“त्यर पहाड़ म्यर पहाड़, हय दुःखों क ड्यर पहाड़” यह मार्मिक रचना उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोक गायक और गीतकार स्वर्गीय हीरा सिंह राणा की है। इन पंक्तियों में उन्होंने पहाड़ यानी उत्तराखण्ड के वास्तविक दर्द, संघर्ष और पीड़ा को बहुत ही सटीक तरीके से उकेरा है। अपनी इस कालजयी रचना के माध्यम से राणा जी ने पहाड़ की दुर्दशा और सच्चाई को बयां किया है। इस पोस्ट में हम कुमाऊंनी भाषा में लिखी त्यर पहाड़ म्यर पहाड़ रचना के लिरिक्स और उसके अर्थ को प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि हमारी नयी पीढ़ी भी इस मार्मिक रचना के माध्यम से पहाड़ के वास्तविक दर्द, संघर्ष और पीड़ा के बारे जान सकें।
Tyar Pahad Myar Pahad Lyrics meaning
त्यर पहाड़ म्यर पहाड़,
हय दुःखों क ड्यर पहाड़।
बुजुर्गों लै ज्वड़ पहाड़,
राजनीतिल् त्वड़ पहाड़।
ठ्यकदारों ल् फोड़ पहाड़,
नान्तिनों ल् छोड़ पहाड़।
ग्वाव नै गुसैं घ्येर नै बाड़,
त्यर पहाड़ म्यर पहाड़ ….
- त्यर पहाड़ म्यर पहाड़, हय दुखों क ड्यर पहाड़” का अर्थ है – तेरा पहाड़ और मेरा पहाड़, वास्तव में दुःखों और कठिनाइयों का पहाड़ बन चुका है।
- बुजुर्गों लै ज्वड़ पहाड़ यानी हमारे बुजुर्गों ने इस पहाड़ को अपने खून – पसीने से सींच कर उम्रभर संभाला है।
- राजनीतिल् त्वड़ पहाड़ का अर्थ है – स्वार्थी राजनीति ने इस सुन्दर पहाड़ के लोगों को आपस में बाँटकर तोड़ने का काम किया है।
- ठ्यकदारों ल् फोड़ पहाड़ यानि ठेकेदारों ने इस पहाड़ का अत्यधिक दोहन कर इसे बहुत क्षति पहुंचाई है।
- नान्तिनों ल् छोड़ पहाड़ का अर्थ है-बच्चों /युवा पीढ़ी ने इस पहाड़ (उत्तराखंड) को अपनी मज़बूरी समझ कर छोड़ दिया है।
- ग्वाव नै गुसैं घ्येर नै बाड़ यानी इस पहाड़ को देखने /सँभालने वाला कोई मालिक नहीं रह गया है जो इसकी रखवाली/सुरक्षा कर सके।
सब ल्हे गयी शहरों में,
ठुला छ्वटा नगरों में।
पेट पाँवणों चक्करों में,
किराव दिनि कमरों में।
बांज कुड़ों में जम गो झाड़,
त्यर पहाड़ म्यर पहाड़ ….
- सब ल्हे गयी शहरों में, ठुला छ्वटा नगरों में का अर्थ है – सभी लोग पलायन कर शहरों और छोटे-बड़े कस्बों -नगरों में रहने लगे हैं।
- पेट पाँवणों चक्करों में, किराव दिनि कमरों में का अर्थ है – वे अपने पेट के खातिर विभिन्न स्थानों में किराये में रहने लगे हैं।
- बांज कुड़ों में जम गो झाड़ यानी पहाड़ से पलायन कर जाने के कारण उनके बुजुर्गों के बनाये ये घर खंडहर हो चुके हैं और उनमें अब झाड़ियाँ उग आई हैं।
क्येकि तरक्कि क्येक विकास,
हर आँखों में आंसै आंस।
जेई करण रौ बिल कैं पास,
एई मारण रौ पैसोंक गास।
अटैचियों में भर पहाड़,
त्यर पहाड़ म्यर पहाड़ ….
- क्येकि तरक्कि क्येक विकास, हर आँखों में आंसै आंस यानी यहाँ किसकी तरक्की हुई है और किसका विकास हुआ है क्योंकि यहाँ आज हर आंखों में आंसू ही आंसूं हैं जिसका कारण है पलायन। जब तक यहाँ से पलायन नहीं रुकता है हम तरक्की और विकास की बातें नहीं कर सकते।
- जेई करण रौ बिल कैं पास, एई मारण रौ पैसोंक गास – इन पंक्तियों के माध्यम से लेखक ने पहाड़ में हो रहे भ्रष्टाचार पर भी कटाक्ष करते हुए कहा है कि यहाँ JE सिर्फ बिल को पास करने में लगे हैं और AE धन को निपटाने में लगे हुए हैं।
- अटैचियों में भर पहाड़ यानी पहाड़ की संपदा को लूटकर अटैचियों में भरा जा रहा है। तेरा पहाड़ और मेरा पहाड़ सिर्फ और सिर्फ दुःखों का पहाड़ बन गया है।
हीरा सिंह राणा (जिन्हें प्यार से लोग ‘हिरदा’ भी कहते थे) को उत्तराखंड के लोक संगीत का पुरोधा माना जाता है। उनके गीतों में हमेशा पहाड़ का दर्द, पलायन की टीस और संघर्ष के बाद एक नई सुबह (उजाला) लाने का हौसला दिखाई देता है। भले ही आज वे आज हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी रचनायें हमें सदा प्रेरित करती रहेंगी।
युवा पीढ़ी इस प्रकार की रचनाओं को पढ़ें, जानें, विचार करें। भले ही हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए अपने पहाड़ से दूर चले आये हों लेकिन हमें ही इस पहाड़ को संभालना होगा। हमारे बुजुर्गों की इस थाती को आबाद रखने की जिम्मेदारी हम युवाओं की होनी चाहिए। हर छह महीने में नहीं तो 10 महीने, 1 साल में कुछ समय के लिए अपनी इस पितृ भूमि में अवश्य जाएँ। अपने बुजुर्गों द्वारा कड़ी मेहनत से बनाये इन घरों को संवारें, अपने खेत-खलिहानों को आबाद करें।
तो क्या सोचा आपने ? आ रहें हैं ना इस बार ? चलो अपने पहाड़। करें अपना घेर बाड़। म्यर पहाड़, म्यर पहाड़।













