उत्तराखंड के रोचक कहावतें और मुहावरे

kumaoni proverbs and idioms
कुमाऊंनी कहावतें और मुहावरे 

कुमाऊंनी भाषा कितनी समृद्ध है इसका अंदाजा यहाँ के कहावतों और मुहावरों से भी लगाया जा सकता है। ये कहावतें ऐसी हैं जो हमारे पुरखों से लेकर आज तक हम सभी अपनी सामान्य बोलचाल में प्रयोग करते आ रहे हैं। इनका भाव हमारे समाज को एक दिशा देते रहा है। ये कहावतें और मुहावरे यहाँ की संस्कृति, परम्परा, कृषि, मौसम, मानवीय व्यवहार आदि पर आधारित हैं। लेकिन बदलते युग में हमारी भाषा ये शब्द कहीं खो से गए हैं।  

यहाँ कुछ रोचक कुमाउनी कहावतों और मुहावरों का संकलन भावी पीढ़ी के लिए कर रहे हैं। ये सभी हमने अपने बुजुर्गों को आम बोलचाल में कहते हुए सुना है। आप इन्हें पढ़ें और अन्य अपने परिवार जनों के भी पढ़ायें। 


कुमाऊंनी कहावतें और मुहावरे 

  • द्याप्त देखण जागस्यर , म्यल देखण बागस्यर
शाब्दिक अर्थ : देवता देखने के लिए जागेश्वर और मेला देखने लिए बागेश्वर।
भावार्थ : यहाँ कहावत जागेश्वर और बागेश्वर की महत्ता को दर्शाते हुये कही जाती है। कुमाऊँ में कहा जाता है यदि हमने देवताओं और इनके मंदिरों को देखना है तो जागेश्वर जाना चाहिए वहीं मेला देखना है तो बागेश्वर चले जायें। यहाँ हर साल माघ माह में उत्तरायणी का मेला लगता है, जिसका अपना अलग पौराणिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और व्यापारिक महत्व है।   


  • कौ लाटा आंण-काथा, सुण काला तु। अनाड़ि तु घट लगाये, दौड़ डुना तु। 
शाब्दिक अर्थ : गूंगा तुम पहेली और कथा सुनाओ और बहरे तुम सुनो। जो कुछ नहीं जानता है वो पनचक्की तैयार करो और लंगड़े तुम दौड़ो। 

भावार्थ : विपरीत योग्यता वाले लोगों से कार्य करवाना। 
   

  • जेठक जस कैरू, पूसक जस पालक। 
शाब्दिक अर्थ : ज्येष्ठ के महीने जैसा शतावर और पूष के महीने सा पालक। 
भावार्थ : औषधीय उपयोग में आने वाले शतावर को पहाड़ में कैरू कहा जाता है, जो जेठ के महीने में फलता फूलता है। इस वक्त में शतावर का पौंधा काफी नाजुक और सुंदर हो जाता है। इसी प्रकार पौष माह में पर्वतीय क्षेत्र में पालक के पौधे भी पूरे यौवन पर होते हैं। कुमाऊंनी साहित्य में नव यौवना की तुलना पौष के पालक और जेठ के शतावर से की जाती है। राजुला मालू शाही की लोक गाथा में कहा गया है- पूषै की पालक जसी, सुनपता सौकैकी चेलि।

  • निमड़ी भे चिमड़ी भलि।
शाब्दिक अर्थ : खत्म होने से भला (चिमड़ी-चिमड़ी) थोड़ा-थोड़ा करके खाना अच्छा।

भावार्थ : यानि खत्म होने से भला है हम इन चीजों को थोड़ा-थोड़ा करके उपयोग करें ताकि वह लंबे समय तक टिक सके।
  • बौज्यूक रूंण तक दैज, ईजा क रूंण तक मैत। 
शाब्दिक अर्थ : पिताजी के जीवित रहने तक दहेज़, और माँ के जीवित रहने तक मैत। 
भावार्थ : पिता जी के जीवित रहने तक बेटी को दहेज़ यानि उपहार प्राप्त होते रहते हैं और माँ के जीवित रहने तक उसका मायके में आना-जाना रहता है। 
  • हालने-हालने अलूणि हाथ। 

शाब्दिक अर्थ : डालते-डालते नमक न होने वाला हाथ।  
भावार्थ  : यह मुहावरा अपने अच्छे कर्म के बावजूद लोगों के गलत व्यवहार करने पर कहा जाता है। 


  • मी त्यर घर ऊन तू के दिले ? तू म्यर घर आले के याले`ल्याले ?

(मैं आपके घर आऊंगा आप क्या दोगे और आप मेरे घर आओगे क्या लाओगे ?)
सभी जगह अपना ही फायदे की बात करना। 


  • चुनि -चुनि खांण बार-बार, उपाड़ी खांण एक बार।  

(चुनचुनकर खाना बार बार और उखाड़ कर खाना एक बार। )
अपने संसाधनों को हम धीरे-धीरे सोचसमझकर उपयोग में लायेंगे तो हम उसे अधिक समय तक उपयोग में ला सकते हैं , वहीं उसी चीज को हम एक ही समय में खाने के लिए बर्बाद कर देंगे तो वह भविष्य के लिए नहीं बच पायेगा। 


  • जो काका क ले खूँन कूँ, वो बाबुक  ले नैं खै सकन। 

(जो व्यक्ति अपने चाचा की भी सम्पति को भी खाने की लालसा रखता है वो अपने पिता की सम्पति भी नहीं खा सकता है। )
जो व्यक्ति लालच में दूसरों की सम्पति हड़पना चाहते हैं वे अपनी सम्पति भी गँवा बैठते हैं यानी व्यक्ति अपनी सम्पति का भी आनंद नहीं ले सकते हैं। 


  • जब जाले अल्माड़, तब लगाल गजमाड़। 

(जब जायेगा अल्मोड़ा , तब लगेंगे खरोंच। )
जब हम  घर से बाहर निकलेंगे, तभी हमें वास्तविक दुनियादारी का पता लगेगा। 


  • अकल कि और उमर कि भेंट न हुनि। 

(अक्ल और उम्र की भेंट नहीं होती है। )
अक्सर उम्र के हिसाब से हममें बुद्धिमत्ता नहीं होती है। 


  • जां बिराव ना हुन, वां मुस नाचनी। 

(जहाँ बिल्ली नहीं होती है , वहां चूहे नांचते हैं। )
जहाँ कोई नियंत्रण नहीं होता है वहां अराजकता रहती है। 


  • चोर कैं चोरी कर , गुसैं कैं चिताव होये। 

(चोरी से कहा चोरी कर और मालिक से कहा ख़बरदार रहना। )
सभी जगह अपना भला बने रहना। 


  • मडु फकियौल, आफि देखियौल। 

(मडुवा गिरेगा, अपने आप दिखेगा। )
जो जैसा कर्म करेगा उसका फल कुछ समय बाद दिखने लगेगा। 


  • मान सिंह कैं मौन लै चटकाय, पान सिंह क मूख उसाय। 

(मान सिंह को मधुमक्खी को काटा, लेकिन पान सिंह मुँह में सूजन आया। )
बात किसी और व्यक्ति को कहीं लेकिन बुरा किसी अन्य व्यक्ति को लग गया। 


  • अभागी कौतिक ग्यो, कौतिक नी भय। 

(अभागी मेला देखने गया लेकिन वहां मेला ही नहीं लगा। )
यह मुहावरा दुःखी व्यक्ति को और नुकसान होने पर कहा जाता है। 


  • नाई दगाड़ सल्ला नै, ख्वर बिझै बैठ। 

(नाई से बोलचाल नहीं , लेकिन बाल कटवाने के लिए सर को गीला कर बैठे। )
बिना सोचे समझे काम प्रारम्भ करना। 


  • हगण तकै बाट चाण। 

(दिशा-जंगल जाने तक ही रास्ते को देखना। )

जरुरत पड़ने पर भी सामान को देखना। 


  • पिनाऊ पातक पाणी। 

(अरबी के पत्ते का पानी। )

क्षण भंगुर। 


  • द्वी दिनाक पूँण , तिसार दिन निमजूण। 

(दो दिन के महान मेहमान, तीसरे दिन से परेशानी। )

कुछ की समय तक आदर सत्कार होना। 


  • भाल-भाल मरि गईं मुसाक च्याल पधान। 

(अच्छे -अच्छे मर गये, चूहे के बच्चे प्रधान। 

अयोग्य व्यक्ति को कमान दे देना। 


  • कां झै भट भुट, कां चिढ़-चिढ़ उठ। 

(कहाँ जो भट भूने, कहाँ हो चटकने की आवाज आई। )

कहाँ जो बात कही , कहाँ जो बात का असर हुआ।    


  • काव क पथील, कावैं लाड़। 

(कौए के बच्चे, कौवे को ही प्यार। )
अपनी चीज सभी को पसंद होती है। 


  • हुंणी छैं कि एक सपक, नि हुंणी छैं कि सौ सपक। 

(बनने वाली छाछ एकबार बार में ही तैयार हो जाती है वहीं जो छाछ न बनने वाली हो उसको सौ बार भी मथ लो वह नहीं बन पाती है। )

होने वाला काम एक बार में ही बन जाता है। 


  • कयों ब्यू लूँण लगाय, क़वास ठूंगनै आय। 

(मटर के बीज लेने भजा तो उसकी फली को हीक खाते चले आये। )
यह मुहावरा लापरवाही के लिए प्रयोग किया जाता है। 


  • छै च्याल, नौ नाती , तब ले बुढ़ बागल खाय। 

(छः लड़के और नौ नाती तब भी बुड्ढे को बाघ ने खाया। )
सावधानी रखने के बाद भी नुकसान होना। 


  • जामनै बे कामन। 

(उगते ही कांपने लगना। )
शुरू से ही कमजोर हो जाना। 


  • कफते खिमु कड़कड़, कफते खिमुली कड़कड़ी। 

(कभी खीम नाराज, कभी खिमुली नाराज। )
हर समय मनमुटाव रहना। 


  • बाव क हाथ खज्यै, बुड़क खाप खज्यै।

(बच्चे के साथ खुजलाते हैं और बूढ़े का मुंह खुजलाता है। )
समय के हिसाब से बदलाव आना।   

         

  • गुड़ अन्यार में ले मिठ, उज्याव में लड़ मिठ

( गुड़ अँधेरे में भी मीठा, उजाले में भी मीठा)

इंसान के अच्छे गुण हर जगह दिखाई देते हैं। 


  • दाद राठ चाक में तो हामी पाख में 

भाई लोग घर के एक प्रतिष्ठित स्थान में, हम छत में।  

इर्ष्या से चलते दिखावा करना। 


  • जस ब्यु उस बालड़। 

(जैसा बीज वैसी बाली।)

माता-पिता में जिस प्रकार के गुण होते हैं वही गुण उनकी सन्तान में भी होते हैं।


  • न पटियांक गोपी बामण। 

(कोई नहीं मिला तो गोपी बामण ही सही)

नजदीक के आदमी की कोई इज्जत नहीं होती, उसे सिर्फ उस समय काम में लाया जाता है जब कोई भी आदमी काम करने को नहीं मिलता है।


  • जां कुकुड़ नै हुन वां रात नै ब्यानी ? 

(जहाँ मुर्गा नहीं होता वहां भोर नहीं होती ?)

किसी भी व्यक्ति या वस्तु के बिना कोई भी कार्य हो सकता है। 

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Famous Kumaoni proverbs and idioms

  • अघाइनाक बामन, भैसेन खीर   

पेट भरा हो तो ब्राह्मण को खीर से भैंस की बदबू आती है। 

खाने पीने के बाद तृप्त आदमी को खाने में कमियां नजर आती हैं। 


  • जाँ स्वीड़ न अटान, वाँ संपव। 

( जहाँ सुई नहीं आती, वहां सम्बल रखना )

किसी भी चीज को उसके स्थान पर न रखकर दूसरे जगह जोर जबरदस्ती कर रखना। 


  • चार खै ग्याय चाखुड, फंस पड़ी भ्याकुड़ 

( चारा तो कोई दूसरी चिड़िया  (उसका नाम चाखुड़ है ) खा गयी पर फांस में फंस पड़ी कोई दूसरी चिड़िया (उसका नाम भिकुड़ी)- भिकुड़ी=उत्तराखंड में पायी जानी वाली एक चिड़िया। 

भावार्थ : निर्दोष का फंस जाना। 


  • भै भरौस धनकि आड़। 

(भाई का भरोसा और धन की आड़ )

भाई का साथ धन के समान है। जिस प्रकार धन होने पर व्यक्ति कोई किसी चीज की चिंता नहीं होती है उसी प्रकार एक भाई का साथ होने पर वह व्यक्ति किसी भी शक्ति को परास्त कर सकता है। 

 

  • पुस्याण मरि पछ्याँण तरि। 

(बुआ मरी, जानपहचान छूटी। ) 

एक समय के बाद रिश्ता तोड़ देना। 


  • गौं तिरूँण, मो न तिरूँन। 

(गांव छोड़ना, परिवार न छोड़ना। )

यह कहावत अपनी छोटी वस्तुओं को अपने आस पड़ोस में मिल बांटकर खाने को कहा जाता है। चाहे ये वस्तुएं पूरे गांव वालों को न दे पायें लेकिन अपने पड़ोस के लोगों को जरूर देना चाहिए, जिससे मेलजोल बना रहे।  


  • कब ब्याल थोरी, कब होलि खोरि। 
(कब ये भैंस दूध देने वाली होगी, कब हमारी अच्छी किस्मत होगी।  
परिणाम का लम्बा इन्तजार करना। 

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  • आपण पराय है जां, विराण आपण। 
(अपना दूसरे का हो जाता है और पराया अपना। )
अपनत्व को न समझना। 

  • अघिन लकाड जलि बेर पछिन जां। 
(आगे की लकड़ी जलकर पीछे ही जाती है। )

  • पैल बखत अकल नैं, दूसर बखत डबल नैं। 
(पहले समय अक्ल नहीं, दूसरे समय धन नहीं। )
 समय के अनुसार जरुरत की चीजे उपलब्ध न होना।  

  • नख माथि मास नें, झूनी मली गौं नैं। 
(नाखून के ऊपर मांस नहीं और झूनी के ऊपर गांव नहीं। )
यह कहावत बागेश्वर के झूनी गांव के लिए कही जाती है। झूनी गांव बागेश्वर जिले का दूरस्थ गांव है इसके बाद आगे हिमालय है। इसलिए कहा गया है जिस प्रकार नाखून से ऊपर मांस नहीं है उसी प्रकार झूनी से ऊपर को कोई गांव नहीं है। 

  • मुसक ज्यान जाणैं, बिराऊक खेल। 
(चूहे की तो प्राण जाने वाले हैं वहीं बिल्ली के खेल हो रहे हैं। )
किसी के दुःख में उससे सहानुभूति न रखना और उसके दुःख को और बढ़ाना।

  • तुस्यारैकि कड़कड़ घाम ऊण तक लै, झूठैकि कड़कड़, सांच ऊण तक लै।
(पाले की कड़कड़ धूप आने तक और झूठ की कड़कड़ सच्चाई आने तक। )
अर्थात झूठ का कोई आधार नहीं होता है, जबकि सच्चाई के अस्तित्व को कभी छिपाया नहीं जा सकता। सच्चाई देर सबेर सामने आ ही जाती है। इसके लिए थोड़ी देर इंतजार भी करना पड़ सकता है। सच्चाई सामने आई नहीं कि झूठ का अस्तित्व ही मिट जाता है। सच्चाई सामने आने पर झूठ वैसे ही खत्म हो जाता है, जैसे धूप आने पर पाले को पिघलते देर नहीं लगती। इसलिए झूठ का सहारा लेने वालों के विरुद्ध थोड़ा इन्तजार अवश्य करें।

  • हरु ओण हरपट, हरु जांण खटपट। 

(यह कहावत कुमाऊँ में प्रचलित है। जिसका शाब्दिक अर्थ है लोक देवता हरु के आने से हरियाली /खुशहाली आने लगती है।  वहीं उनके चले जाने पर खटपट शुरू हो जाती है यानि अच्छा नहीं होता। 


यह थे उत्तराखंड (कुमाऊँनी भाषा में ) की कुछ प्रसिद्ध और आम कहावतें और मुहावरे।  इनको आप भी जरूर अपनी बातचीत और उदाहरण देते हुए उपयोग में लायें ताकि आने वाली पीढ़ी के लिए भी ये जीवित रहें। भूल चूक एवं संसोधन के लिए कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।