केदारपाती (नैर): हिमालय की सुगंधित धूप और औषधीय गुणों का अनमोल खजाना

केदारपाती (नैर) उत्तराखण्ड का दुर्लभ हिमालयी औषधीय पौधा है, जिसकी सुगंधित धूप से घर में सकारात्मक ऊर्जा और शुद्ध वातावरण बनता है। जानें इसके चमत्कारी फायदे, उपयोग और संरक्षण की जरूरी बातें इस पोस्ट में -

kedarpati

केदारपाती, जिसे नैर अथवा नैरपाती भी कहा जाता है, उत्तराखण्ड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक झाड़ीनुमा औषधीय पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम Skimmia laureola है। अपनी सुगंधित पत्तियों के कारण यह पौधा पहाड़वासियों की आस्था से जुड़ा हुआ है। यहाँ के लोग इसकी पत्तियों का उपयोग अपने ईष्ट देवों की पूजा में ‘धूप’ प्रज्जवलित करने में करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस धूप की सुगंध से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

केदारपाती (नैर) मुख्यतः ठंडे घने जंगलों में एक छोटी झाड़ी के रूप में उगता है और इसकी ऊंचाई लगभग 2 से 4 फुट तक होती है। नैर की पत्तियां 5 से 7 इंच लंबी, गहरे हरे रंग की और बेहद सुगंधित होती हैं। वहीं इसके छोटे-छोटे हल्के सफेद फूल और बीज आकर्षक लाल रंग के होते हैं, जो पक्षियों के लिए भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। इसकी पत्तियां मृगों का पसंदीदा भोजन है।

नैर की पत्तियों का मुख्य उपयोग धूप के रूप में किया जाता है। जिसे जलाने पर घर अथवा मंदिर में प्राकृतिक और मनमोहक सुगंध फैलती है। मान्यता है कि नैर की धूप न केवल वातावरण को शुद्ध करती है, बल्कि कीटाणुओं को कम करने में भी सहायक होती है। इसकी सुगंध बाजार में मिलने वाले अन्य कृत्रिम धूप अथवा अगरबत्तियों की तुलना में अधिक सौम्य और लंबे समय तक टिकने वाली मानी जाती है।

ऐसे बनाया जाता है नैर से धूप

नैर के पत्तों को जंगल से लाकर घर के अन्दर ही सुखाया जाता है। किसी भी प्रकार की अपवित्रिता से बचाने के लिए इसे घर में मंदिर के आसपास लटका दिया जाता है। जब ये पत्तियां सूख जाती हैं तब इन पत्तियों का चूरा बनाकर थोड़ा सा गाय या भैंस का घी मिलाया जाता है और यह धूप जलाने के लिए तैयार हो जाता है। इसे जटामांसी की सूखी जड़ों के साथ भी धूप के रूप में उपयोग किया जाता है। इस धूप को धूपेंण में रखे जलते कोयले पर डाला जाता है और यह सुगन्धित धुआँ देता हुआ जलता है। इसे बनाकर एक बार ही उपयोग किया जाता है। दूसरे दिन उपयोग के लिए पुनः इसे तैयार करना होता है। नैर के पत्तों का धूप जलाने से वातावरण शुद्ध रहता है और घर जीवाणु रोधी रहता है।

उपचार में भी काम आता है नैर

नैर की पत्तियों का उपयोग पेट दर्द, पेचिश, उल्टी जैसे विभिन्न पेट की समस्याओं के लिए भी किया जाता है। नैर की पत्तियों के तेल का उपयोग जीवाणुरोधी गतिविधियों में भी किया जाने लगा है। इसकी पत्तियां चेचक के इलाज में भी कारगर हैं।

अब विलुप्ति के कगार पर है नैर

बहु-उपयोगी नैर आज अत्यधिक दोहन के कारण विलुप्त होने की कगार पर है। क्षेत्रवासियों को सर्वप्रथम नैर के संरक्षण में आगे आना होगा। उन्हें चाहिए कि आवश्यकता से भी कम मात्रा में इसे जंगल से लाये। एक झाड़ी से सिर्फ एक या दो शाखाएं ही तोड़ी जाये। कभी भी इस पौधे को जड़ से न उखाड़ें।

यह पौधा जंगलों में मृगों का भी पसंदीदा आहार है। इसकी सुगंध दूर-दूर से मृगों को अपनी ओर लेकर आती है। हमें और सरकार को भी ‘नैर’ के संरक्षण में आवश्यक कदम उठाने होंगे। सरकार और हिमालयी जड़ी-बूटियों पर कार्य करने वाली सभी संस्थाओं को इसके संरक्षण हेतु जरुरी उपाय करने की नितांत आवश्यकता है। इसकी पौध तैयार कर पुनः अनुकूल मौसम में इनका रोपण किया जाना चाहिए। ताकि हम भविष्य में नैर की सुगंध से अपने देवों को प्रसन्न और वातारवरण में आध्यात्मिक शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो।

Vinod Singh Gariya

ई-कुमाऊँ डॉट कॉम के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। इस पोर्टल के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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