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दानपुर का एक खूबसूरत गाँव : खाती।

नंदाकोट हिमालय की तलहटी पर बसे वर्तमान जनपद बागेश्वर के आधे भू-भाग को ब्रिटिश राज में दानपुर परगना बनाया गया। दानपुर परगना तीन पट्टियों तल्ला दानपुर, मल्ला दानपुर और बिचला दानपुर में विभाजित था। वर्तमान में भी इन इलाकों को इन्हीं पट्टियों के नाम से जानते हैं। दानपुर परगना को ब्रिटिश कमिश्नर ट्रेल द्वारा बनाया गया था। यहाँ की दनपुरिया बोली कुमाऊंनी भाषा की प्रमुख बोलियों में से एक है। इस इलाके को दानपुर नाम क्यों दिया गया ? आईये जानते हैं राज्यपाल एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित से०नि० शिक्षक श्री दीवान सिंह दानू जी से -   
ब्रिटिश काल में बागेश्वर जनपद के आधे भाग को परगना दानपुर कहते थे। ब्रिटिश कमिश्नर ट्रेल के समय दानपुर परगना बनाया गया था और यह 14 पट्टी दानपुर के नाम से जाना जाता था। दानू लोगों के अधिसंख्य होने के कारण इस क्षेत्र का नाम दानपुर पड़ा। कहा जाता है कि बदियाकोट में स्थित आदिबद्री पीठ की स्थापना में दाणू (दानू) उपजाति के पुरुषों के हाथों हुआ था। गढ़वाल के बंड नामक स्थान में मृग के वेश में पीछा करते हुए जो दो पुरूष बदियाकोट तक आये थे, वे दाणू लोगों के पूर्वज थे। वे दोनों पुरूष आदिबद्री भगवती के आदेशानुसार बदियाकोट नामक स्थान में बसकर मां की पूजा अर्चना करने लगे थे।
कालान्तर में दाणू लोगों की संख्या बढ़ गयी व हिमालय की तलहटी वाले विशाल भू-भाग मे फैल गये। कुमाऊं के इतिहास में पं बद्रीदत्त पांडे जी ने पं रामदत्त त्रिपाठी जी के पुस्तक के आधार पर लिखा है कि पुराकालीन संवत् 2914 से 2950 तक एक भारद्वाज गोत्रीय क्षत्रिय दाणू कुमेर सेन का राज्य था। बैजनाथ के पास गोमती किनारे उसका महल था। 81 साल की उम्र में दानपुर क्षेत्र में आखेट करते समय उनकी मृत्यु हो गयी। उसका उत्तराधिकारी रणजीत सिंह राजा बना। उसी समय कत्युरी सम्राट वासुदेव के पुत्र राजा आसन्ति देव जोशीमठ से नृसिंह देवता के शाप से जोशीमठ से कत्यूर आये। शत्रु को आते देख रणजीत सिंह ने धर्म युद्ध के लिए कहा। कत्यूरी राजा ने चालाकी से काम लिया। गोमती के किनारे मोष्ठे बिछाये गये। उनके नीचे रीठे के दाने डाल दिये। दोनों में मल्ल युद्ध हुआ। रणजीत सिंह हार गये। उसे मल्ला महल नामक स्थान पर आजीवन पेंशन दे दी। राजा आसन्ति जीते और राजा बन गये।  रणजीत सिंह की 57वर्ष की आयु मेें निधन हो गया।

तैलीहाट में कत्यूरी राजा ने राजधानी बनाई। दाणू लोग हिमालय की तलहटी के गांवों की ओर चल दिये। इसीलिए दानू लोग अधिकतर हिमालय के समानान्तर कीमू, झूनी, खाती, वाछम, सोराग, तीख, डौला, बदियाकोट, किलपारा, बोरा, समडर, भराकाने, कुवारी, हेमनी, घेस, बलड़ा, तोरती, बाण, मंदोली, सुतौल,  देवाल आदि गांवों में रहते हैं लेकिन मूल स्थान बदियाकोट माना जाता है।
बदियाकोट (दानपुर) आदिबद्री माँ भगवती धाम। 

दानू, देव, सोरागी, वाछमी सभी दानू परिवार के लोग ही है।
दानू लोग अधिकांश फौज में रहे और अभी भी हैं। वीर चक्र विजेता दीवान सिंह दानू थल के थे। उनके नाम से रानीखेत मे दीवान सिंह हाॅल बना है। आजादी के बाद प्रथम सूबेदार बनने वाले भी आर०सी० स्व० हरीशचंद्र सिंह दानू जी बदियाकोट के निवासी थे। उन्हें कत्यूर में जागीर मिली थी। राजनीति के क्षेत्र में स्व शेर सिह दानू जी थराली से विधायक बने थे। शैक्षिक,अर्द्धसैनिक बल व अन्य क्षेत्र मे भी दानू लोग काफी आगे हैं। दानू लोगों ने जो तरक्की की वे उनकी मेहनत ईमानदारी व सत्यनिष्ठा के बबल पर ही मिली। क्योंकि ये क्षेत्र अति दुर्गम व बीहड़ रहे हैं। अपने पुरूषार्थ व मेहनत व पशुपालन के जरिये ये लोग आगे बढ़े व भविष्य में भी देश व समाज सेवा में अग्रेत्तर रहेंगे।


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