दीपावली भारतीय लोकजीवन का ऐसा पर्व है, जिसमें धार्मिक आस्था, पारिवारिक परम्पराओं और लोककलाओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उत्तराखण्ड के कुमाऊँ अंचल में दीपावली केवल दीप जलाने और लक्ष्मी पूजन का अवसर नहीं है, बल्कि यह अपनी पारम्परिक लोककला ऐपण, घर-आँगन की सजावट, देवी के स्वागत और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक मान्यताओं को जीवंत करने का भी पर्व है। कुमाऊँ के पारम्परिक घरों में दीपावली के अवसर पर बनाए जाने वाले ऐपण और महालक्ष्मी के ‘पौ’ (पाँव) इस लोकविश्वास के प्रतीक हैं कि घर में सुख, शांति, धन-धान्य और समृद्धि का आगमन हो।
कुमाऊँ की लोककला में ऐपण का विशेष स्थान है। यह केवल घर की सजावट का माध्यम नहीं, बल्कि लोकजीवन की धार्मिक चेतना, सौन्दर्यबोध और सांस्कृतिक स्मृति की कलात्मक अभिव्यक्ति है। ऐपण बनाने की परम्परा मुख्यतः गेरू और बिस्वार के माध्यम से विकसित हुई है। इसके लिए सर्वप्रथम घर के आँगन, देहली अथवा पूजा स्थल की जमीन या दीवार पर गेरू का लाल रंग चढ़ाया जाता है। इसके सूखने के बाद चावल को भिगोकर पीसकर तैयार किए गए सफेद घोल, जिसे स्थानीय भाषा में बिस्वार या विश्वार कहा जाता है, से विभिन्न आकृतियाँ बनाई जाती हैं। लाल गेरू की पृष्ठभूमि पर सफेद बिस्वार से उभरती रेखाएँ ऐपण को विशिष्ट पहचान देती हैं। इन रेखाओं में ज्यामितीय आकृतियाँ, फूल, बेल-बूटे, देवी-देवताओं के प्रतीक और शुभ चिह्न शामिल होते हैं।
दीपावली के अवसर पर बनाए जाने वाले ऐपण में महालक्ष्मी का विशेष महत्त्व है। घर की दीवारों, पूजा स्थल और प्रवेश द्वार के आसपास देवी लक्ष्मी की आकृति बनाई जाती है। कई स्थानों पर इसे चौकी के रूप में तैयार किया जाता है, जिसके मध्य में देवी का स्थान निर्धारित होता है। ऐपण की प्रत्येक आकृति के पीछे कोई न कोई लोकविश्वास और प्रतीकात्मक अर्थ छिपा होता है। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी माताओं, आमा, दादियों और घर की अन्य महिलाओं के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुँचती रही है।
स्व. नाथू राम उप्रेती ने अपने मोनोग्राफ में उल्लेख किया है कि महालक्ष्मी को धन, वैभव, सौभाग्य और समृद्धि की देवी माना जाता है। भारतीय धार्मिक परम्परा में उनका स्वरूप समय के साथ विभिन्न रूपों में विकसित हुआ है। ऋग्वेद में लक्ष्मी शब्द का प्रयोग शुभ लक्षण और मांगलिकता के अर्थ में मिलता है। तैत्तिरीय उपनिषद् में श्री का सम्बन्ध वस्त्र, गौ, अन्न और पेय जैसी जीवनोपयोगी वस्तुओं से जोड़ा गया है। आगे चलकर पुराणों में लक्ष्मी को समुद्र मंथन से उत्पन्न देवी तथा भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। कमल पर विराजमान लक्ष्मी का स्वरूप उर्वरता, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
कुमाऊँ में महालक्ष्मी के ऐपण की एक विशिष्ट आकृति में देवी को चार भुजाओं वाली दर्शाया जाता है। उनके हाथों में चक्र, पद्म, त्रिशूल और शंख बनाए जाते हैं। देवी के नीचे चौकी होती है, जिसमें खोरिया अथवा भद्र नामक ज्यामितीय आकृति उकेरी जाती है। चौकी के दोनों ओर देवी के चरणचिह्न बनाए जाते हैं। आकृति के निचले दोनों कोनों पर जलकुंड दर्शाए जाते हैं। देवी के दोनों ओर हाथियों की आकृतियाँ होती हैं, जो उन्हें पुष्पमालाएँ अर्पित करते दिखाई देते हैं। हाथी भारतीय धार्मिक प्रतीक परम्परा में मेघों और वर्षा के सूचक भी माने जाते हैं। वर्षा से ही धरती की उर्वरता और कृषि की समृद्धि जुड़ी हुई है। इस प्रकार लक्ष्मी का यह स्वरूप प्रकृति, कृषि, जल और मानव जीवन की सम्पन्नता के बीच गहरे सम्बन्ध को भी अभिव्यक्त करता है।
नाथू राम उप्रेती के ही अनुसार महालक्ष्मी पूजा की रात्रि में भी कुछ परिवारों में विशिष्ट परम्परा का पालन किया जाता है। कांसे की थाली पर चंदन के लेप से दो हाथियों के मध्य लक्ष्मी की आकृति बनाई जाती है। थाली को चावल और धान से तैयार खील से भरा जाता है। उसके ऊपर गन्ने के दो डंडों से एक मेहराब तैयार किया जाता है। चावल के ऊपर देवी की प्रतिमा स्थापित कर उसके सामने आभूषण, सिक्के और मिठाइयाँ रखी जाती हैं। चारों ओर मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। दीपक केवल अंधकार को दूर करने का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में पवित्रता, श्रद्धा, शांति और आंतरिक प्रकाश का प्रतीक भी है।
कुमाऊँ की दीपावली में महालक्ष्मी के ‘पौ’ बनाने की परम्परा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। गेरू से रंगी जमीन पर सफेद बिस्वार से देवी के छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं। इन्हें स्थानीय बोलचाल में लक्ष्मी के ‘पौ’ कहा जाता है। घर के मुख्य द्वार की देहली से आरम्भ होकर ये चरणचिह्न पूजा स्थल और वहाँ से घर के भीतर रखी धन-संग्रह की पेटी अथवा खजाने तक बनाए जाते हैं। इनका आशय यह है कि देवी लक्ष्मी घर में प्रवेश कर रही हैं और उनके साथ सुख, सौभाग्य तथा समृद्धि भी आ रही है। यह परम्परा अपने आप में अत्यन्त भावपूर्ण है। घर की महिलाएँ बड़ी श्रद्धा से इन पाँवों को बनाती हैं और मानती हैं कि देवी के शुभ चरण घर में सदैव बने रहें।
कुमाऊँ की ऐपण कला में गेरू और बिस्वार का संयोजन केवल कलात्मक आकृतियाँ भर नहीं हैं, बल्कि इनके भीतर सदियों का अनुभव, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और समृद्ध जीवन की कामना समाहित है। आधुनिक समय में ऐपण के स्वरूप और माध्यम में बदलाव आया है। अब इसे कपड़े, कागज, लकड़ी और अन्य सजावटी वस्तुओं पर व स्टीकर के रूप में भी बनाया जाने लगा है। यह प्रसन्नता की बात है कि नई पीढ़ी भी इस कला को सीखने और आगे बढ़ाने में रुचि ले रही है।
आवश्यकता इस बात की है कि ऐपण को केवल त्योहारों की सजावट व रस्म अदायगी तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे कुमाऊँ की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में समझा और संरक्षित किया जाए।
लेख : श्री चंद्रशेखर तिवारी जी।













