सावन माह की संक्रांति यानि हरेला पर्व से बागेश्वर जिले के पोथिंग गांव स्थित सुप्रसिद्ध भगवती माता मंदिर में होने वाली आठों पूजा (वार्षिक पूजा) की तैयारियां अत्यंत हर्षोल्लाष एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ प्रारंभ हो जाती है। जिसमें देव डांगरों की उपस्थिति में कपकोट के उत्तरौड़ा गांव से दो कदली वृक्षों को पोथिंग गांव में लाकर निर्धारित स्थान पर रोपा जाता है। जिसका उपयोग आगामी भाद्रपद महीने में माँ नंदा माई (भगवती) के भव्य मूर्ति (मुखार) निर्माण में किया जाता है। कदली वृक्ष लाने की यह परंपरा यहाँ गढ़िया परिवार के पुरुखों के समय से चली आ रही है।
पोथिंग गांव स्थित माँ नंदा भगवती जिन्हें लोग नंदा माई के नाम से भी जानते हैं; के मंदिर में हर वर्ष भाद्रपद (अगस्त – सितम्बर) के महीने में पूजा -अर्चना की जाती है। जो यहाँ के ग्रामवासियों द्वारा आठों और स्योपाती के रूप में आयोजित होती है। यहाँ एक वर्ष आठों पूजा और दूसरे वर्ष स्योपाती पूजा की परंपरा है।
- आठों पूजा : यह पूजा पूरे 8 दिन तक चलती है और नंदा अष्टमी को संपन्न होती है। जिस वर्ष यहाँ आठों पूजा का निर्धारण होता है, केवल उसी वर्ष कदली वृक्ष लाने की परंपरा है।
- स्योपाती पूजा : यह पूजा 5 दिन की होती है। पंचमी के दिन मुख्य मंदिर में पूजा संक्षिप्त रूप में संपन्न होती है।
हरेला पर्व पर कदली वृक्ष लाने की परंपरा
पोथिंग गांव में हरेला पर्व के दिन पूरे रीति-रिवाज और भक्ति भाव से कदली वृक्ष यानी दूध केले के पेड़ लाकर लगाये जाते हैं। हरेला की पूर्व संध्या पर पोथिंग गांव से चयनित लोग देवी भगवती, लाटू, गोलू, बाण, छुर्मल आदि देव डांगरों (वे व्यक्ति जिनके शरीर में देवता अवतरित होते हैं) के साथ पैदल कन्यूटी होते हुए पुल बाजार पहुँचते हैं। यहाँ कपकोट के ग्रामीण धूप, दीप और ढोल-नगाड़ों के साथ पोथिंग से पहुंचे देव डांगरों का स्वागत करते हैं और दल को माँ भगवती के जयकारों के साथ स्थानीय कपकोट बैंड तक पहुंचाते हैं। फिर यह दल पनौरा गांव होते हुए उत्तरौड़ा गांव पहुँचता है। जहाँ देव डांगरों और उनके साथ पहुंचे ग्रामीणों का भव्य होता है। इस दौरान उत्तरौड़ा गांव में खूब चहल-पहल रहती है। रात में यहाँ माता के भजन-कीर्तन गाये जाते हैं। दल का रात्रि विश्राम उत्तरौड़ा में ही होता है।
जब देवी खुद करती हैं कदली वृक्षों का चुनाव
भोर होते ही देव डांगर और दल के सदस्य सरयू में स्नान करके कदली वृक्ष के बगीचे के पास बने मंदिर में पहुँचते हैं। धूप-दीप और पूजा अर्चना के बाद माँ भगवती अपने डांगर में अवतरित होकर कदली वृक्षों को पोथिंग गांव ले जाने के लिए चुनाव करती हैं। प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं जिन वृक्षों को माता के धाम ले जाना होता है माँ भगवती उनमें अक्षत फेंकती हैं और पेड़ों में कंपन पैदा होती है, वे हिलने लगते हैं। उन्हीं वृक्षों को जड़ सहित उखाड़कर पोथिंग ले जाया जाता है।
वृक्षों की बेटी की तरह विदाई
माँ नंदा भगवती द्वारा चयनित पेड़ों को अब पोथिंग को विदा करने की तैयारियां प्रारंभ होती हैं। इस दौरान उत्तरौड़ा गांव के लोग इन वृक्षों का दर्शन कर अपनी ओर से भेंट देते हैं। उनके लिए ये सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि साक्षात् देवी का रूप और अपने गांव की बेटी समान हैं। जैसे ही इन पेड़ों की विदाई शुरू होती है ग्रामीणों की आंखें नम हो जाती हैं। जिस तरह एक बिटिया को लोग ससुराल को विदा करते हैं, उसी भाव से उत्तरौड़ा के लोग इन कदली वृक्षों को विदा करते हैं। वृक्षों को चुनरी, पिछौड़ा आदि वस्त्र ओढ़ाकर विदा करने की परंपरा है। इस दौरान महिलायें मंगल गीतों को गाती हैं। विदा करने का यह पल बेहद ही भावुक करने वाला होता है। कुछ दूर तक ग्रामीण नंगे पाँव इन वृक्षों को विदा करने आते हैं।
वृक्षों को लेकर पैदल खड़ी चढ़ाई चढ़ता है दल
पिछौड़ा, चुनरी आदि वस्त्रों से सजे दो कदली वृक्षों को अपने हाथों में लेकर भकोरे, शंख और जौल्या घंटियों की ध्वनि के साथ दल पैदल नंगे पाँव गैनाड़ की खड़ी पहाड़ी को पार कर पन्याती गांव पहुँचता है। दल पूरी श्रद्धा और कठिन पैदल यात्रा करते हुए पोथिंग को ओर आगे बढ़ता है। वहीं दूसरी तरफ पोथिंग गांव में कदली वृक्षों के आने का बेसब्री से इंतजार रहता है। माँ भगवती के दास बंधु ढोल-दमाऊं लेकर ‘बीथी छीना’ तक कदली वृक्ष की अगवानी करने के लिए आते हैं। यहां से सभी श्रद्धालु दल में सम्मिलित होते जाते हैं।
हरेला पर होता है कदली वृक्षों का रोपण
कदली वृक्ष लाने वाला दल ढोल-दमाऊँ की धुन के एवं अन्य श्रद्धालुओं के साथ गांव में प्रवेश करता है। इस दौरान अपार जनसमूह इन वृक्षों के दर्शनार्थ यहाँ पहुँचता है। वैदिक मंत्रोच्चार और ढोल, नगाड़े और भकोरे के धुन के साथ निर्धारित स्थल पर माँ भगवती, लाटू देवता, गोलू देवता अपने डांगरों में अवतरित होकर इन वृक्षों का रोपण रोपण करते हैं। इस दौरान हरेला भी अर्पित किया जाता है। आगामी पूजा तक हर दिन गौ दुग्ध (गाय के दूध) से वृक्षों को सींचने की परंपरा है। भाद्रपद माह की सप्तमी को इन दो वृक्षों में से एक वृक्ष को मुख्य मंदिर में ले जाया जाता है, जहां अष्टमी को होने वाली पूजा के लिए नंदा माई के मुखार निर्माण में इसके तने का उपयोग होता है।
पोथिंग और उत्तरौड़ा गांव का अटूट संबंध
उत्तरौडा गांव से कदली वृक्षों को लाने की यह परंपरा यहाँ कई पीढ़ियों से चली आ रही है। इस अनुष्ठान के कारण ‘पोथिंग‘ और ‘उत्तरौड़ा गांव‘ के बीच सदियों पुराना “मित्र गांव” का अटूट रिश्ता कायम है। भाद्रपद में पूजा के दौरान उत्तरौड़ा गांव के लोगों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है, इन दौरान उनका पोथिंग में खूब आतिथ्य सत्कार होता है।
हरेला पर्व के अवसर पर पोथिंग स्थित माँ नंदा भगवती की आठों पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, अपनी ईष्ट देवी के प्रति आस्था और मानवीय संवेदनाओं का अनूठा ताना-बाना है। एक पेड़ को बेटी की तरह दूसरे गांव को विदा करना और प्रकृति के अंश से माँ नंदा के मुखार को तैयार करना ही हमारी असली सनातन धरोहर है। यदि आप भी देवभूमि उत्तराखंड की असली लोक संस्कृति और जीवंत परंपराओं को करीब से देखना और महत्ता को जानना चाहते हैं, तो भाद्रपद माह में पोथिंग गांव की इस आठों पूजा में अवश्य शामिल हों।
जय हो पोथिंग वासी नंदा माई की! जय हो देवभूमि उत्तराखंड की!











