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जब-जब बाबूजी की यादें आती हैं उनकी जीवनशैली बहुत कुछ जीवन में अमल करने को प्रेरित करती हैं।  हर रोज जीवन चर्या में बाबूजी याद आते ही हैं।  वे ससरिस साथ न सही पर उनका जीवन जीने का ढंग हमें जीवन के अंतिम पड़ाव तक जीवन की सीख देना, कहा भूल कर भी भुलाया जा सकता है।  

बाबूजी का जीवन जीने का सलीका बहुत आत्मसमान से भरा होता था। जीवन में बहुत जरूरतें भी रही होंगी पर अनायास ही किसी को उन्होंने किसी भी काम के लिए तंग नहीं किया।  मुझे याद रहता है वे आने काम आने वाली रोज के सामान को किसी से साझा नहीं करते थे न ही किसी के सामान को छूते थे।  हमारे गाँव मातोली खीरमांडे  गंगोलीहाट में आज भी उनकी  जीवनशैली, स्पष्ट बोलने और दुःख-दर्द में साथ देने की आदतों को लोग याद करते हैं।  वे अक्सर लोग के आँखों में भी आ जाया करते थे क्योंकि वे सही को सही और गलत को गलत बोलने में कभी हिचकते नहीं थे, यही उनकी आदतों ने उनको समाज में एक मान सम्मान भी दिलाया था। 

मैं स्कूली शिक्षा के लिए बचपन से शहरों में रहा।  बस ग्रीष्म कालीन छुट्टियों में पहाड़ जाने का मौका मिलता था।  सच में वो १-२  महीने  पूरे साल की थकान को मिटने को संजीवनी का काम करता थे । मेरे लिए ही नहीं शायद तब सभी बाहर पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह एक उत्सव ही था। जब सभी दोस्त लोग गाँव के दोस्तों संग समय बिताते थे।  एक साथ गाँव की टंकी पर जाकर खूब नहाना, घर के पास तरह तरह के खेल खेलना , याद आती है उस पानी के टंकी और गूल बनाने की जब सारे दोस्त दिन भर मिट्टी से एक पानी की टंकी बना रहे होते पानी गूल से टंकी तक जाता टंकी की छत के लिए भेकूल के डंडे सरिया का काम करते थे

सारे दोस्त गावं की कच्ची मिट्टी गारे से लतपत होकर पानी की टंकी के प्रोजेक्ट में खो जाते थे , पानी के टंकी बन जाने के बाद पानी निकासी को भांग के सूखी पेड़ की डंडी सबसे बढ़िया नल का काम किया करता था।  पर हमसे से कोइ ऐसा भी होता था जिसे ये सब पसंद शायद नहीं आता था दो देर शाम को दबे पाँव आकर टंकी प्रोजेक्ट को तहस नहस करके चला जाता था। लगता था उसे प्लान को अमल मे न लाया जाता होगा।  आज भी उस दोस्त की  तलाश रहती है आखिर कौन था वो ?

माचिश के डिब्बे की बने तास खेलने में भी बेतहाशा  डरते हैं क्योंकि उसका नाम ताश जो रख दिया था।  और तब पहाड़ मैं ताश शब्द बड़ा बदनाम था। शहर से ले गए चम्पक, नंदन,चंदामामा, बालहंस , चाचा चौधरी और साबु  के कॉमिक्स को न जाने कितनी बार पढ़ते थे और सारे दोस्त दोपहरी में इकट्ठा होकर एक ही किताब को न जाने कितनी बार पढ़ा करते थे। 

बाबूजी से मैंने कभी झूठ का साथ न देने और मेहनत और ईमानदारी से जीवन जीने का सबक सीखा।  बचपन से ईजा बाबू से बहुत ही ज़्यादा घनिष्ठता बचपन से बाहर रहने के कारण शायद रही थी, मेरे जीवन की हर बात को मैं ईजा बाबू के साथ साझा करता था और मेरे लिए बहुत बड़ी बात यह थी की मेरे पर मेरे ईजा बाबू पूरा विश्वास करते थे कि  मैं जो कर रहा हु वो सही होगा और मैं वो कोइ काम नहीं करुगा जो गलत होगा।

गावं में मई से जून-जुलाई तक रहने का मौका मिलता था।  उस दरम्यान ईजा के साथ घास को जाना, खेतो में जाना,बाबूजी के साथ खेत खलिहानो में  जाना, जगह जगह खेतो की भीड़ ज्यादातर गिर जाती थी वो उन पटको की भीड़ लगाने का काम बहुत होता था।  इस साल हो गया कुछ दिन में बुवाई हो जाएगी को हल कैसे जोतेगा हालिया करके बाबूजी हल बैल खेत में  आने से बहुत पहले खेतो को साफ़ कर देते थे।  उनके जीवन बड़ा सलीके से था।  कल खेत में बुवाई होगी तो उसके लिए बीज़ , हल, जुवा , दन्यालू , बहुन (बसूला) यहाँ तक की अगर खेत बोते बोते हल का नसूय्ड खुल जावे तो लकड़ी के छोटे छोटे टुकड़े , एक नसूय्ड अलग से वे २ दिन पहले त्यार कर लेते थे। 

बाबूजी ने बड़बाज्यू (दादाजी) के साथ नैनीताल  में  रहकर अपनी शिक्षा पूरी की थी वही से सर्विस शुरू  हो गई और अनुशासन की पाठशाला भी।  जब कभी में गावं मैं बिजली न होने के कारन रात को या सांझ को बहार जाने में हिचकिचाता था तब वे बोलते थे में ४-५ क्लास में अकेले नैनीताल जैसी जगह पर पूरी रात अकेले रहता था तब बड़बाज्यू गावं गए होते थे और उन दिनों कहा करते थे की नैनीताल की ताल में और जब जब हियु पड़ा हो उन रातो में अंग्रेजो के प्रेत घूमते दिख जाते हैं , वे बोलते थे मैं तब भी नहीं डरता था न मैंने ऐसा कुछ कभी देखा तू गावं के अंदर डरता है।  उनकी बातो से डर दूर हो जाता था।  हमें आज भी याद हैं बाबूजी ने जिस सामान वस्तु की जगह नियत कर दी वो वही मिलेगा चाहे रात के अंधेर में ढूढ़ लो।  वे दैनिक उपयोग की हर चीज को अपने पास बहुत सुरक्षित रखते थे।  उनकी निजी उपयोग की वस्तुओ को हम न छूते थे न हिम्मत होती थी। 

उनका सर्विस के दौरान का बुश का २ बैंड का रेडियो, उनकी पायलट की हाथ घड़ी, उनका जीप का टॉर्च, उनका बरसो पुराना हैंड बैग , उनका चश्मा आज भी मेरे पास उनके होने का अहसास दिलाता हैं।  उनके सलीके से रखा पत्थर , जिससे घर के सभी लोग दराती में धार लगते थे आज भी हमारे आँगन में सुरक्षित रखा हैं।  छियोल (साल की लिसे लगी लकड़ी) को फाड़ने वाला बसूली, भी बाबूजी ने २ रखते थे एक खुद के लिए १ अगर कोइ गावं वाला आएगा तो उसे देने के लिए , पर वो अपने उपयोग की वस्तु किसी को नहीं देते थे।  पेड़ काटने वाले मछानि , आरी तक, कुल्हाड़ी सम्बल, दराती , कुदाल, फावड़ा, गेती, बेलचा सब कुछ २ रखते थे एक खुद के उपयोग के लिए एक किसी के मांगा तो उससे देने के लिए।  जो सामान लेकर जायेगा उससे कह भी देते थे लेकर जा रहे हो काम करके हिफाजत से दे जाना। 

सुबह ४-५ बजे उठकर नित्यकर्म  से निवृत होकर रोज रामायण का पाठ उनके दिन की शुरुआत होती थी। उस दिन के कामकाज करने हैं उसकी रूपरेखा पहले दिन तय हो जाया करती थी।  गावं इलाके के सुख दुःख काम काजो में सबसे पहले हाजिरी देना उनका नियम था।  होली , शादी  विवाह  और नाच गायन में हो रही शराब बाजी के कारण वे इन आयोजनों से दूरी बना कर रखते थे।  अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर आपने लायक काम निपटाकर वे घर आकर ही भोजन करते थे।  निमँत्रण में परिवार के लोग ही भाग लेते थे। 

ख़ैर हमारे बाबूजी का जीवन हमारे लिए सदा प्रेरणा दायक रहा आगे भी उनके मार्गदर्शनों में हम चलेंगे।  उनकी जीवनशैली हमारे लिए एक बहुत बड़ा ग्रन्थ हैं जिसे मैं अपनी आने वाली पीढ़ी को भी जरूर हस्तान्तरित करूँगा।

 

मदन मोहन जोशी "शैल शिखर"
ग्राम मातोली खिरमाण्डे, गंगोलीहाट क्षेत्र,
शिक्षा :- एम ए (इतिहास), एम बी ए, एल एल बी 
कार्यक्षेत्र :- इंजिनियरिंग एम एन सी नोयडा 
वर्तमान निवास : बदरपुर नई दिल्ली 
संपर्क : 9990993069
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