बैसाखी-बिखौती और बिसुवा के नाम से मनाई जाती है उत्तराखंड में।

बैसाखी का त्यौहार उत्तराखंड में बिखौती और बिसुवा त्यार के नाम से जाना जाता है। इस दिन यहाँ जौ की बालियों या काले तिल से नहाने की विशिष्ट परम्परा है। वहीं इस दौरान स्याल्दे बिखौती का मेला भी लगता है। और क्या ख़ास होता है इस दिन यहाँ, विस्तृत में पढ़ें -

baisakhi festival in uttarakhand

HIGHLIGHTS

  • बिसुवा त्यार के रूप में मनाई जाती है बैसाखी।
  • लोग जौ की बालियों से शरीर का विष झाड़ने की परम्परा निभाते हैं।
  • कुछ क्षेत्रों में लोग ईष्ट देव लाटू की पूजा संपन्न कराते हैं।
  • इस अवसर पर स्याल्दे बिखौती का मेला लगता है।

Baisakhi Festival in Uttarakhand : बैसाखी भारत के सभी राज्यों में अलग-अलग नाम से मनाई जाती है। उत्तराखंड में बैसाखी “बिखौती” और “बिसुवा” के नाम से जानी जाती है। जो सौर वर्ष के नए साल की शुरुवात है। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में प्रत्येक संक्रांति के दिन एक त्यौहार और मेला आयोजित होता है। बैसाख के महीने की संक्रांति यानी प्रथम तिथि को ‘विषुवत संक्रांति’ (Vishuvat Sankranti) के नाम से जाना जाता है। इस दिन कुमाऊं में स्याल्दे-बिखौती का मेला लगता है।

शरीर से विष झाड़ने की अनोखी परंपरा

बिखौती को विष मुक्ति दिवस यानि ‘विषु त्यार’ के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व पर पहाड़ों में प्रातःकाल स्नान के पश्चात जौ की नवीन बालियों को शरीर पर छुवाते हुए ‘विष बग, विष बग’ कहकर शरीर के विष त्याग करने की परम्परा है और एक नई सकारात्मक ऊर्जा के साथ त्यौहार मनाया जाता है। विषु त्यौहार की शाम छोटे बच्चों को संक्रमण की आभाषी रोकथाम के लिए एक विशेष आकार वाली सीक, जिसे ‘ताला’ या ताउ कहा जाता है, को चूल्हे के लाल कोयले में गर्म करके उनके नाभि प्रदेश में दागे जाने की भी परम्परा है। लेकिन यह परम्परा अब कुछ ही अनुभवी लोगों द्वारा अपनाई जाती है।

संगम में नहाने की परम्परा

इसी के साथ बिखौती के दिन संगमों पर नहाने की भी परम्परा है। लोग विभिन्न नदियों और संगमों पर नहाने जाते हैं। इस दिन इन संगमों पर भी अच्छा खासा मेला लग जाता है। इस संक्रांति के दिन तिलों से नहाने की भी परम्परा है। तिल पवित्र होते हैं और हवन यज्ञ में प्रयोग होते हैं। कहते हैं कि साल भर में जो विष हमारे शरीर में जमा हुआ होता है, इस दिन तिलों से नहाने पर वह विष झड़ जाता है।

आर बांधने की परम्परा

बागेश्वर के कपकोट में विषु त्योहार पर लाटू देवता की पूजा सम्पन कराई जाती है। आंधी-तूफ़ान और ओलों से अपनी फसल के बचाव के लिए पारम्परिक रूप से अपने गांव के चारों दिशाओं में विधि-विधान के साथ कीलित किया जाता है, स्थानीय भाषा में इसे आर बांधना कहते हैं। कपकोट में इस दौरान स्याल्दे का मेला लगता है और सुप्रसिद्ध काशील देव मंदिर में पूजा का आयोजन होता है।

स्याल्दे बिखौती मेला

बैशाखी के दौरान अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट में सुप्रसिद्ध ‘स्याल्दे बिखौती’ का सुप्रसिद्ध मेला लगता है। जो अपनी विशिष्ट परम्पराओं के कारण पूरे प्रदेश में ख़ास स्थान रखता है। इस मेले को देखने के लिए दूर-दूर से लोग द्वाराहाट पहुँचते हैं।

आईये हम अपनी परम्पराओं का निर्वहन करते हुए अपने पर्वों को मनाएं। आप सभी को ‘विषुवत संक्रांति’ ‘विषु त्यार’ और स्याल्दे बिखौती की शुभकामनायें।

Vinod Singh Gariya

ई-कुमाऊँ डॉट कॉम के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। इस पोर्टल के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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