पंछी उड़ी जानी - जीवन की वास्तविकता को बता गये प्रह्लाद मेहरा।

panchi udi jane Prahlad Singh Mehra
पंछी उड़ी जानी...

कुमाऊँ के संगीत के मजबूत हस्ताक्षर प्रह्लाद सिंह मेहरा भले ही अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन वे अपने संगीत की ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जिसे पूरा उत्तराखंड सदियों तक गुनगुनाता रहेगा। पहाड़ों में होने वाली रामलीला के मंच से अपने संगीत के सफर की शुरुवात करने वाले प्रह्लाद मेहरा ने अनगिनत ऐसे गीत गाये हैं जिसमें उन्होंने पहाड़ की वास्तविकता को संगीत के माध्यम से सभी लोगों तक पहुँचाया है। जिनमें पहाड़ की बेटी-ब्वारियों के कष्टमय जीवन, रोजगार के लिए शहरों में संघर्ष करते युवाओं के दर्द को बयां करते गीत हैं। वहीं सामाजिक चेतना को जाग्रत करते गीत और रिवर्स माइग्रेशन के लिए प्रेरित गीतों के साथ-साथ उत्तराखंड; खासकर कुमाऊँ की पूरी झलक दिखती है उनके गीतों में।  

लोकगायक प्रह्लाद सिंह मेहरा के अचानक इस लोक से विदा ले लेने के बाद उनका एक गीत 'पंछी उड़ी जानी, घोल उसै रुंछो' काफी सुना जा रहा है। इस गीत में उन्होंने हमारे जीवन की वास्तविकता का वर्णन करते हुए इसकी तुलना पक्षी और उसके घोंसले से किया है। जिसकी मुख्य पंक्तियाँ हैं - पंछी उड़ी जानी, घोल उसै रुंछ, झूठो मायाजाल द्वी दिन को हुंछ। यानि पक्षी उड़ जाती है लेकिन कड़ी मेहनत से तैयार किया उसका घोंसला वहीं रह जाता है। इसी तरह हमारे जीवन में यह मोह माया सब झूठी और कुछ दिनों के लिए ही है। यहाँ इस गीत के पूरे बोल और भावार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं, जो निम्नवत हैं - 


Panchi Udi Jani Lyrics with description

पंछी उड़ी जानी, घोल उसै रुंछ 
झूठो मायाजाल द्वी दिन को हुंछ
पंछी उड़ी जानी, घोल उसै रुंछ।
झूठो मायाजाल द्वी दिन को हुंछ

(भावार्थ : प्रस्तुत गीत में हमारे जीवन की मोह-माया का चित्रण करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार पंछी के पंख लगने पर वह अपने घोंसले को छोड़ आकाश की ओर उड़ जाता है और बड़ी मेहनत से तैयार किया उसका घोंसला वहीं रह जाता है। वह पंछी उड़ जाने के बाद कभी भी वापस उस घोंसले की ओर नहीं आता है। इसी प्रकार हमारे जीवन का यह मायाजाल सब झूठा है यह सिर्फ दो दिन के लिए ही है। )   

खाली बौल्याट, खालि कै इतरात छ   
खाली बौल्याट, खालि कै इतरात छ 
खाली कै फतड़याट छ, खालि कै ललयाट छ 
यो त्यर, यो म्यर, द्वी दिन उबर, 
मनखि ले मरी जांण, को रौल अमर 
यो माया को जाल द्वी दिन को हुंछ  

(जीवन में किसी चीज को प्राप्त करने के लिए ये पागलपन, मिल जाने पर बेकार में अहंकार,  ये दौड़ -धूप, ये लालच सब बेकार हैं।  यह तेरा, यह मेरा सिर्फ दो दिन के लिए है। क्योंकि मनखी (मनुष्य ) ने एक दिन मर जाना है, अमर किसी ने नहीं रहना है। यह मायाजाल सिर्फ दो दिन का है। )

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कि ली बेर आये तु, की ली बेर जालै
कि ली बेर आये तु, की ली बेर जालै
मुठी बाधी आयै तु, खाली हाथै जालै। 
यां की माया यैं रुं, क्ये नी जाना साथ 
चार दिनै चौल, फिर अनेरी रात  
बेकार कि बात द्वी दिन को हुंछ। 

(तुम क्या लेकर आये थे और तुम क्या लेकर जाओगे। तुम मुट्ठी बांध कर आये थे और खाली हाथ जाओगे। यहाँ की यह मोहमाया यहीं रह जाती है, हमारे साथ कुछ नहीं जाना है। यह चौल (ठाठबाट) सिर्फ चार दिन के लिए हैं, फिर तो अंधेरी रात आनी स्वाभाविक है।  ये समस्त बेकार की बातें दो दिन के लिए ही होती हैं। )  

जो आज यो त्यर छ, बेली ककै छी य 
जो आज यो त्यर छ, बेली ककै छी य 
भोल कैके हो ल, पोरीं कैके हो ल 
पुर कागज बटीं जां, भाग न बटीं ना 
उ सुख न पून जो करम हीन 
यो रङ्ग यो राज द्वी दिन को हुंछ 

पंछी उड़ी जानी, घोल उसै रुंछ।
पंछी उड़ी जानी, घोल उसै रुंछ।
झूठो मायाजाल द्वी दिन को हुंछ
झूठो मायाजाल द्वी दिन को हुंछ। 

(जो आज यह आपका है, कल वह किसी और का था, कल और किसी का हो जायेगा और परसों किसी और का। पूरा कागज बंट सकता है लेकिन भाग्य नहीं बंटता। इसलिए आप कर्म करते रहें। कर्महीन व्यक्ति को कभी भी सुख की प्राप्ति नहीं होती है। अपने इस रंग -राज पर  घमंड न करें क्योंकि यह सब दो दिन के लिए है। जिस प्रकार एक दिन पंछी अपने घोंसले को छोड़कर सदा के लिए चली जाती है और उसका घोंसला वहीं छूट जाता है। उसी प्रकार हमने भी कुछ समय बाद इस संसार से विदा हो जाना है और यह मोह माया यहीं रह जानी है। इसलिए आप अपने चमक-दमक के लिए इस दुनिया में मोह माया, अहंकार, ईर्ष्या, लालच से दूर रहें क्योंकि यह सब झूठा और क्षणभंगुर है। )     
   
स्वर्गीय प्रह्लाद मेहरा (Prahlad Mehra) ने अपने कुमाउनी गीत से जो यह सन्देश दिया है वह वास्तविक है, हमें इन पंक्तियों का पालन करते हुए अपना कर्म करते रहना चाहिए। भले ही आज वे आज हमारे बीच नहीं रहे; उनके ये प्रेरणादायी गीत उन्हें सदैव के लिए अमर रखेंगे।