कौन थे बद्री दत्त पांडे? जानें कुमाऊं केसरी का प्रेरणादायक जीवन परिचय

जानें बद्री दत्त पांडेय (कुमाऊं केसरी) का प्रेरणादायक जीवन परिचय। कुली-बेगार आंदोलन, स्वतंत्रता संग्राम, पत्रकारिता, सामाजिक सुधार और कुमाऊं के इतिहास में उनके अमूल्य योगदान के बारे में विस्तार से पढ़ें।

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उत्तराखंड की माटी ने कई ऐसे महान विभूतियों को जन्म दिया है जिन्होंने अपने संघर्ष, त्याग और राष्ट्रसेवा से इतिहास में अमिट छाप छोड़ी है। ऐसे ही भारत के महान सपूतों में एक नाम है बद्री दत्त पांडे, जिन्हें पूरे उत्तराखंड में “कुमाऊं केसरी” के नाम से सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। वे सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि एक निर्भीक पत्रकार, इतिहासकार, समाज सुधारक, लेखक और जननेता भी थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की, सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया और कुमाऊं क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना जगाने का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य किया।

सन 1921 के ऐतिहासिक कुली-बेगार आंदोलन की अगुवाई कर उन्होंने ब्रिटिश शासन की शोषणकारी व्यवस्था को चुनौती दी। उनकी पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की, जबकि उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “कुमाऊं का इतिहास” आज भी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

बद्री दत्त पांडे का जन्म 15 फरवरी 1882 को हरिद्वार के कनखल में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से अल्मोड़ा जनपद के पाटिया क्षेत्र का रहने वाला था। उनके पिता विनायक दत्त पांडेय एक प्रतिष्ठित वैद्य थे।

बद्रीदत्त पांडे का बचपन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। जब वे मात्र 7 वर्ष के थे, तब उनके माता-पिता का देहांत हो गया। इस दुःखद घटना के बाद उनके बड़े भाई हरिदत्त पांडेय ने उनका पालन-पोषण किया। बाद में उनका परिवार अल्मोड़ा आ गया और यहीं से उनके जीवन की नई यात्रा प्रारम्भ हुई।

बद्री दत्त की प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में ही हुई। वे बचपन से ही प्रतिभाशाली, जिज्ञासु और अध्ययनशील थे। इतिहास, साहित्य और समाज से जुड़े विषयों में उनकी विशेष रुचि थी।

शिक्षा और वैचारिक विकास

अल्मोड़ा के तत्कालीन हिंदू स्कूल (वर्तमान जीआईसी अल्मोड़ा) से उन्होंने माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। उच्च शिक्षा के लिए वे इलाहाबाद गए, जो उस समय शिक्षा और राजनीतिक चेतना का प्रमुख केंद्र माना जाता था।

हालांकि पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उनकी पढ़ाई बीच में प्रभावित हुई, लेकिन उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से स्वयं को शिक्षित किया। इसी दौरान उनमें राष्ट्रवाद, सामाजिक सुधार और जनसेवा की भावना विकसित हुई।

शिक्षक से पत्रकार बनने तक का सफर

सन 1903 में बद्री दत्त पांडे ने नैनीताल के एक विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्य प्रारम्भ किया। उसके पश्चात उन्हें देहरादून में सरकारी नौकरी प्राप्त हुई।

सरकारी नौकरी के दौरान उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भारत की भोली-भाली जनता पर किए जा रहे अत्याचारों और अन्याय को नजदीक से देखा। यह अनुभव उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र देने का साहसिक निर्णय लिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में चले गए ।

उनका मानना था कि कलम की शक्ति समाज और राष्ट्र में परिवर्तन ला सकती है। इसी विश्वास के साथ उन्होंने पत्रकारिता को अपना जीवन मिशन बना लिया।

पत्रकारिता में योगदान

लीडर अखबार से शुरुआत

सन 1909 से 1910 तक बद्रीदत्त पांडेय अंग्रेजी दैनिक “लीडर” से जुड़े रहे । यहां उन्होंने सहकारी संपादक के रूप में कार्य किया। इसके बाद वे देहरादून चले गए और सन 1911-12 तक “कॉस्मोपोलिटन” समाचार पत्र के संपादक बने। पत्रकारिता के माध्यम से उनकी पहचान एक निर्भीक और राष्ट्रवादी लेखक के रूप में बनने लगी।

अल्मोड़ा अखबार को नई पहचान

सन 1913 में वे अल्मोड़ा लौटे और “अल्मोड़ा अखबार” के संपादक का कार्य किया। उनके नेतृत्व में यह अखबार केवल स्थानीय समाचारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का माध्यम भी बन गया। उन्होंने ब्रिटिश शासन की गलत नीतियों और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लगातार लेख लिखे।

उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली थी कि कुछ ही महीनों में अखबार की लोकप्रियता कई गुना बढ़ गई। जहां पहले इसकी सीमित प्रतियां छपती थीं, वहीं बाद में इसकी प्रसार संख्या हजारों तक पहुंच गई।

ब्रिटिश हुकूमत से सीधा टकराव

पंडित बद्री दत्त पांडे की पत्रकारिता अंग्रेज अधिकारियों को खटकने लगी थी। उन्होंने तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर लोमस की मनमानी और अत्याचारों को उजागर किया। जब अल्मोड़ा अखबार ने अंग्रेजी हुकूमत की आलोचना की, तो ब्रिटिश सरकार ने अखबार पर प्रतिबंध लगा दिया और भारी जमानत की मांग की। अंततः सन 1918 में अखबार को बंद करना पड़ा। लेकिन बद्री दत्त पांडेय पीछे हटने वालों में से नहीं थे।

शक्ति समाचार पत्र की शुरुआत

15 अक्टूबर 1918 को विजयदशमी के अवसर पर उन्होंने अपने सहयोगियों का साथ लेकर “देशभक्त प्रेस” की स्थापना की और “शक्ति” नामक साप्ताहिक समाचार पत्र प्रारम्भ किया।

“शक्ति” केवल एक साप्ताहिक अखबार नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का सशक्त हथियार भी था । इसके माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय चेतना का प्रसार किया और जनता को ब्रिटिश शासन के खिलाफ संगठित किया।

कुली-बेगार आंदोलन और कुमाऊं केसरी की उपाधि

बद्री दत्त पांडे के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय कुली-बेगार आंदोलन है। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान कुमाऊं क्षेत्र में कुली-बेगार नामक एक शोषणकारी व्यवस्था लागू थी। इसके तहत स्थानीय लोगों को अंग्रेज अधिकारियों का सामान बिना किसी मजदूरी के ढोना पड़ता था। यह व्यवस्था जनता के लिए अत्यंत अपमानजनक और अन्यायपूर्ण थी।

सन 1921 में बद्री दत्त पांडे ने इस प्रथा के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन का नेतृत्व किया। 14 जनवरी 1921 बागेश्वर के उत्तरायणी मेले के दिन हजारों की संख्या में लोग सरयू और गोमती नदियों के संगम पर एकत्र हुए। लोगों ने “कुली-बेगार” के समस्त रजिस्टर अंग्रेज अधिकारियों के सामने सरयू नदी में बहा दिए और इस अमानवीय बेगार प्रथा को न देने का संकल्प लिया। बताया जाता है कि लगभग 40 से 50 हजार लोग इस आंदोलन में शामिल हुए थे।

रक्तहीन क्रांति

बद्री दत्त पांडे ने बागेश्वर में बागनाथ जी के मंदिर को साक्षी मानकर जनता के साथ शपथ ली कि वे अब कुली-बेगार प्रथा को स्वीकार नहीं करेंगे। गांवों के पधानों (मुखियाओं) ने कुली-बेगार से जुड़े रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए।

यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, लेकिन इसकी शक्ति इतनी प्रभावशाली थी कि ब्रिटिश प्रशासन को झुकना पड़ा और अंततः कुली-बेगार प्रथा को पहाड़ से समाप्त कर दी गई। महात्मा गांधी ने की सफलता से प्रभावित होकर इसे “रक्तहीन क्रांति” कहा था।

इस ऐतिहासिक सफलता के बाद पहाड़ की जनता ने बद्री दत्त पांडेय को “कुमाऊं केसरी” तथा “कूर्मांचल केसरी” की उपाधि से सम्मानित किया।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

बद्री दत्त पांडे ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन सहित कई आंदोलनों में भाग लिया। उनकी राष्ट्रवादी गतिविधियों के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।

जेल यात्राएं

  • 1921 – एक वर्ष की सजा
  • 1930 – नमक सत्याग्रह के दौरान 18 माह की सजा
  • 1932 – सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान एक वर्ष की सजा
  • 1941 – तीन माह की सजा
  • 1942 – भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तारी

कुमाऊं परिषद और जनजागरण

बद्री दत्त पांडे कुमाऊं परिषद के प्रमुख संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। सन 1915 में स्थापित इस संगठन का उद्देश्य कुमाऊं की जनता को संगठित करना और उनके अधिकारों की रक्षा करना था।

सामाजिक सुधारक के रूप में योगदान

नायक प्रथा के खिलाफ संघर्ष

पर्वतीय क्षेत्र में उस समय मध्यकाल से “नायक प्रथा” नामक सामाजिक कुरीति प्रचलित थी। इस प्रथा के तहत कुछ परिवारों (नायक जाति) की महिलाओं को वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर किया जाता था। इस जाति के लोगों को भूमि या अन्य रोजगार के पारम्परिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। इतिहासकारों का मानना है कि चंद्र राजाओं के समय युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिवारों (अनाथ बच्चों और विधवाओं) की आजीविका चलाने के लिए यह व्यवस्था शुरू की गई थी, जो बाद में एक वीभत्स कुरीति में बदल गई। बद्री दत्त पांडेय ने इस अमानवीय व्यवस्था के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया।बद्री दत्त पांडे और हर्षदेव ओली के अथक प्रयासों से सन 1934 में ‘नायक प्रथा निवारण कानून’ पास हुआ, जिसने इस कुप्रथा को समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया।

शिक्षा और सामाजिक जागरूकता

उन्होंने शिक्षा के प्रसार, महिला उत्थान, सामाजिक समानता और जनजागरूकता के लिए निरंतर कार्य किया। उनकी पत्रकारिता और सामाजिक गतिविधियों ने कुमाऊं के दूर – दराज के क्षेत्रों तक जागरूकता पहुंचाई।

साहित्यिक योगदान

“कुमाऊं का इतिहास”

बदरी दत्त पांडे का सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक कार्य “कुमाऊं का इतिहास” है। यह पुस्तक पहली बार सन 1937 में प्रकाशित हुई थी और इसे कुमाऊं क्षेत्र के इतिहास पर सबसे महत्वपूर्ण किताबों में गिना जाता है। इस पुस्तक में उन्होंने विस्तार से कुमाऊं का प्राचीन इतिहास, कत्यूरी राजवंश, चंद वंश, स्थानीय जनजातियां, सामाजिक संरचना, संस्कृति और परंपराएं, राजनीतिक घटनाएं आदि विषयों का वर्णन किया है। आज भी यह पुस्तक शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और इतिहास प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण अमूल्य धरोहर मानी जाती है।

गांधीजी के करीबी सहयोगी

बद्री दत्त पांडे महात्मा गांधी के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे। सन 1929 में गांधीजी के अल्मोड़ा आगमन के दौरान उन्होंने गांधीजी के भाषण को जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सभा में गांधीजी ने धीमी आवाज में बोलना शुरू किया तो बद्री दत्त पांडेय ने स्वयं को उनका “लाउड स्पीकर” बताते हुए हर वाक्य को जोर से दोहराकर हजारों लोगों तक पहुंचाया था । यह घटना उनके समर्पण और संगठन क्षमता का सुंदर उदाहरण है।

राजनीतिक जीवन

स्वतंत्रता के बाद भी बद्री दत्त पांडे जनसेवा में सक्रिय रहे। सन 1957 में अल्मोड़ा लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार बनाया। वे चुनाव जीतकर संसद पहुंचे और 1957 से 1962 तक अल्मोड़ा के सांसद रहे। संसद में उन्होंने कुमाऊं क्षेत्र की सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास संबंधी समस्याओं को प्रमुखता से उठाया।

त्याग और सादगी की मिसाल

बद्री दत्त पांडे जी का जीवन सादगी, त्याग और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत उदाहरण था। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाली सरकारी पेंशन स्वीकार नहीं की। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्होंने अपने सभी पदक, सम्मान और पुरस्कार सरकार को समर्पित कर दिए। यह कदम उनके राष्ट्रप्रेम और निस्वार्थ सेवा की भावना को दर्शाता है।

व्यक्तिगत जीवन

बद्रीदत्त पांडे की पत्नी का नाम अन्नपूर्णा देवी था। जिन्होंने अपने पति के संघर्षपूर्ण जीवन में हर कदम पर साथ दिया। आर्थिक कठिनाइयों और राजनीतिक संघर्षों के बावजूद उन्होंने परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।

बद्री दत्त पांडे का जीवन गांधीवादी मूल्यों पर आधारित था। वे सादगी, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समानता के प्रबल समर्थक थे।

निधन

स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और समाज सुधारक बद्रीदत्त पांडेय का निधन 13 जनवरी 1965 को हुआ। उनके निधन से पूरा पर्वतीय प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया जिसने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र और समाज की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था।

बद्री दत्त पांडे की विरासत

आज बद्री दत्त पांडेका नाम उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उनकी विरासत कुली-बेगार आंदोलन की ऐतिहासिक सफलता, “शक्ति” समाचार पत्र , “कुमाऊं का इतिहास” जैसी अमूल्य पुस्तक, सामाजिक सुधारों की प्रेरणा, स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान जैसे कई रूपों में जीवित है। उनके नाम पर उत्तराखंड में कई संस्थानों, सड़कों और स्मारकों का नामकरण किया गया है।

निष्कर्ष

बद्री दत्त पांडे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक प्रेरणा थे। उन्होंने अपनी लेखनी से जनता को जागरूक किया, अपने नेतृत्व से शोषण के खिलाफ संघर्ष किया और अपने जीवन से त्याग एवं राष्ट्रभक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया। “कुमाऊं केसरी” के रूप में उनकी पहचान आज भी उत्तराखंड के लोगों के लिए गर्व का विषय है।

उनका जीवन हमें यह बोध कराता है कि दृढ़ संकल्प, साहस और जनसेवा की भावना से समाज में बड़े परिवर्तन लाए जा सकते हैं। बद्री दत्त पांडेय की विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।

Vinod Singh Gariya

विनोद सिंह गढ़िया इस वेब पोर्टल के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। करीब 15 वर्षों से विभिन्न वेब पोर्टलों के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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