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mostamanu temple

 

उत्तराखंड एवं हिमाचल या यूँ कहो कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के सभी राज्यों में, घने पहाड़ों में ऐसी-ऐसी जगह छिपी हुई हैं कि अगर ऑफबीट जगह पर घूमने निकले तो कहीं-कहीं तो छोटे से शहर में भी महीने कम पड़ जाए। हालाँकि आज उत्तराखंड के जिस मंदिर की हम बात कर रहे हैं वो पर्यटकों की सबसे फेवरेट जगह 'पिथौरागढ़ ' में ही हैं। पर्यटक जब मुनस्यारी हिल स्टेशन जाते हैं तो कभी कभार पिथौरागढ़ रुक जाते हैं। 

मेरा पिथौरागढ़ कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान 2018 में जाना हुआ था। जिन साथियों ने पुस्तक 'चलो चले कैलाश ' पढ़ी हैं, तो उसमे मैंने बताया हुआ था कि हम लोगों का पूरा यात्रा कार्यक्रम बिगड़ चुका था और हमें अतिरिक्त 11 दिन तक उत्तराखंड में ही अलग अलग जगह रुकना था एवं पिथौरागढ़ से लिपुलेख दर्रे तक के रास्ते टूटे हुए थे तो हमें पिथौरागढ़ के नैनी सैनी हवाई अड्डे (आर्मी हवाई अड्डा, 2018) से  आर्मी हेलीकाप्टर में गुंजी तक ले जाया गया। किताब के एक चेप्टर में मैंने इस मंदिर के ट्रैक का भी जिक्र किया था। अभी हाल ही में 'चलो चले कैलाश ' की कुछ अशुद्धियाँ दूर करने के दौरान मुझे याद आया कि काफी पाठकों ने कहा था कि इसमें इस ट्रैक की जानकारी काफी कम लिखी हुई हैं। तब मैंने सोचा कि क्यों ना इस पर एक आर्टिकल ही लिख दिया जाए।   

हम आज बात कर रहे हैं उत्तराखंड के एक लोकदेवता के मंदिर की। ना ना, हम गोलू देवता की नहीं, बल्कि वर्षा के देवता कहे जाने वाले 'मोस्टा देवता ' की बात कर रहे हैं। गोलु देवता के बारे में तो आपने सुना ही होगा लेकिन मोस्टा देवता के बारे में काफी कम लोग जानते हैं। पिथौरागढ़ शहर से करीब 6 -7 किमी दूर स्थित चंडाक में स्थित हैं -मोस्टमानु मंदिर । 

 

मंदिर तक पहुंचने के हैं दो मार्ग : 

इस दूरी तक आप अपना वाहन ले जाकर भी जा सकते हैं या फिर मैं तो आपको यहाँ तक पैदल ट्रेक करके जाने की एडवाइस दूंगा। 2018 में पैदल ट्रेक के दौरान  मोस्टामानु मंदिर तक पहुंचने के लिए हमारे बैच को शहर से बाहर की तरफ जाती हुई सड़को से वीरान पड़े हुए पहाड़ी रास्तो से होकर गुजरना पड़ा था। हमारे साथ मे रास्ता बताने के लिए एवं हमारी मदद के लिए पुलिस के कुछ नौजवान भी हमारे साथ थे। कुछ दूरी तक पक्के बने हुए रोड से टहलते हुए हम उन वीरान पहाड़ी रास्तो एवं पगडंडियों तक पहुंचे,जहा एक बंद क्षतिग्रस्त फैक्ट्री भी एक दूसरी पहाड़ी पर बनी हुई दिखाई दे रही थी। इन वीरान रास्तों के बाद फिर हम लोग पक्के रास्तो पर पहुंचे,जहाँ शहर की सबसे ऊँची जगह पर बहुत ही खूबसूरत रेस्टॉरेंट था। रेस्टॉरेंट के बाहर चारो तरफ से खुले प्रांगण मे हमने कॉफी पी थी। यह क्षेत्र एकदम शांत क्षेत्र होने के कारण कई लोकल दोस्तों का ग्रुप ,कपल यहाँ घूमते फिरते दिख जाएंगे। यहाँ से आगे का रास्ता बड़े बड़े देवदार के पेड़ो से पूरी तरह आच्छादित था,यहाँ इस अस्थायी रास्ते मे घने पेड़ो के कारण उजाला काफी कम था,ऊपर देखने पर आसमान भी नहीं दिखाई दे, इस तरह के जंगली रास्तो से होते हुए करीब एक घंटे में ही हम मंजिल के सामने थे। 

masta manu temple


परियों की कथाओ में सुनाये जाते इलाके जैसी हैं रास्ते की खूबसूरती -

पैदल ट्रैक यहाँ इसीलिए करके आना चाहिए क्योंकि रास्तों में जो कुछ 2 -4 किलोमीटर का देवदार के वृक्षों से भरा क्षेत्र आता हैं, उसकी खूबसूरती ही यहाँ देखने लायक हैं। बारिश के समय जब इस वृक्षों के साथ साथ यहाँ कोहरा जमा हुआ रहता हैं तो यह जगह कोई काल्पनिक जादुई जगह से कम नहीं लगती। जैसे ही आप अपनी मंजिल के करीब पहुंचेंगे एक विशाल खूबसूरत गोल्डन दरवाजा जो कि राजस्थान से लाये गए पत्थरों से बना हैं, आपका स्वागत करेगा। इसके दोनों ओर दुर्गा माता की सवारी शेर की बड़ी बड़ी मूर्तियां लगायी गयी हैं। इसमें प्रवेश करते ही एक और विशाल सफ़ेद रंग का दरवाजा मिलेगा जिसके आगे मंदिर साफ़-साफ़ नजर आएगा। मुख्य मंदिर एक विशाल वृक्ष के नीचे बना हुआ हैं, जिसमें मोस्टा देवता के अलावा कई हिन्दू देवी-देवताओं की भी पूजा होती हैं। मंदिर का परिसर काफी विशाल और हरा भरा हैं, जहाँ से पिथौरागढ़ शहर और बर्फीली पहाड़ियों का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। पर्यटकों को पता ना होने के कारण यहाँ ज्यादा भीड़ नहीं मिलती, तो पिथौरागढ़ में प्रकृति के साथ अगर आपको शांत वातावरण में कुछ समय एकदम अकेले बिताना हैं, तो यह जगह एकदम उचित हैं।    


नेपाल से जुड़ी हैं यहाँ की लोककथा, करें दर्शन पशुपतिनाथ मंदिर के, पर जरा सम्भल के, क्योंकि....

मंदिर से जुड़ी कई किवंदतिया प्रचलित हैं। कुछ कथाएं इसका सम्बन्ध नेपाल के व्यापारी से जोड़ती हैं, जिनके शरीर में इस स्थान पर मोस्टा देवता प्रवेश किया था, तो वही कुछ लोगों के हिसाब से नेपाल के व्यापारी के सपने में मोस्टा देवता आये और उनसे यहाँ मंदिर बनवाने को कहा। कुछ के हिसाब से नेपाल के एक मोस्टमानु नाम के संत ने यहाँ मंदिर की स्थापना एक लिंग रूप में की थी। नेपाल से जुड़ी हुई बात आयी तो, बता दूँ कि इसी मंदिर के पास ही एक छोटी पहाड़ी  पशुपतिनाथ मंदिर भी बना हैं। इस मंदिर तक एक पगडंडी पर से चढ़ करके जाना होता हैं। लेकिन इस मंदिर तक पहुंचने तक आपको सम्भल सम्भल कर जाना होगा क्योकि यहाँ मिलती हैं छोटी-छोटी जोंक (लीच), जो कि शरीर पर कही भी चिपक कर खून चूसने लग जाती हैं और आपको इसका पता काफी देर बाद लगता हैं। जब हम 2018 में यहाँ गए थे जो पशुपतिनाथ मंदिर के ट्रैक तक तो काफी कम जोंक थी लेकिन मंदिर के अंदर जैसे ही हमने प्रवेश किया हमारे पैरों पर कई जोंके चिपक गयी। इसी चक्कर में हम मुश्किल से एक दो मिनट ही मंदिर में रुके और भाग आये। 

 

साल में एक बार लगने वाले मेले में श्रद्धालु यह कोशिश करते हैं -

अगस्त-सितम्बर महीने में ,हर साल एक बार यहाँ दो दिवसीय भव्य मेला लगता हैं। जिसमे जिले को गौरवान्वित करने वाले शख्सों को सम्मानित किया जाता हैं। इस मंदिर में पत्थर भी रखा हैं ,जो दिखने में ज्यादा बड़ा नहीं हैं ,लेकिन उसे उठाना आसान नहीं हैं। माना जाता हैं ,यह पत्थर पत्थर चमत्कारी हैं एवं विशेष कृपा वाले लोग ही इसे उठा पाते हैं। मेले के दौरान सैकड़ों लोग इसे उठाने की कोशिश करते हैं। मोस्टा देवता को नाग देवता भी माना जाता हैं। नागपंचमी के दिन जो लोग नागदेवता की पूजा नहीं करते, वे लोग मेले के दौरान इनकी पूजा करने आते हैं।   

कैसे पहुंचे : यहाँ से नजदीकी रेलवे स्टेशन टनकपुर स्टेशन हैं जो कि 140 किमी की दूरी पर हैं। हवाईमार्ग से पहुंचने के लिए पंतनगर हवाई अड्डा, 240 किमी की दूरी पर हैं। हालाँकि पिथौरागढ़ के नैनी सैनी हवाईअड्डे से भी कुछ सिविल फ्लाइट्स 2019 से शुरू हो गयी हैं।   


अन्य नजदीकी दर्शनीय स्थल : चौकोरी ,पाताल भुवनेश्वर मंदिर, बेड़ीनाग मंदिर, गंगोलीहाट, पिथौरागढ़ किला। 


लेख - ऋषभ भरावा


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