ईजा यानि माँ यानि पूरा संसार। दुनिया में ईजा ही एक ऐसा शब्द है जिसमें पूरा संसार बसा है। या यूँ कहें संसार की सभी खुशियां समाई हैं। लाड़, प्यार, आस्था, श्रद्धा, विश्वास, ममत्व, शक्ति, छाँव, नींद, अपनापन सभी कुछ तो है। ईजा हाड़ मांस का जीता जागता पुतला नहीं बल्कि वह व्यक्ति के जीवन की सम्पूर्ण पाठशाला है, जीवन आधार है, यानि ईजा ॐ शब्द की तरह सम्पूर्ण जगत में व्याप्त ‘ॐकार’ है।
पहाड़ की ईजा (Ija)
कुमाऊँ में ‘ईजा’ शब्द माँ के पद, महत्व और स्थान के काफी ऊँचा है। यहाँ ईजा (Eeja) से शुरू हुआ जिंदगी का सफर हर दुःख सुख में ईजा पर ही सिमट जाता है। ऐसा लगता है जैसे ईजा नहीं तो जीवन में सब कुछ अधूरा है। धन्य हैं वो जिसके पास ईजा है। ईजा है तो व्यक्ति के पास सब कुछ है। कुमाऊँ के परिपेक्ष्य में ईजा की बात करें तो जाड़ा, बरसात, गर्मी कोई भी समय हो, ईजा की दिनचर्या समान रहती है। आज के दौर में भले ही ईजा की दिनचर्या में मामूली बदलाव दिखता हो लेकिन कुछ साल पहले तक कुमाऊँ में ईजा की सुबह चार बजे से शुरु होकर रात के 11 बजे तक कोल्हू के बैल की तरह पिसती हर जगह दिखाई देती।
चूल्हा, चौका, बर्तन, पानी, खेत खलिहान, जंगल से लकड़ी बीनना, बच्चों के भोजन, कपडे, स्कूल की चिंता करना, घर के हर सदस्य की जरूरतों का ख्याल रखना, सामाजिक तानेबाने के बीच सामाजिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्यों को पूरा करना। घर परिवार के अलावा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक करोकारों को निभाना भी ईजा की ही जिम्मेदारी है। ईजा न हो तो कोई भी कड़ी पूरी नहीं हो पाती है। कुमाऊं की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही ईजा रही है। घर परिवार की खुशियों की चाबी ही ईजा मानी जाती है। इतना सब कुछ करने के बाबजूद ईजा अपनी तख़लीफ़ों, दुःख, दर्द सीने में ही दबाये रखती है। कितना भी कष्ट क्यों न हो न कभी उफ़ करती और न ही ऐसा कोई भाव बाहर आने देती जिससे कोई उसके दुःख, दर्द को समझ सके।
ईजा ठीक उसी तरह है जैसे ब्रह्माण्ड में ॐ शब्द गुंजायमान है। ॐ का ऊँकार सर्वत्र फैला है पर वह दृश्य नहीं होता। उसी तरह ईजा सर्वत्र है। ईजा के बगैर सब सूना है। ईजा है तो सर्वत्र रौनक है। ईजा है तो जीवन धन्य है। ईजा होने का मतलब है मेरे पास संसार की सब ख़ुशी है। इससे बढ़कर अपनी ईजा के लिए क्या कहूं। धन्य है माँ, सारे दुःख सहती है फिर भी मुस्कराती है। – प्रो० शेर सिंह बिष्ट, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, कुमाऊँ विश्वविद्यालय।
ईजा शब्द मात्र नहीं इसमें सम्पूर्णता का भाव समाहित है। मदर, मम्मी, अम्मा की तरह हमारे पर्वतीय अंचल में ईजा शब्द का प्रचलन है। जिस तरह ‘गीत’ प्रणव ओंकार है उसी तरह ईजा भी पूरा आकार है। जन्मदात्री तो माँ है इसके अलावा ठुल ईजा (बड़ी माँ/ताई), जेडज्या (ताई या ज्येष्ठ माँ) जैसे शब्द प्रचलन में हैं। ईजा उद्भोधन होते ही संस्कृति, परम्परा, संस्कार सभी भाव उभर कर सामने आ जाते हैं। – डॉ० पंकज उप्रेती, निदेशक, हिमालयन संगीत शोध समिति।

ईजा यानी माँ पर लिखी पंक्तियाँ
हर बखत गोर उज्याव मुख और हंसमुख रुंछि मेरि इज,
24 में 18 घंट काम-काम बस काम,
नै आंखों में नीन, नै भूख नै प्यास
राताक चौथों पहर इज चाख पिसछिं। दिनभरिक खाणक लिजि पिसुअक इंतजाम जो करण छु। चाखक घौराटैलि नींन टूटछि तो में इजकै लैंपाक उज्याव में तल्लीन हो चाख पिसण देखछिं। एक हूक मन में उठछि, लेकिन बेबस । रातैमें इज चाख पिसणाक दिगाड़ दाव-भात ले चुल में धरि दिछिं। उज्याव हुण तक चाख में ग्यूं लै पिस ल्हिंछि और खाण लै बण जांछि। हम नानतिनैकिर्ते खाण थाइनमें पोरसि बेर चुलहै भ्यैर धरि दिछिं, ताकि रत्तै स्कूल जाण हभेर पैलि हम खा सकूं। उज्याव होते ही गाँक स्याणिनाक दिगाड़ उकें लै जंगल जाण हूंष्छि, पिरुल ल्यौंणाकि लिजि। ज्यौड़-दाथुल थामि बेर तुस्यार में बिना चप्पलनै जंगल जाण, कटु पीड़ादायक उन्हेंल इजैकि आत्मा जाणन्हेलि, तुस्यारैलि खुटनमें ठुला-ठुल चिर पड़ि रौछि जननमैं ऊ पड़ण बखत मोमबत्ती और तेलक लेप लगा ल्हिंछि। य तबक पहाड़क वेसलीन हुंछी। फिरि लेक ईजाक मुखम स्ती भरि ले नै पीड़, न गुस्स, बस हर बखत गोर उज्याव मूख और हंसमुख रूंधी मेरि इज्ज…..
(भावार्थ : रात के चौथे पहर में ईजा चक्की पीसती थी। खाने के लिए आटे का इंतजाम जो करना है। चक्की की आवाज से नींद टूटी तो में इंजा को लैंप की रोशनी में चक्की पीसने में मशगूल देखता हूं। एक हुक सी मन में उठती थी। थी कि मगर बेबस था। रात में में। ही चक्की पीसने के साथ ही ईजा दाल चावल भी चूल्हे पर रखती थी, ताकि स्कूल जाने से पहले बच्चे भोजन कर सकें। उसके बाद सुबह नंगे पांव पाले में चलते हुए जंगल जाने से ईजा की हाड़तोड़ दिनचर्या शुरू हो जाती है। कितनी पीड़ा ईजा को होती होगी यह वहीं जानती थी, पर न चेहरे पर पीड़ा का भाव न गुस्सा। बस हर समय गोरा हंसता खिल खिलाता चेहरा, मानो उसे कोई कष्ट ही न हो। कमोबेश पहाड़ की हर ईजा की यही दिनचर्या रही थी…)
ईजा की महिमा
लो हो गई पहाड़ पर सुबह, लपेटने लगी है कमर में रस्सी,
सिर पर सिरौनी, कमर में दरांती।
चल पड़ी है जंगल की ओर चढ़ती-उतरती ऊंची नीची पहाड़ियों,
गाड़ गधेरे लांघती, भुड़ फानती मेरे पहाड़ की ईजा गांव की बहू बेटियों के साथ।
इजा, ब्वे, माँजी, आई, अम्मा, मम्मा, माँ यो जतुक लै आँखर छन,. हरेकीक मल्लब एक्कै छ।
ममता अर प्रेमैकि साक्षात मूर्ति। पैली बै उ आपण च्यालन के स्कूल लगैछि अर च्येलिन के जंङ.व।
बुति-घाणि नि करण पर उनून के टुकाई लै दिछि,
पै अब उ च्येलिन कैं लै स्कूल लगूंण फैग्यै।
आज उ बोट दिण हूँ ले जनै अर पधान बणेनैक तैयारी में लै लीग रै,
पे ममतालु-दयालु अर किरसाण आइ लै छ, पैल्येिकि चारि।
–डॉ. प्रभा पंत, प्रो. एवं विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग एमबीपीजी कालेज
ईजा धन परांण त्यर जिबड़ि बटि म्यार नौं हरांण त्यर।
मम्मी बणिं तू मौम है गेछे जणी घर घाट बटि भैठि गेछै।
इजा इजा कै बेर तु बुलूंछी पोथी पोथी के बेर तु बोत्यू छी
तु द्यो द्याप्त नर नरेंण है आपण जिर्बाड़ में कटक मारि बेर
खै दे इजा खै दे के तु खवूछी अमर परांण इजा !
ज्यून करणी ज्यान दिणी पराण त्यागणी त्वे जस क्वे न्हें इजा ! क्वे न्हें।
–दामोदर जोशी देवांशु, कुमाऊंनी साहित्यकार।
आली-आली इजुलि आली हिसालु, किलमोण, काफो टिपि ल्याली भुर-भुर उज्याव हुणै रौछी धार माथि ब्यांण तार उणे रैछि
ज्यौड़ बादि कमरा, कल्यो रोट खाई पन्यार पाणि धार दातुल पंयाई आइलै नि आई रत्ति बटि जाई लुटियै इजा चुरिया बौज्यू सब घर लौटा
तु कब आली हिसालु, किलमोण काफो टिपि ल्याली।
–जगदीश जोशी, कुमाऊंनी साहित्यकार
आज घायल छु इजा क मन
पहाड़ की समृद्ध परम्परा में देखें तो ईजा (ija) का स्थान सबसे ऊँचा रहा है। बदलते परिवेश में रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा के अभाव में पहाड़ खाली होते गए। पहाड़ के अधिकांश गांव खाली तो हो गए हैं लेकिन उन गांवों को आज भी कोई अगर नहीं छोड़ पाया है तो ईजा ही है। बूढ़े हो चले माँ बाप अपना पैतृक घर नहीं छोड़ना चाहते। ऐसे में ईजा आज गांव में बच्चों के होते हुए भी बेसहारा जीवन जी रही है। बच्चों के पास माँ-बाप, ईजा के पास जाने की फुर्सत नहीं है और ईजा अपने बेस बसाये उस घर बार को छोड़ना नहीं चाहती है। बेवस है लाचार है, उपेक्षित है, सच कहूं तो आज ईजा का मन घायल है।
लेख -श्री कैलाश पाठक जी (अमर उजाला)













