Deewali of Uttarakhand-बूढ़ि दीवाली, हरिबोधिनी एकादशी और इगास .

Budi Diwali, Igas Wishes
दीपावली के 11 दिन बाद उत्तराखण्ड में एकादशी पर्व पर इस ख़ास पर्व मनाया जाता है जिसे मानस खण्ड में बूढ़ि दीवाली और केदार खण्ड में इगास नाम से जाना जाता है। किवदन्ती है कि राम जी के आगमन की सूचना यहां 11 दिन बाद मिली थी। दूसरा यह भी कहा जाता है कि वीर भड़ माधो सिंह दीवाली के दौरान तिब्बत युद्ध क्ष्रेत्र में थे और आज के ही दिन जीतकर लौटे, इसलिए दोबारा दीवाली मनाई गई। आज का दिन वैसे यहां हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, सुबह पशुधन पूजा जाता है शाम को पकवान बनाये जाते हैं, फिर पूरा गांव सामूहिक रूप से भैलो खेलता है।

दलिदर की प्रतिकृति भुइयां
वहीं मानस खण्ड में इसे बूढ़ि दीवाली के नाम से जाना जाता है। आज एक सूप में पीछे की ओर दलिदर की प्रतिकृति भुइयां चित्रित किया जाता है और आगे की ओर विष्णु और लछमी को चित्रित किया जाता है।
विष्णु और लछमी
घर की महिला सुबह भुइयां को रिखू से पीटते हुए घर से बाहर " भाज भुइयां भाज" कहती हुई आती है और आंगन में ओखल के पास दिया जलाकर अखरोट और दाड़िम फोड़ती हैं, उसके बाद सूप से खील बिखेरते हुए घर के अंदर जाती हैं। इस दौरान "आओ भैठो लछमी नरैण, भाज भुइयां घर से बाहर" कहा जाता है और आज ही दिन में तुलसी विवाह भी सम्पन्न होता है तथा शाम को दीप जलाये जाते हैं। इस प्रकार कोजागर पूर्णिमा से शुरू हुये दीपावली पर्व की आधिकारिक समाप्ति होती है।

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