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ॐ की तरह सर्वत्र व्याप्त है ईजा।  |  फोटो : श्री अमित साह (नैनीताल)

ईजा यानि माँ यानि पूरा संसार।  दुनिया में ईजा ही एक ऐसा शब्द है जिसमें  पूरा संसार बसा है। या यूँ कहें संसार की सभी खुशियां समाई हैं।  लाड़, प्यार, आस्था, श्रद्धा, विश्वास, ममत्व, शक्ति, छाँव, नींद, अपनापन सभी कुछ तो है। ईजा हाड़ मांस का जीता जागता पुतला नहीं बल्कि वह व्यक्ति के जीवन की सम्पूर्ण पाठशाला है, जीवन आधार है, यानि ईजा ॐ शब्द की तरह सम्पूर्ण जगत में व्याप्त 'ॐकार' है।  कुमाऊँ में ईजा शब्द माँ के पद, महत्व  और स्थान के काफी ऊँचा है।

यहाँ ईजा से शुरू हुआ जिंदगी का सफर हर दुःख सुख में ईजा पर ही सिमट जाता है। ऐसा लगता है जैसे ईजा नहीं तो जीवन में सब कुछ अधूरा है। धन्य हैं वो जिसके पास ईजा है।  ईजा है तो व्यक्ति के पास सब कुछ है। कुमाऊँ के परिपेक्ष्य में ीजा की बात करें तो जाड़ा, बरसात, गर्मी कोई भी समय हो, ईजा की दिनचर्या समान रहती है। आज के दौर में भले ही ईजा की दिनचर्या में मामूली बदलाव दिखता हो लेकिन कुछ साल पहले तक कुमाऊँ में ईजा की सुबह चार बजे से शुरुर होकर रात के 11 बजे तक कोल्हू के बैल की तरह पिसती हर जगह दिखाई देती।

चूल्हा, चौका, बर्तन, पानी, खेत खलिहान, जंगल से लकड़ी बीनना, बच्चों के भोजन, कपडे, स्कूल की चिंता करना, घर के हर सदय की जरूरतों का ख्याल रखना , सामाजिक तानेबाने के बीच सामाजिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्यों को पूरा करना। घर परिवार के अलावा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक करोकारों को निभाना भी ईजा की ही जिम्मेदारी है।  ईजा न हो तो कोई भी कड़ी प्यूरी नहीं हो पाती है. कुमाऊं की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही ईजा रही है।  घर परिवार की खुशियों की चाबी ही ईजा मानी जाती है।  इतना सब कुछ करने के बाबजूद ईजा अपनी तख़लीफ़ों, दुःख, दर्द  सीने में ही दबाये रखती है। कितना भी कष्ट क्यों न हो कभी उफ़ करती और न ही ऐसा कोई भाव बहार आने देती जिससे जोई उसके दुःख, दर्द को समझ सके।

ईजा ठीक उसी तरह है जैसे ब्रह्माण्ड में ॐ शब्द गुंजायमान है। ॐ का ऊँकार सर्वत्र फैला है पर वह दृश्य नहीं होता। उसी तरह ईजा सर्वत्र है। ईजा के बगैर सब सूना है। ईजा है तो सर्वत्र रौनक है। ईजा है तो जीवन धन्य है। ईजा होने का मतलब है मेरे पास संसार की सब ख़ुशी है। इससे बढ़कर अपनी ईजा के लिए क्या कहूं। धन्य है माँ, सारे दुःख सहती है फिर भी मुस्कराती है। - प्रो० शेर सिंह बिष्ट, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, कुमाऊँ विश्वविद्यालय। 

ईजा शब्द मात्र नहीं इसमें सम्पूर्णता का भाव समाहित है। मदर, मम्मी, अम्मा की तरह हमारे पर्वतीय अंचल में ईजा शब्द का प्रचलन है। जिस तरह 'गीत' प्रणव ओंकार है उसी तरह ईजा भी पूरा आकार है। जन्मदात्री तो माँ है इसके अलावा ठुल ईजा (बड़ी माँ/ताई), जेडज्या (ताई या ज्येष्ठ माँ) जैसे शब्द प्रचलन में हैं। ईजा उद्भोधन होते ही संस्कृति, परम्परा, संस्कार सभी भाव उभर कर सामने आ जाते हैं। - डॉ० पंकज उप्रेती, निदेशक, हिमालयन संगीत शोध समिति।

आज घायल छु इजाक मन -
पहाड़ की समृद्ध परम्परा में देखें तो ईजा का स्थान सबसे ऊँचा रहा है। बदलते परिवेश में रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा के अभाव में पहाड़ खाली होते गए। पहाड़ के अधिकांश गांव खाली तो हो गए हैं लेकिन उन गांवों को आज भी कोई अगर नहीं छोड़ पाया है तो ईजा ही है। बूढ़े हो चले माँ बाप अपना पैतृक घर नहीं छोड़ना चाहते। ऐसे में ईजा आज गांव में बच्चों के होते हुए भी बेसहारा जीवन जी रही है। बच्चों के पास माँ-बाप, ईजा के पास जाने की फुर्सत नहीं है और ईजा अपने बेस बसाये उस घर बार को छोड़ना नहीं चाहती है। बेवस है लाचार है, उपेक्षित है, सच कहूं तो आज ईजा का मन घायल है। 
 

ई-कुमाऊँ डॉट कॉम द्वारा टंकित श्री कैलाश पाठक जी का लेख।
नोट : यह आलेख हिंदी दैनिक समाचारपत्र अमर उजाला में छप चुका है। 

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