स्याल्दे बिखौती मेला द्वाराहाट: इतिहास, परंपरा और महत्व

द्वाराहाट का प्रसिद्ध स्याल्दे-बिखौती मेला। जानें-इसका इतिहास, परंपराएं, ओढ़ा भेंटने की अनोखी रस्म, बाट पुजै और कुमाऊं की समृद्ध लोकसंस्कृति से जुड़ा महत्व इस पोस्ट में।

स्याल्दे बिखौती मेला

HIGHLIGHTS

  • सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखता स्याल्दे-बिखौती मेला
  • ओढ़ा भेंटना : एक अनोखी रस्म।
  • लोकगीत, झोड़ा और भगनौल से गूंजता द्वाराहाट।
  • स्याल्दे मेला: जहां हर रस्म के पीछे छिपी है एक कहानी।
  • ढोल-नगाड़ों की थाप पर जीवंत होती सदियों पुरानी विरासत।
  • तीन धड़ों की परंपरा बनाती है मेले को खास।
  • बदलते समय में भी बरकरार है पुरानी परंपरा।

स्याल्दे बिखौती मेला उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद स्थित द्वाराहाट नगर में आयोजित होने वाला एक ऐतिहासिक, पारंपरिक और सांस्कृतिक मेला है। जो विमांडेश्वर महादेव मंदिर और द्वाराहाट बाजार में आयोजित होता है । यह मेला कुमाऊं की समृद्ध संस्कृति, लोक गीतों, झोड़ा-चांचरी, भगनौल, बुजुर्गों का ढाल-तलवार द्वारा सरंकार युद्ध कौशल प्रदर्शन और ‘ओड़ा भेंटने’, ‘बाट पुजै’, जैसी अनूठी रस्मों के लिए प्रसिद्ध है।

Syalde Bikhoti Mela Uttarakhand

बिखौती मेला

द्वाराहाट पुरातात्विक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्व स्थल है। यहाँ से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित विमांडेश्वर, जिसे ब्रह्मांडेश्वर भी कहा जाता है, बिखौती मेले का आयोजन स्थल है। यहाँ हर वर्ष चैत्र महीने के अंतिम दिन विमांडेश्वर महादेव मंदिर में रात्रि के समय यह मेला आयोजित होता है, जिसमें भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। जहाँ रणां, वलना, गवाड़, कोटीला, कुई, गुपटली, छतगुल्ला, असगोली (सुनखवा), सिमलगांव, बेढुली, बूंगा और सलना के ग्रामीण 12 जोड़ी नगाड़े-निशाणों के साथ पहुँचते हैं। इस दौरान लोगों की अपार भीड़ उमड़ती है, जिसे ‘बिखौती मेला‘ कहा जाता है। सुबह अदृश्य सरस्वती, सुरभि, नंदिनी की त्रिवेणी में स्नान कर पूजा-अर्चना के बाद लोग अपने-अपने गांवों को जाते हैं।

स्याल्दे मेला

बैसाख महीने के पहले दिन यानी विषुवत संक्रांति पर मुख्य मेला द्वाराहाट के शीतला पुष्कर मैदान में मेला लगता है, जिसे ‘स्याल्दे मेला’ कहा जाता है। पहले दिन यानि 01 गते को लगने वाला मेला “छोटी स्याल्दे” कहलाता है, जबकि बैसाख 2 व 3 गते को लगने वाला मेला “बड़ी स्याल्दे” कहलाता है। आंग्ल कैलेंडर के हिसाब से यह मेला हर वर्ष 14 से 16 अप्रैल के बीच लगता है।

इस प्रकार इन दोनों मेलों को मिलाकर ‘स्याल्दे बिखौती मेला’ कहा जाता है। वहीं प्रदेश भर में भी बिखौती का त्यौहार बिसुवा के नाम से मनाया जाता है। लोग इस दिन विभिन्न नदियों के संगम पर स्नान करते हैं। पहाड़ वासियों के लिए यह दिन विष मुक्त करने का भी दिन है। इस दिन लोग जौ की बाली या काले तिल से स्नान कर शरीर से विष त्याग करने की परम्परा है।

स्याल्दे बिखौती मेले के इतिहास

स्याल्दे-बिखौती मेले के इतिहास बात करें तो इस मेले की शुरुआत कत्यूरी राजाओं के शासनकाल से मानी जाती है। इतिहासकार पं. बद्रीदत्त पाण्डे ने अपनी पुस्तक ‘कुमाऊं का इतिहास’ में उल्लेख किया है किशीतला देवी मंदिर का निर्माण कत्यूरी शासक गुर्जरदेव के काल, संवत् 1179 के आसपास हुआ था। इन ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर यह माना जा सकता है कि उसी समय से द्वाराहाट में शीतला देवी मंदिर परिसर में स्याल्दे मेले की परंपरा की नींव पड़ी होगी। कत्यूरी शासकों के बाद चंद राजाओं ने भी इस ऐतिहासिक मेले को संरक्षित करने का काम किया।

ओढ़ा भेंटने की परंपरा

कहा जाता है कि एक बार मां शीतला देवी की पूजा के दौरान दो धड़ों के बीच एक खूनी संघर्ष हो गया। हारने वाले धड़े के प्रमुख का सिर जीतने वाले धड़े ने खड्ग से अलग कर दिया और उसे जमीन में गाड़ दिया। जिस स्थान पर वह सिर गाड़ा गया, वहां एक पत्थर (ओढ़ा) विभाजक सीमा के रूप में रखा गया।

तभी से स्याल्दे-बिखौती मेले के दिन लोग इस ओढ़ा (विभाजक पत्थर) के पास एकत्रित होते हैं और डंडों से इस पत्थर पर प्रहार करते हैं। इस परंपरा को “ओढ़ा भेंटना” कहा जाता है। बाद में आपसी सद्भाव और सुविधा के लिए गांवों को तीन धड़ों आल, गरख और नौज्यूला में विभाजित कर दिया गया।

दोपहर के समय ये तीनों धड़े अलग-अलग वेशभूषा में ढोल-नगाड़े, रणसिंघा और निशाणों (लाल और सफ़ेद ध्वज) के साथ ओड़ा स्थल पर पहुंचते हैं। आल धड़ा जिसमें तल्ली मिरई, मल्ली मिरई, विजयपुर, पिनोली, तल्ली मल्लू किराली गांव के लोग शामिल होते हैं, पुराने द्वाराहाट बाजार की मुख्य सड़क से आता है, जबकि गरख और नौज्यूला धड़े अलग-अलग मार्गों से आते हैं। इन समूहों का नेतृत्व आमतौर पर थोकदार करता है।

चूंकि स्याल्दे मेला मां शीतला से जुड़ा हुआ है, इसलिए लोग द्वाराहाट में स्थित शीतला पुष्कर झील के दर्शन करने भी आते हैं, जो अब सूख चुकी है और नगर के मध्य में स्थित है। पहले यह झील बहुत सुंदर थी । कहते हैं यह कमल के फूलों से ढकी रहती थी।

स्याल्दे मेले के पहले दिन नौज्यूला धड़े द्वारा “बाट पुजै” (रास्ते की पूजा) परंपरा निभाई जाती है। मां शीतला की पूजा-अर्चना के बाद मेले की शुरुआत होती है और “बग्वाल” (एक पारंपरिक युद्ध खेल) आयोजित किया जाता है।

महत्व

यह मेला बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस मेले पर एक किस्सा –चाहे बल्द बिचै जाओ स्याल्दे कौतिक जरूर जांण छू यानि चाहे गोठ का बैल क्यों ना बेचना पड़े, स्याल्दे का मेला अवश्य जाना है, लोगों में इस मेले की महत्ता को दर्शाता है। द्वाराहाट से बाहर रहने वाले लोग भी इस मेले को देखने पहुँचते हैं। इस अवसर पर झोड़ा, चांचरी और भगनौल जैसे लोकगीत गाए जाते हैं और लोक कलाकार दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं। ग्रामीण लोक देवताओं के सम्मान में पारम्परिक गीत गाते हैं। स्थानीय लोग इसे “दरै का मेला” भी कहते हैं।

स्याल्दे बिखोती मेले पर यहाँ कई लोग गीत रचे गए हैं। प्रसिद्ध कुमाऊंनी गीत ‘अलघते बिखौति मेरि दुर्गा हरै गे, दुर्गा चानै-चानै म्यर कमरै पटै ग्ये‘, ‘ओ भीना कसिके जानूं द्वारहाटा‘ जैसे गीत इस मेले की लोकप्रियता को दर्शाते हैं।

वहीं पकवानों की बात करें तो इस मेले की एक विशेष पहचान जलेबी है, जो यहां बड़े पैमाने पर बिकती है। व्यापारिक दृष्टि से भी यह मेला बहुत महत्वपूर्ण है। कहते हैं ब्रिटिश शासन काल तक यहाँ तिब्बत से भी व्यापारी पहुँचते थे। स्याल्दे-बिखौती मेला आज भी अपनी पारंपरिक रंगत और उल्लास को काफी हद तक बनाए रखने में सफल रहा है।

निष्कर्ष

स्याल्दे-बिखौती मेला मात्र एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊँ की जीवंत संस्कृति, आस्था और सामूहिक परंपराओं का प्रतीक है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और ऊर्जा के साथ निभाई जा रही है, जो इसकी सांस्कृतिक गहराई को दर्शाती है।

यह मेला हमें न सिर्फ इतिहास से जोड़ता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि बदलते समय में अपनी जड़ों से जुड़े रहना कितना आवश्यक है। झोड़ा, चांचरी, भगनौल की मधुर गूंज, ढोल-नगाड़ों की थाप पर जोश के साथ लहराते निशाँण और अपार जन समुदाय इसे एक भव्य और खास मेले का दर्जा देते हैं।

कुल मिलाकर, द्वाराहाट का स्याल्दे-बिखौती मेला हमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का वह अनमोल भाग है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी पहचान और संस्कृति से रूबरू करते रहेगा।

Syaldey Bikhoti Mela 2026 : इस वर्ष स्याल्दे-बिखौती का मेला 14 अप्रैल 2026 (1 गते बैसाख) से लगेगा। इस दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ ओढ़ा भेंटने, बाट पुजै की रस्म निभाई जाएगी। यह मेला बैसाख 1 गते से लेकर 3 गते यानी 16 अप्रैल तक चलेगा।

Vinod Singh Gariya

ई-कुमाऊँ डॉट कॉम के फाउंडर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हैं। इस पोर्टल के माध्यम से वे आपको उत्तराखंड के देव-देवालयों, संस्कृति-सभ्यता, कला, संगीत, विभिन्न पर्यटक स्थल, ज्वलन्त मुद्दों, प्रमुख समाचार आदि से रूबरू कराते हैं।

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