यूट्यूब की ट्रेंडिंग सूची में कुमाऊंनी गीत-Sonchadi

coke studio- session 2 kumaoni song

यूट्यूब की ट्रेंडिंग सूची में इन दिनों एक कुमाऊंनी गीत 'Sonchadi' यानि 'सुनचड़ी' ट्रेंड कर रहा है। जिसे कोक स्टूडियो भारत  (Coke Studio India) के सीजन-2 में उत्तराखंड की लोक गायिका कमला देवी, बॉलीवुड गायिका नेहा कक्कड़ और नैनीताल के दिग्विजय सिंह परियार ने गाया है। इस गीत के मुखड़े मुनस्यारी के लवराज ने लिखे हैं। दो दिन से यह पहाड़ी गीत यूट्यूब की दैनिक ट्रेंडिंग सूची में बना हुआ है। जिसे 48 घंटे में करीब 8 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। 

कोक स्टूडियो भारत द्वारा उत्तराखंड के कुमाऊंनी संगीत को नए कलेवर के साथ प्रस्तुत किया गया है। जिसकी शुरुवात कमला देवी के छपेली गीत 'वार बटी पार देखींछौ, धान काटियाँ स्यर। आपु दुःख ठेली बेर, दुःख रै गो त्यर। दुःख रै गो त्यर, दुःख है गो त्यर।' से होती है। फिर बारी-बारी से दिग्विजय और नेहा के द्वारा 'तु सुवा फूलों की रंग ओड़ी सुनचड़ी, मैं सुवा फूलों में मून, मैं सुवा पुंयूँ की जुगनू टिमटिमयांदी, तू सुवा पुंयूँ की ज्यून' मुखड़े के साथ गीत गुनगुनाया जाता है। कोक के संगीत के साथ पहाड़ी गीत को आधुनिकता के रंग में प्रस्तुत किया गया है। 

वहीं उत्तराखंड के लोक विधा की धनी कमला देवी ने राजुला मालूशाही की कुछ पंक्तियों से इस पहाड़ी गीत में जो प्राण डाल दिए, वो सिर्फ इनके जैसे लोक कलाकार ही कर सकते हैं। कोक स्टूडियो में गाया गया यह पहला कुमाऊंनी गीत है। जिसके मुख्य कलाकार उत्तराखंड से ही हैं। वहीं संगीत में पहाड़ी लोक वाद्य हुड़का और काँसे की थाली का भी प्रयोग किया गया है।

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कोक स्टूडियो का जो सेट तैयार किया गया है उसमें भी उत्तराखंड की खूबसूरती के साथ-साथ यहाँ की संस्कृति को बड़े प्यार के साथ दर्शाया गया है। यहाँ पंचाचूली की हिम श्रृंखलाओं और देवदार के खूबसूरत वृक्षों से आच्छादित मनमोहक दृश्य को दिखाया गया है। वहीं पहाड़ों से निकलती नदी के ऊपर बनाये गए पुल के ऊपर उत्तराखंड की लोक कला ऐपण ने सेट पर चार चाँद लगा दिए। सीढ़ीदार खेतों में रोपाई करती पहाड़ी महिलाएं इस दृश्य को और आकर्षक बना रहे हैं।

वहीं गीत की बात करें तो इसके बोल उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की कुमाऊँनी भाषा में हैं, जो यहां की लोकगाथा 'राजुला मालूशाही' की पृष्ठभूमि पर आधारित है। वही राजुला और मालूशाही जिनकी प्रेम की गाथाएं 1200 वर्षों से यहां के लोक में रचे बसे हैं। आप इस अमर प्रेम गाथा को विस्तृत में यहां पढ़ सकते हैं - राजुला और मालूशाही की प्रेम कहानी

इसके अलावा गीत की शुरुवात छपेली और समाप्ति राजुला मालसाई के गायन से करने वाली कमला देवी की बात करें तो वे पहाड़ की एक गुमनाम और उपेक्षित ऐसी फनकार हैं जिन्होंने कुमाऊं के लोक संगीत की अमूल्य विधाओं को अपने पिता से सीखा। बचपन से आज तक वे उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाई जिसकी वे हकदार हैं। वे हुड़की बौल, जागर, न्योली, छपेली, राजुला मालूशाही जैसी लोक विधाओं के गायन में निपुण हैं, जिसे आज की पीढ़ी तवज्जो नहीं देती। कमला देवी जी के बारे में पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ : कौन हैं कमला देवी। 

कोक स्टूडियो ने अपने इस गीत के बहाने उत्तराखंड के इस उपेक्षित फनकार को मंच प्रदान किया, यह उनके लिए सम्मान की बात है। आशा है लोग उन्हें और बेहतर मंच प्रदान करें। उनके पारंपरिक गीतों को सुनें और इन अमूल्य धरोहर के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए इन विधाओं को सीखें, अपने बच्चों को इस विधा की प्रेरित करें।

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