हमारा पहाड़ आज जिन कठोर संघर्षों के साथ जिस श्रेष्ठ मुकाम पर खड़ा है, वह हमारे लिए अत्यंत गौरवपूर्ण है। किंतु पहाड़ के इस विराट अस्तित्व को निरंतर जीवित बनाए रखने के पीछे साहस, शौर्य व बलिदान के कई रहस्यमयी रोचक तथ्य भी जुड़े हुए हैं, जिनमें महिलाओं-बेटियों  की अनुपम भूमिका भी पीछे नहीं है।

हमारे उत्तराखंड की वह भूमि जहां के प्रत्येक कण-कण में देवी-देवताओं का वास और लोगों के रोम-रोम में भगवान के प्रति अटूट आस्था बसी हुई है, जिस माटी का प्रत्येक कण वीर भड़ों के पराक्रम की पराकाष्ठा का प्रतीक है, हम उसी देवभूमि के वासी हैं। हमारे गौरवशाली भारतवर्ष में मातृशक्ति प्राचीनकाल से ही सदैव पूजनीय  व वंदनीय रही है। जीवन का हर प्रसंग नारीत्व बोध के बिना अधूरा है, सविता, सावित्री, अहिल्याबाई,  रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती जैसी अनेक वीर नारियों ने हमारी भारत मां का मान बढ़ाया है। इन्हीं की भांति हमारे पहाड़ की महिलाओं ने भी अपने अदम्य साहस, शौर्य व अपने अद्भुत कृत्यों से देवभूमि का वैभव सिंगार किया है। व देव भूमि को एक वीरांगनाओं व देवियों की भूमि में तब्दील किया है। बात जब भी पहाड़ों की होती है, तो संघर्षशील अभावों के कुछ पथ स्वतः ही जुड़ जाते हैं। पहाड़ के पहाड़ जैसे ही विराट इन संक्रीलें अभावों के पथों  से उभर कर शौर्य की एक अलग कहानी बन जाना ही, हमारे पहाड़ की इन महिलाओं एवं बेटियों की वीरता का एक पृथक परिचय कराती है। वर्षों से यह कहावत हमारे पहाड़ों में काफी प्रचलन में रही है, कि पहाड़ का पानी व पहाड़ की जवानी कभी भी पहाड़ के काम नहीं आती है, किंतु तकनीकी के बदलते इस आधुनिक दौर ने कहीं न कहीं इस कहावत को भी गलत साबित कर यह सिद्ध कर दिया है कि यदि अपने पहाड़ों के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला हो तो पहाड़ की जवानी पहाड़ के ही नहीं बल्कि संपूर्ण विश्व व देश के काम आ सकती है। जी हां साथियों आज अपने किस्से के पहाड़ की इसी कड़ी में बात पहाड़ की उस महिला की जो पिछोड़ी पर शुरू किए गए अपने अनोखे स्टार्टअप के माध्यम से राज्य को विश्व स्तर पर एक अलग सांस्कृतिक पहचान दिला रही है। उत्तराखंड के कुमाऊं प्रांत से संबंध रखने वाली पिछोड़ी वूमेन मंजू टम्टा जी ने पहाड़ी कल्चर को बढ़ावा देने व पहाड़ों में खुद का रोजगार शुरू करने हेतु राज्य के नव युवाओं के लिए एक पृथक परिभाषा गढ़ी है। अपनी इस अनुपम, अभूतपूर्व पहल के माध्यम से उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से यह बयां किया है कि पहाड़ का हर एक पहाड़ी पर्वत जैसे ही कठोर  हौसलों व बुलंदियों के इरादों को लेकर जीते हैं।

मूल रूप से लोहाघाट चंपावत की रहने वाली मंजू टम्टा जी का जन्म दिल्ली में हुआ। मंजू जी का बचपन और जवानी शहरों में ही व्यतीत हुई,  किंतु वह बताती है कि दिल्ली जैसे महानगर में रहकर भी वह अपने कुमाऊनी कल्चर से इतर नहीं हुई। वह सदैव अपनी मूल जड़ों पर ही अडिग रही, वर्षभर में अक्सर वह गर्मियों आदि की छुट्टी में ही अपने परिवार के साथ गांव जा पाती थी। मंजू जी की स्कूली पढ़ाई दिल्ली के प्रतिष्ठित लेडी इरविन स्कूल से हुई और फिर स्नातक दिल्ली के लेडी श्री राम कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में संपन्न कर,  उन्होंने ताज ग्रुप ऑफ़ होटल्स सहित तमाम कई प्रसिद्ध संस्थानों में नौकरी भी की। मंजू जी यह बताती है कि काफी पहले से उनके मन में यह विचार था,  कि अपने उत्तराखंड के उत्पादों पर कुछ अलग तरह से कार्य किया जाए,  विशेषकर कुमाऊं की रंगीली पिछौड़ी उन्हें काफी लुभाती थी। वह कहती है कि अपने छोटे भाई की शादी में उन्होंने पिछौड़ी पहनने का निर्णय लिया और अपनी चंपावत की मौसी से 3 पिछोड़ी मंगवाई, किंतु बदलते दौर के साथ-साथ मंजू जी को कहीं ना कहीं पिछोड़ी में आधुनिकता का कुछ अभाव लगा, और तभी से उनके मन में यह ख्याल आया कि, क्यों ना विभिन्न आकर्षक डिजाइनों के माध्यम से अपने कुमाऊं की रंगीली पिछौड़ी को नया रूप व आकार दिया जाए। इसके उपरांत मंजू जी ने पिछौड़ी पर अपना गहन अध्ययन करना आरंभ कर दिया और 2 साल तक गहन अध्ययन करने के उपरांत अपनी दिल्ली व देहरादून में रहने वाली 5-6 साथियों के साथ इस क्षेत्र में अपने कदम पसार दिए। शुरुआत में उन्होंने मात्र 30 पिछौड़ी को ही पृथक-पृथक रूप से डिजाइन किया।

अलग-अलग तरह से डिजाइन कर नए रूप में तैयार की गई पिछौड़ी की यह पहल अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे, इसके लिए उन्होंने सोशल नेटवर्किंग माध्यम अमेजॉन से संपर्क किया। बेंगलुरु, भोपाल, दिल्ली, मुंबई जैसे आदि महानगरों में रहने वाले प्रवासी पहाड़ियों ने जब अपने पहाड़ी उत्पाद को अमेजॉन पर अलग तरह से पाया तो, उन्होंने इसे खूब पसंद कर ऑर्डर किया। जिससे मंजू जी के हौसलों को कहीं ना कहीं एक और नई ऊंचाई व उड़ान मिली। मंजू जी पिछले 3 वर्षों से अपने कुछ साथियों के साथ इस क्षेत्र में "पहाड़ी ई-कार्ट" के माध्यम से बेहतरीन कार्य कर रही है। मंजू जी का यह स्टार्टअप ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर काफी प्रचलित है।  प्रशासन स्तर पर मंजू टम्टा जी को इस कार्य के लिए किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन व सहायता नहीं मिली। यह उनका निजी इन्वेस्टमेंट है, जिसे वह खुद वहन कर रही है। मंजू जी के द्वारा डिजाइन की गई यह रंगीली पिछौड़ी आज सात समंदर पार तक भी अपनी चमक को बिखेर रही है। हाल ही के कुछ विगत दिनों पूर्व बेल्जियम के एक प्रेमी युगल ने मंजू जी के द्वारा डिजाइन किए गए,  पिछोड़ा को अपनी शादी में पहन कर उनकी खूब भूरी-भूरी प्रशंसा की। मंजू जी ने अपने पहाड़ के पारंपरिक लोक परिधान पर कार्य कर रोजगार के क्षेत्र में अवसरों की एक नई ज्योति प्रज्वलित कर अपनी संस्कृति को बढ़ावा दिया है। अपनी इस रचनात्मक सोच के जरिए उन्होंने अपनी पारंपरिक विरासत को देश दुनिया तक पहुंचाने का कार्य किया है। हमारे पहाड़ों में और भी कई ऐसे उत्पाद हैं, जिन पर कुछ नया कर आत्मनिर्भर बना जा सकता है। वास्तव में मंजू जी जैसी मूर्धन्य व्यक्तित्व हम सभी के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। एक तरफ जहां लोग आज पलायन कर अपनी सांस्कृतिक विरासत से भिन्न होते जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर पिछौड़ी वूमेन मंजू टम्टा जी जैसी शख्सियत अपनी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित कर उनसे रोजगार के नए आयामों का  सृजन कर उन्हें संजोने का प्रयास कर रही है।

कुमाऊं की रंगीली पिछौड़ी की प्राचीनता 

पिछौड़ी हमारे सांस्कृतिक विरासत की एक पुरातन धरोहर रही है। जिसे मुख्य रुप से राज्य के कुमाऊं मंडल में सुहागिन महिलाओं के द्वारा मांगलिक कार्यों जैसे शादी, विवाह, पूजा, नामकरण आदि अवसरों पर पहना जाता है। कुमाऊं के कई घरों में इन पिछौड़ियों को हाथ से बनाकर आकर्षक कलात्मक रूप दिया जाता है। बेटी के विवाह के अवसर पर मायके वाले उसे  पिछौड़ी पहना कर ही ससुराल विदा करते हैं। शुभ अवसरों के साथ-साथ सुहागिन महिला के अंतिम संस्कार में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। पिछौड़ी का लाल रंग वैवाहिक जीवन की सुख, समृद्धि, संपन्नता व संयुक्तता का प्रतीक है। जबकि हल्का पीला रंग भौतिक जगत से जुड़ाव  को दर्शाता है। पिछौड़ी की सजावट में लोक कला ऐपण का भी भरपूर इस्तेमाल किया जाता है।


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