हिलजात्रा: पिथौरागढ़ का अनूठा लोकपर्व, जहां मुखौटा नृत्य में जीवंत होती है पहाड़ की संस्कृति

पिथौरागढ़ की प्रसिद्ध हिलजात्रा क्या है? नीचे दिए गए पोस्ट में जानिए इसके इतिहास, कृषि परंपरा, हिरन, लखियाभूत, बैलों के मुखौटा नृत्य और लोकमान्यताओं के बारे में।

हिलजात्रा Hill Jatra Pithoragarh

HIGHLIGHTS

  • पिथौरागढ़ की हिलजात्रा कुमाऊं की अनूठी कृषि एवं लोकनाट्य परंपरा है।
  • बैलों के मुखौटे, हिरन और लखियाभूत हिलजात्रा के प्रमुख आकर्षण हैं।
  • हिलजात्रा में आस्था, कृषि, हास्य और लोककला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
  • लखियाभूत को भगवान शिव के बारहवें गण के रूप में पूजने की लोकमान्यता है।
  • हिलजात्रा पहाड़ के पारंपरिक कृषि जीवन और लोकसंस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करती है।

उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ अपनी संस्कृति, लोक त्यौहारों और विभिन्न उत्सवों के कारण जग विख्यात है। ऐसा ही एक उत्सव है ‘ हिलजात्रा ‘, प्रदेश के पिथौरागढ़ जिले में बड़े हर्षोल्लाष के साथ मनाया जाता है। लोकपर्व सातों-आठों पर्व  के आठ दिन बाद मनाया जाने वाला यह उत्सव कुमाऊँ में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है। इसका सम्बन्ध नाट्य नाटिका कला से है। यह पर्व कृषि से जुड़ा हुआ उत्सव माना जाता है। 

Hilljatra 2026 Pithoragarh : इस वर्ष पिथौरागढ़ में हिलजात्रा सोमवार, 24 अगस्त 2026 आयोजित होगी।

क्या है हिलजात्रा

हिलजात्रा दो शब्दों के संयोजन से बना है। पहला है ‘हिल’ और दूसरा ‘जात्रा ‘,  हिल का शाब्दिक अर्थ है दलदल यानि पानी से भरी दलदली भूमि और जात्रा का अर्थ  है यात्रा, तमाशा या खेल। अर्थात जिसका सीधा तात्पर्य पानी वाले दलदली भूमि में की जाने वाली खेती और खेल का मंचन है। (Hiljatra Pithoragarh)

यही कारण है कि हिलजात्रा को केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कुमाऊं के पारंपरिक कृषि जीवन और लोक रंगमंच का जीवंत दस्तावेज भी कहा जा सकता है।

पिथौरागढ़ में मनाया जाता है हिलजात्रा 

हिलजात्रा ऐसा त्यौहार है, जो सिर्फ पिथौरागढ़ में ही मनाया जाता है। यह शिव जी की बारात का एक रुप माना जा सकता है। इसमें लोग बैलों का मुखौटा लगाकर नृत्य करते हैं और यह लोग जोड़ियों में होते हैं और इनको हांकने के लिये एक हलिया भी होता है। कई जोडि़यां बनाई जाती हैं और सब मैदान में घूम-घूम कर नृत्य करते हैं। कुछ बैल अकेले भी होते हैं, मुख्य रुप से दो बैल अकेले होते हैं एक मरकव्वा बल्द, जो सबको मारता फिरता है और सबसे तेज दौड़ता है, दूसरा होता है गाल्या बल्द, जो कि कामचोर होता है और बार-बार सो जाता है और उसका हलिया परेशान होता है। यह दोनों बल्द संस्कृति का प्रदर्शन करते हुये ग्रामीण हास्य को भी परिलक्षित करते हैं।

हिलजात्रा के मुख्य आकर्षण 

हिल जात्रा में मुख्य आकर्षण होता है हिरन और लखिया भूत तथा महाकाली। हिरन के लिये एक आदमी को हिरन का मुखौटा पहना दिया जाता है और उसके पीछे तीन लोगों को बैठी मुद्रा में ढंक दिया जाता है, दूर से देखने में लगता है जैसे कोई हिरन चर रहा है। अंत मे हिरन के आंग देवता भी आता है और यह कथानक समाप्त होता है। इसे पहाड़ी ड्रेगन भी कहा जा सकता है, जिस तरह से चीन में मुखौटों के द्वारा ड्रेगन प्रदर्शित किया जाता है, उसी प्रकार से हमारे उत्तराखण्ड में हिरन को दिखाया जाता है।

आस्था विश्वास, इतिहास, संस्कृति और कला का समन्वय 

हिलजात्रा के समय आस्था और विश्वास के साथ-साथ अभिनय भी देखने को मिलता है। यही एक ऐसा उत्सव है जिसमें इतिहास, संस्कृति और कला का अद्भुत समन्वय मिलता है। इसमें एक ओर महाहिमालयी क्षेत्र के मुखौटा नृत्य का प्रदर्शन होता है तो दूसरी ओर इसमें देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित जात्रा परंपरा का भी समावेश है। यह कृषि से जुड़ा उत्सव है। पहले जब लोगों के पास मनोरंजन के अन्य साधन नहीं थे, तब ऐसे लोकोत्सवों में जन भागीदारी बहुत ज्यादा होती थी।

हिलजात्रा की मान्यतायें 

लखियाभूत को भगवान शिव के 12 वें गण रूप में माना जाता है। कहा जाता है कि हिलजात्रा के दौरान लखियाभूत जितना आक्रामक होता है, प्रसन्न होने पर उतना ही फलदायी भी होता है। हजारों की तादात में मौजूद महिलाएं और पुरुष लखिया के क्रोध को शांत करने के लिए फूल, अक्षत से अर्चना कर उन्हें मनाते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। 

लोक मान्यता है कि इस तरह की उपासना एवं आयोजन से लखियाभूत खुश हो जाते हैं। इससे गांव एवं इलाके में किसी प्रकार की विपदा नहीं आती। फसल बेहतर होती है। सूखा और ओलों का प्रकोप नहीं होता है।

पिथौरागढ़ की हिलजात्रा केवल एक क्षेत्र विशेष पर्व नहीं, बल्कि कुमाऊं की जीवंत लोकसंस्कृति का ऐसा मंच है, जहां खेत-खलिहान, देव आस्था, पशुधन, मुखौटे और लोककला एक साथ जीवंत हो उठते हैं।

यह थी पिथौरागढ़ में आयोजित होने वाले हिलजात्रा  (Hill Jatra) पर्व पर एक रोचक जानकारी। आपको यह पोस्ट कैसी लगी ? कमेंट में जरूर बताएं। आप नीचे विभिन्न शेयर बटनों के माध्यम से पोस्ट को अन्य लोगों तक भी पहुंचा सकते हैं।


संदर्भ : स्वर्गीय श्री पंकज सिंह महर 

  • विस्तृत में पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ – हिलजात्रा : आस्था, विश्वास के साथ इतिहास, संस्कृति और कला का अद्भुत प्रदर्शन। 
  • Vinod Singh Gariya

    विनोद सिंह गढ़िया इस वेब पोर्टल के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। करीब 15 वर्षों से विभिन्न वेब पोर्टलों के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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