्राकृतिक आपदा में मारे गए लोगों के हैं।

क्या रूपकुंड में कोई विदेशी समूह भी आया था?

सन 2019 में हुए अध्ययन की सबसे चर्चित खोज यही रही कि 14 व्यक्तियों में पूर्वी भूमध्यसागरीय ancestry के संकेत मिले। लेकिन इसे समझते समय सावधानी आवश्यक है। वैज्ञानिकों ने यह नहीं कहा कि ये लोग निश्चित रूप से आधुनिक अर्थों में किसी खास देश के “नागरिक” थे। DNA किसी व्यक्ति की आनुवंशिक ancestry के बारे में जानकारी देता है; इससे उसके सटीक जन्मस्थान, यात्रा का उद्देश्य या वह रूपकुंड तक किस रास्ते से पहुंचा था, यह सीधे साबित नहीं होता।

इसलिए इस खोज को पूर्वी भूमध्यसागरीय ancestry वाले लोगों की उपस्थिति के रूप में समझना अधिक वैज्ञानिक है।

लोकगीतों और जागरों में भी मिलता है रूपकुंड का रहस्य

आधुनिक विज्ञान से इतर रूपकुंड की अपनी एक लोककथा है, जो माँ नंदा के लोकगीतों, जागरों और जनश्रुतियों में पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है।

एक लोकमान्यता के अनुसार माँ नंदा यानी पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश की ओर जा रही थीं। यात्रा के दौरान उन्हें प्यास लगी। चारों ओर बर्फ ही बर्फ थी। तब भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से धरती को स्पर्श किया और वहां से जलधारा निकली और वहां एक कुंड का निर्माण हुआ। जैसे ही मां पार्वती कुंड के पानी से अपनी तीस बुझाती हैं तो उन्हें उस कुंड में अपनी परछाई नजर आती है। माता पार्वती प्रसन्न होकर भगवान शिव से उस कुंड का नाम पूछती हैं तो भगवान शिव उस कुंड को रूपकुंड कहते हैं।

यह कथा धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का अहम हिस्सा है; इसे ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में अलग से देखना चाहिए।

राजा जसधवल और नंदा देवी की लोककथा

Roopkund से जुड़ी दूसरी प्रसिद्ध जनश्रुति कन्नौज के राजा जसधवल की कथा है। लोककथा के अनुसार राजा अपनी गर्भवती रानी, दास-दासियों और बड़े लाव-लश्कर के साथ नंदा देवी की यात्रा पर निकले। उनके द्वारा यात्रा के दौरान धार्मिक नियमों और मर्यादाओं की घोर उपेक्षा किए जाने की बात यहाँ प्रचलित लोककथा में कही जाती है।

कहा जाता है कि राजा के इस आचरण से माँ नंदा देवी कुपित हुईं और रूपकुंड के पास अचानक भयंकर वर्षा तथा ओलावृष्टि हुई। बर्फीले तूफान में राजा, रानी और उनके साथ चल रहा दल फंस गया और वहीं उन सभी की मौत हो गई। कहा जाता है कि रूपकुंड में मौजूद ये सभी नर कंकाल उसी घटना के हैं।

हालांकि वर्ष 2019 के DNA और रेडियोकार्बन अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि वहां मौजूद सभी नर कंकाल एक ही घटना के नहीं हो सकते। इसलिए राजा जसधवल की कथा और रूपकुंड के सभी मानव अवशेषों को एक ही ऐतिहासिक घटना मानना वैज्ञानिक इसे स्वीकार नहीं करते।

क्या सच में मिले थे यात्रा से जुड़े सामान?

कई अनुसंधानों में रूपकुंड में मिले अवशेषों में रिंगाल की छंतोली, हुड़के के अवशेष, चमड़े की चप्पलें होने का दावा किया गया है। वहां कुछ गहने और चूड़ियां भी मिले, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समूह में महिलाएं भी मौजूद थीं।

वर्ष 2019 के वैज्ञानिक अध्ययन में भी 38 आनुवंशिक रूप से अध्ययन किए गए व्यक्तियों में 23 पुरुष और 15 महिलाएं पाई गईं। शोधकर्ताओं ने पुरुषों और महिलाओं के इस अनुपात को किसी सैन्य अभियान की सरल परिकल्पना से मेल खाना कठिन बताया।

हालांकि किसी विशेष वस्तु को किसी खास लोककथा या राजा के दल से जोड़ने के लिए अलग पुरातात्विक प्रमाण आवश्यक होंगे।

रूपकुंड पर कई बार हुए अनुसंधान

रूपकुंड के नरकंकालों ने लंबे समय से वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को अपनी ओर आकर्षित किया है। इस क्षेत्र से नर कंकालों और अन्य वस्तुओं के संग्रह तथा अध्ययन का सिलसिला कई दशकों से चलता रहा है।

रूपकुंड के आसपास बिखरे अस्थियों के ढेर एवं नरकंकालों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1942 में भारतीय वन निगम के रेंजर हरिकृष्ण मधवाल द्वारा की गई थी। जबकि भारतीय मानव सर्वेक्षण विभाग के पहले शारीरिक मानव वैज्ञानिक डॉ. आर. एस. नेगी ने वर्ष 1956 में रूपकुंड में मौजूद अस्थियों का अध्ययन किया था। इनकी जांच कराने पर पहली बार डॉ. नेगी ने बताया था कि ये अस्थियां उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान आदि मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के हैं । बाद के वर्षों में डॉ. मजूमदार ने भी डॉ. नेगी के शोध के परिणामों का समर्थन किया था।

वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार ये अस्थियां 600 वर्ष से पूर्व की हैं। वर्ष 1955 में वन विभाग के रेंजर हरिकृष्ण मधवाल ने सितम्बर में रूपकुंड क्षेत्र का भ्रमण किया व कुछ नरकंकाल, अस्थियां, चप्पल आदि वस्तुऐं एकत्रित कर लखनऊ विश्वविद्यालय के मानव शरीर रचना अध्ययन विभाग के डा० डी० एन० मजूमदार को परीक्षणार्थ सौंप दी थीं। जबकि विशेषज्ञों द्वारा यह माना जाता है कि उन लोगों की मौत महामारी भूस्खलन या बर्फानी तूफान से हुई थी।

वर्ष 1960 के दशक में एकत्र नमूनों से लिए गये कार्बन डेटिंग ने अस्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि वे लोग 12वीं सदी से 15वीं सदी तक के बीच के थे। Human Skeletons in Roopkund Lake 2004 में, भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के एक दल ने उस स्थान का दौरा किया ताकि उन कंकालों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके। उस टीम ने अहम सुराग ढूंढ़ निकाले जिनमें गहने, खोपड़ी, हड्डियां और शरीर के संरक्षित ऊतक शामिल थे। लाशों के डीएनए परीक्षण से यह पता चला कि वहां लोगों के कई समूह थे। जिनमें शामिल छोटे कद के लोगों का एक समूह (सम्भवतः स्थानीय कुलियों) और लंबे लोगों का एक समूह जो महाराष्ट्र में कोकणस्थ ब्रामिंस के डीएनए उत्परिवर्तन विशेषता से निकट संबंधित थे। हालांकि संख्या सुनिश्चित नहीं की गयी। 500 से अधिक लोगों से संबंधित अवशेष पाए गए हैं और यह भी माना जाता है कि छह सौ से अधिक लोग मारे गए थे। इसके अलावा भी कई अनुसंधानों में अलग-अलग तथ्यात्मक तथ्य भी सामने आये हैं।

बाद के दशकों में रेडियोकार्बन डेटिंग और अन्य वैज्ञानिक तकनीकों के इस्तेमाल से इन अनुमानों को नए सिरे से जांचा गया।

2004 के अनुसंधान से भी मिले थे महत्वपूर्ण संकेत

रूपकुंड पर भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए बाद के अध्ययनों में भी कई महत्वपूर्ण सुराग सामने आए। मानव अवशेषों, हड्डियों, खोपड़ियों और अन्य वस्तुओं का अध्ययन किया गया। इन अध्ययनों ने यह संभावना मजबूत की कि रूपकुंड में एक से अधिक समूहों के लोग रहे होंगे। लेकिन आधुनिक ancient-DNA अध्ययन ने इस सवाल को कहीं अधिक स्पष्ट तरीके से सामने रखा।

2019 का अध्ययन क्यों है महत्वपूर्ण?

वेश 2019 में प्रकाशित शोध पहले के कई अनुमानों की तुलना में अधिक व्यापक वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित था।

शोधकर्ताओं ने:

  • 38 मानव कंकालों का genome-wide ancient DNA अध्ययन किया।
  • लगभग 12 लाख genetic markers/SNPs को लक्षित किया।
  • 45 व्यक्तियों के stable isotope measurements किए।
  • 37 व्यक्तियों की सीधे radiocarbon dating की।
  • मानव अस्थियों का osteological analysis भी किया।

इन सभी प्रमाणों को एक साथ देखने पर वैज्ञानिकों को पता चला कि रूपकुंड में अलग-अलग समय और अलग-अलग आनुवंशिक पृष्ठभूमि वाले लोग मौजूद थे।

क्या इन लोगों की मौत ओलावृष्टि से हुई थी?

रूपकुंड से जुड़ी एक चर्चित वैज्ञानिक परिकल्पना यह रही है कि कुछ लोगों की मौत अचानक आई भारी ओलावृष्टि में हुई हो सकती है।

अस्थि-विज्ञान संबंधी विश्लेषण में कुछ व्यक्तियों में बिना भरने वाले compression fractures पाए गए। शोध में यह संभावना रखी गई कि इस प्रकार की चोटें रूपकुंड क्षेत्र में होने वाली अत्यंत तेज ओलावृष्टि से संबंधित हो सकती हैं। हालांकि शोधकर्ताओं ने इसे एकमात्र निश्चित कारण नहीं माना और अन्य संभावनाओं को भी खुला रखा।

इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि ओलावृष्टि एक संभावित मृत्यु-कारण है, लेकिन 2019 के अध्ययन ने सभी कंकालों की मृत्यु का अंतिम कारण निर्धारित नहीं किया।

महामारी की कहानी को भी नहीं मिला मजबूत समर्थन

रूपकुंड के रहस्य को लेकर एक वक्त यह अनुमान भी लगाया गया कि किसी महामारी के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई होगी। लेकिन 2019 के अध्ययन में जांचे गए सैंपलों में बैक्टीरियल pathogens के DNA का प्रमाण नहीं मिला। इसलिए अध्ययन के नमूनों में महामारी की परिकल्पना के समर्थन में आनुवंशिक प्रमाण नहीं मिला।

फिर भी वैज्ञानिकों ने सावधानी बरतते हुए कहा कि pathogen DNA बहुत कम मात्रा में होने पर परीक्षण में दिखाई नहीं दे सकता। इसलिए केवल pathogen DNA न मिलने को महामारी की संभावना के पूर्ण खंडन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

क्या ये किसी सेना या व्यापारिक दल के लोग थे?

रूपकुंड पर अलग-अलग समय में सेना, व्यापारिक दल और तीर्थयात्रियों से जुड़ी कई परिकल्पनाएं सामने आती रही हैं। लेकिन 2019 के अध्ययन में मिले पुरुष और महिला व्यक्तियों के लगभग समान मिश्रण तथा आनुवंशिक आंकड़ों ने किसी साधारण सैन्य अभियान की परिकल्पना को बल नहीं दिया। शोधकर्ताओं को अध्ययन किए गए व्यक्तियों में तीसरी पीढ़ी या उससे निकट के रिश्तेदार भी नहीं मिले।

इससे यह संकेत मिलता है कि रूपकुंड की कहानी को केवल किसी एक सैन्य या पारिवारिक समूह की कहानी मानना पर्याप्त नहीं है।

रूपकुंड के रहस्य में भोजन से भी मिला सुराग

DNA के साथ वैज्ञानिकों ने stable isotope analysis भी किया। इस तकनीक से लोगों के भोजन और जीवनशैली से संबंधित संकेत प्राप्त किए जा सकते हैं।

शोध में दो प्रमुख आनुवंशिक समूहों के dietary profiles में भी अंतर पाया गया। यानी उनकी आनुवंशिक पृष्ठभूमि के साथ उनके भोजन संबंधी संकेत भी अलग दिखाई दिए।

इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि रूपकुंड में अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले लोगों की मौजूदगी केवल DNA तक सीमित नहीं थी।

क्या सभी कंकाल एक ही आपदा में मारे गए थे?

नहीं। 2019 के अध्ययन के अनुसार ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

शोध में दक्षिण एशियाई ancestry वाले 23 व्यक्तियों के अवशेष लगभग 7वीं-10वीं शताब्दी के पाए गए, जबकि दूसरे समूह के अवशेष 17वीं-20वीं शताब्दी के थे। इस प्रकार दोनों के बीच लगभग एक हजार वर्ष का अंतर सामने आया। दक्षिण एशियाई समूह के भीतर भी एक से अधिक deposition events के संकेत मिले।

इस खोज ने रूपकुंड के सबसे पुराने रहस्य को और गहरा कर दिया है।

फिर इतनी दूर से लोग रूपकुंड क्यों आए?

यही सवाल आज भी पूरी तरह अनुत्तरित है।

  1. यदि बाद के काल के कुछ लोगों की ancestry पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र से संबंधित थी, तो वे हिमालय के इस अत्यंत दुर्गम और ऊंचे क्षेत्र तक क्यों पहुंचे?
  2. क्या वे धार्मिक यात्रा पर थे?
  3. क्या वे व्यापार या यात्रा के किसी मार्ग का हिस्सा थे?
  4. क्या वे किसी स्थानीय समूह से संपर्क में आए थे?
  5. या उनके यहां पहुंचने के पीछे कोई ऐसी ऐतिहासिक घटना थी जिसका रिकॉर्ड आज उपलब्ध नहीं है?

2019 के अध्ययन ने लोगों की genetic ancestry और कालक्रम को समझने में महत्वपूर्ण प्रगति की, लेकिन उनकी यात्रा का उद्देश्य और मृत्यु की सटीक परिस्थितियां अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।

रूपकुंड की कहानी में विज्ञान और लोकविश्वास दोनों की जगह

रूपकुंड केवल बर्फ की झील नहीं, जहाँ मानव अस्थियों मौजूद हैं। यह उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, यहाँ के रहवासियों की नंदा देवी के प्रति आस्था, लोकगीतों और जागरों से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण स्थान भी है।

लोकमान्यताएं इस स्थल को नंदा देवी की कथा से जोड़ती हैं, जबकि वैज्ञानिक अनुसंधान मानव अवशेषों की उम्र, ancestry और संभावित मृत्यु-परिस्थितियों को समझने का प्रयास करता है।

दोनों के प्रश्न अलग हैं। लोककथा हमें बताती है कि समाज ने इस घटना को किस तरह याद रखा। विज्ञान यह पता लगाने का प्रयास करता है कि उपलब्ध भौतिक प्रमाण क्या बताते हैं। रूपकुंड की पूरी कहानी समझने के लिए दोनों पहलुओं को उनके अपने संदर्भ में देखना आवश्यक है।

रूपकुंड की एक तस्वीर, लेकिन कहानी कई कालखंडों की

2019 के अध्ययन के निष्कर्षों को सरल रूप में देखें तो रूपकुंड की कहानी कुछ इस प्रकार सामने आती है—

आनुवंशिक समूहव्यक्तियों की संख्याप्रमुख ancestryअनुमानित काल
Roopkund_A23दक्षिण एशियाईलगभग 7वीं–10वीं शताब्दी
Roopkund_B14पूर्वी भूमध्यसागरीयलगभग 17वीं–20वीं शताब्दी
Roopkund_C1दक्षिण-पूर्व एशिया से संबंधितलगभग 17वीं–20वीं शताब्दी

यह आंकड़े 2019 के अध्ययन में जांचे गए 38 व्यक्तियों के हैं; इन्हें रूपकुंड में मौजूद हर मानव अवशेष का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं माना जाना चाहिए।

आज भी अनसुलझे हैं कई सवाल

वैज्ञानिक अध्ययन ने रूपकुंड के रहस्य का एक हिस्सा जरूर स्पष्ट किया है, लेकिन कई प्रश्न अब भी सामने खड़े हैं—

  • इतनी ऊंचाई पर अलग-अलग समय में लोग क्यों पहुंचे?
  • दक्षिण एशियाई समूह के लोग किन परिस्थितियों में यहां आए थे?
  • पूर्वी भूमध्यसागरीय ancestry वाले लोग हिमालय तक कैसे पहुंचे?
  • उनकी मृत्यु वास्तव में किस कारण हुई?
  • क्या अलग-अलग कालखंड की घटनाओं के पीछे अलग-अलग कारण थे?

इन सवालों का उत्तर खोजने के लिए DNA के साथ पुरातत्व, जलवायु विज्ञान, भूगोल, इतिहास और स्थानीय परंपराओं का संयुक्त अध्ययन जरूरी होगा।

व्यक्तिगत अनुभव: करीब से देखने पर और बढ़ जाता है रहस्य

वास्तव में देखा जाए तो लोगों के लिए रूपकुंड और वहां मौजूद नरकंकाल आज भी रहस्य बने हुए हैं।

व्यक्तिगत अनुभव की बात करें तो यहाँ तक पहुंचना मां नंदा की कृपा के बिना असंभव है। ऊँचे पहाड़ों के बीच सुंदर झील और वहां मौजूद नरकंकालों को करीब से देखना अत्यंत रोमांचकारी है। हिमालय की उस ऊंचाई पर पहुंचकर झील का शांत वातावरण मन को रोमांचित करता है। लेकिन जब उसी शांत झील के आसपास बिखरी मानव अस्थियां दिखाई देती हैं तो मन में एक अलग ही प्रश्न उठते हैं —

  1. आखिर इतनी ऊंचाई पर इतने मानव कंकाल आए कहां से?
  2. आज से सैकड़ों और हजारों वर्ष पहले इन लोगों ने इस दुर्गम हिमालयी क्षेत्र की यात्रा क्यों की होगी?
  3. उनके साथ क्या हुआ होगा?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की वैज्ञानिक कोशिशें लगातार जारी है और शायद यही रूपकुंड की सबसे बड़ी विशेषता है—यह झील जितनी सुंदर है, उसकी कहानी उतनी ही रहस्यमयी है।

निष्कर्ष: रहस्य अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ

रूपकुंड झील के मानव कंकालों पर वर्ष 2019 में प्रकाशित शोध ने एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट कर दी—रूपकुंड के सभी कंकाल किसी एक ही समय और किसी एक ही घटना में मारे गए लोगों के नहीं हैं।

38 कंकालों के ancient DNA अध्ययन में तीन अलग आनुवंशिक समूह सामने आए। 23 व्यक्ति दक्षिण एशियाई ancestry से संबंधित थे और लगभग 800 ईस्वी के आसपास के पाए गए, जबकि 14 व्यक्ति पूर्वी भूमध्यसागरीय ancestry से जुड़े थे और बाद के, लगभग 1800 ईस्वी के कालखंड के थे। एक व्यक्ति में दक्षिण-पूर्व एशिया से संबंधित ancestry के संकेत मिले।

इस शोध ने रूपकुंड के बारे में पुरानी एकल-घटना वाली धारणा को चुनौती दी है। लेकिन इसने एक नया सवाल भी खड़ा कर दिया है—अलग-अलग समय और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग आखिर इस दुर्गम हिमालयी झील तक क्यों पहुंचे?

शायद यही वह प्रश्न है जो रूपकुंड को आज भी हिमालय के सबसे रहस्यमयी स्थलों में बनाए हुए है।

रूपकुंड की बर्फ पिघलती रहती है, मौसम बदलते रहते हैं, लेकिन झील के किनारे बिखरी वे अस्थियां आज भी इतिहास से अपना परिचय पूछती हुई दिखाई देती हैं।

शोध स्रोत

वर्ष 2019 में प्रकाशित मूल शोध-पत्र: Ancient DNA from the skeletons of Roopkund Lake reveals Mediterranean migrants in India, Nature Communications, Volume 10, Article 3670.

मूल Nature Communications शोध-पत्र पढ़ें

Vinod Singh Gariya

विनोद सिंह गढ़िया इस वेब पोर्टल के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। करीब 15 वर्षों से विभिन्न वेब पोर्टलों के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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