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सरयू एवं गोमती नदी के संगम पर स्थित बागेश्वर मूलतः एक ठेठ पहाड़ी कस्बा है। परगना दानपुर के 473, खरही के 66, कमस्यार के 166, पुँगराऊ के 87 गाँवों का समेकन केन्द्र होने के कारण यह प्रशासनिक केन्द्र बन गया। मकर संक्रान्ति के दौरान लगभग महीने भर चलने वाले उत्तरायणी मेले की व्यापारिक गतिविधियों, स्थानीय लकड़ी के उत्पाद, चटाइयाँ एवं शौका तथा भोटिया व्यापारियों द्वारा तिब्बती ऊन, सुहागा, खाल तथा अन्यान्य उत्पादों के विनिमय ने इसको एक बड़ी मण्डी के रूप में प्रतिष्ठापित किया। 1950-60 के दशक तक लाल इमली तथा धारीवाल जैसी प्रतिष्ठित वस्त्र कम्पनियों द्वारा बागेश्वर मण्डी से कच्चा ऊन क्रय किया जाता था।

पुरा कथाओं में भगवान शिव के बाघ रूप धारण करने वाले इस स्थान को व्याघ्रेश्वर तथा बागीश्वर से कालान्तर में बागेश्वर के रूप में जाना जाता है। स्कन्द पुराण के अन्तर्गत बागेश्वर माहात्म्य में सरयू के तट पर स्वयंभू शिव की इस भूमि को उत्तर में सूर्यकुण्ड, दक्षिण में अग्निकुण्ड के मध्य (नदी विशर्प जनित प्राकृतिक कुण्ड से जिसे त्रिवेणी भी कहा जाता है) सीमांकित कर पापनाशक तपस्थली तथा मोक्षदायक तीर्थ के रूप में धार्मिक मान्यता प्राप्त है। 

ऐतिहासिक रूप से कत्यूरी राजवंश काल से (7 वीं सदी से 11 वीं सदी तक) सम्बन्धित भूदेव का शिलालेख इस मन्दिर तथा बस्ती के अस्तित्व का प्राचीनतम गवाह है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन् 1602 में राजा लक्ष्मी चन्द ने बागनाथ के वर्तमान मुख्य मन्दिर एवं मन्दिर समूह का पुनर्निर्माण कर इसके वर्तमान रूप को अक्षुण्ण रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने बागेश्वर से पिण्डारी तक लगभग 45 मील (70 किमी.) लम्बे अश्व मार्ग के निर्माण द्वारा दानपुर के सुदूर ग्राम्यांचल को पहुँच देने का प्रयास भी किया। स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्व सन् 1847 में  इ. मडेन द्वारा बाह्य जगत को हिमालयी हिमनदों की जानकारी मिलने के बाद पिण्डारी ग्लेशियर को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली और बागेश्वर विदेशी पर्यटकों एवं पर्वतारोहियों का विश्रामस्थल भी बना।

19वीं सदी के प्रारम्भ में बागेश्वर आठ-दस घरों की एक छोटी सी बस्ती थी। सन् 1860 के आसपास यह स्थान 200-300 दुकानों एवं घरों वाले एक कस्बे का रूप धारण कर चुका था। मुख्य बस्ती मन्दिर से संलग्न थी। सरयू नदी के पार दुग बाजार और सरकारी डाक बंगले का विवरण मिलता है। एटकिन्सन के हिमालय गजेटियर में वर्ष 1886 में इस स्थान की स्थायी आबादी 500 बतायी गई है। सरयू और गोमती नदी में दो बडे़ और मजबूत लकड़ी के पुलों द्वारा नदियों के आरपार विस्तृत ग्राम्यांचल के मध्य आवागमन सुलभ था। अंग्रेज लेखक ओस्लो लिखते है कि 1871 में आयी सरयू की बाढ़ ने नदी किनारे बसी बस्ती को ही प्रभावित नहीं किया, वरन् दोनों नदियों के पुराने पुल भी बहा दिये। फलस्वरूप 1913 में वर्तमान पैदल झूला पुल बना। इसमें सरयू पर बना झूला पुल आज भी प्रयोग में है। गोमती नदी का पुल 70 के दशक में जीर्ण-क्षीर्ण होने के कारण गिरा दिया गया और उसके स्थान पर नया मोटर पुल बन गया।

प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व,सन् 1905 में अंग्रेजी शासकों द्वारा टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाईन का सर्वेक्षण किया गया, जिसके साक्ष्य आज भी यत्र-तत्र बिखरे मिलते हैं। विश्व युद्ध के कारण यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई और बाद के योजनाकारों द्वारा पूरी तरह विस्मृत कर दी गयी। 1980 के दशक में श्रीमती इदिरा गांधी के बागेश्वर आगमन पर उन्हें इस रेलवे लाईन की याद दिलाई गई। अब जाकर, क्षेत्रीय जनता द्वारा किये गये लम्बे संघर्ष के उपरान्त आखिरकार टनकपुर-बागेश्वर रेलवे लाईन के सर्वेंक्षण को राष्ट्रीय रेल परियोजना के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

वर्ष 1921 के उत्तरायणी मेले के अवसर पर कुमाऊँ केसरी बद्रीदत्त पाण्डे, श्याम लाल साह, विक्टर मोहन जोशी, राम लाल साह, मोहन सिह मेहता, ईश्वरी लाल साह आदि के नेतृत्व में सैकड़ों आन्दोलनकारियों ने कुली बेगार के रजिस्टर बहा कर इस कलंकपूर्ण प्रथा को समाप्त करने की कसम इसी सरयू तट पर ली थी। पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों का राष्ट्रीय आन्दोलन में यह योगदान था, जिससे प्रभावित हो कर सन् 1929 में महात्मा गांधी स्वयं बागेश्वर पहुँचे। तभी विक्टर मोहन जोशी द्वारा उनके कर कमलों से स्वराज मंदिर का शिलान्यास भी करवाया गया।
बींसवी सदी के प्रारम्भ में यहाँ औषधालय (1906) तथा डाकघर (1909) की तो यहाँ स्थापना हो गयी, तथापि शिक्षा का प्रसार यहाँ विलम्बित रहा। 1926 में एक सरकारी स्कूल प्रारम्भ हुआ, जो 1933 में जूनियर हाईस्कूल बना। आजादी के बाद 1949 में स्थानीय निवासियों के प्रयास से विक्टर मोहन जोशी की स्मृति में एक प्राइवेट हाइस्कूल खुला, जो कि 1967 में जा कर इण्टर कालेज बन सका। महिलाओं के लिए पृथक प्राथमिक पाठशाला 50 के दशक में खुली और पृथक महिला सरकारी हाईस्कूल 1975 में। 1974 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा द्वारा राजकीय डिग्री कालेज का उद्घाटन किया गया।

बालीघाट में स्थापित 25 किलोवाट क्षमता वाले जल विद्युत संयंत्र से उत्पादित बिजली से 1951 में बागेश्वर पहली बार जगमगाया। वर्षा काल में नदियों में नदियों के गंदले पानी से निजात पाने के लिए टाउन एरिया गठन के उपरान्त राजकीय अनुदान तथा स्थानीय लोगों के श्रमदान से नगर में शुद्ध सार्वजनिक पेयजल प्रणाली का शुभारम्भ हुआ। 1952 में अल्मोडा से वाया गरुड़ मोटर रोड बागेश्वर पहुँची। क्षेत्रीय निवासियों के श्रमदान से निर्मित बागेश्वर-कपकोट मोटर मार्ग में बस सेवा का संचालन 1955-56 के बाद प्रारम्भ हो पाया। 1962 में चीन युद्ध के बाद सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बागेश्वर-पिथौरागढ़ सड़क 1965 में बनकर तैयार हो गई। सत्तर के दशक में बागेश्वर से अल्मोड़ा के लिये वाया ताकुला एक वैकल्पिक रोड बनी तो अस्सी के दशक में बागेश्वर-चौंरा-दोफाड़ रोड पर आवागमन शुरू हुआ। तहसील मुख्यालय बनने के बाद तो आसपास गाँवों के लिये अनेक मोटर मार्गो का निर्माण प्रारम्भ हुआ। जनपद मुख्यालय बनने के उपरान्त तो नगर के समीपवर्ती भागों में स्थापित कार्यालयों, न्यायालय आदि के लिए भी सम्पर्क मार्ग बनने लगे।

नगरीय विकास के प्रारम्भिक चरण में बागेश्वर की केन्द्रीय बस्ती 9 छोटे-छोटे, परस्पर गुँथे हुए गाँवों के समूह के रूप में थी, जिसमें तीन गैर आबाद (बाड़ी गूँठ, चैरासी गूँठ एवं ट्ठाली) तथा 6 आबाद गाँव (ज्यूला, भिटालगाँव, चैरासी गूँठ केदार, घटबगड़, कत्यूरमढ़ तथा बिनवाल तिवारी) थे। अंग्रेजी शासन काल में मकर संक्रान्ति के दिन लगने वाले उत्तरायणी मेले की व्यवस्था के साथ अन्यान्य स्थानीय समस्याओं का प्रबंधन किया जाता था। 1948 में इन गाँवों को मिला कर बागेश्वर के नाम से ग्राम सभा का गठन हुवा। 1951 की जनगणना में ग्राम सभा बागेश्वर की कुल आबादी 1,740 और घरों की संख्या 314 थी। तब यह कांडा विकास खण्ड का हिस्सा था, जो कालान्तर में बागेश्वर विकास खण्ड के रूप में परिवर्तित हो गया।

1955 में बागेश्वर को टाउन एरिया कमेटी, 1962 में नोटिफाइड एरिया कमेटी तथा 1968 में नगरपालिका का दर्जा मिला। 1961 की जनगणना के विवरण के अनुसार टाउन एरिया, बागेश्वर का क्षेत्रफल 134 एकड़, मकानों की संख्या 319, कुल परिवार 333 तथा जनसंख्या 2,189 थी। 1971 की जनगणना के अनुसार बागेश्वर में 4,314, 1981 में 4,225 एवं 1991 में 5,772 की आबादी थी। पूर्ण जनपद बनने के उपरान्त नगर क्षेत्र की आबादी का आँकड़ा 10,000 से ऊपर पहुँच चुका है।

नगर की केन्द्रीयता, बढ़ती सुविधाओं, क्षेत्रीय विस्तार एवं जन आंकाक्षाओं को देखते हुए 1974 में बागेश्वर को पृथक तहसील बनाया गया और 1976 में इसको परगना घोषित किया गया, जिससे यह औपचारिक रूप से बृहद प्रशासनिक केन्द्र के रूप में अस्तित्व में आया। सन् 1985 से ही विभिन्न दलों एवं क्षेत्रीय जनता के इसे पृथक जिला घोषित करने की माँग शुरू हुई और अन्ततः सितम्बर 1997 को मुख्यमंत्री मायावती द्वारा बागेश्वर को तत्कालीन उत्तर प्रदेश का नया जनपद बना दिया गया। जिला मुख्यालय बनने के बाद बागेश्वर नगर के आकार एवं विस्तार को अत्यधिक गति मिली। प्रशासनिक, पुलिस, न्याय, सिंचाई, सड़क निर्माण, स्वास्थ्य आदि अनेक सरकारी एवं गैर सरकारी कार्यालय खुले। आवासीय कालोनियाँ बनीं। ग्राम्यांचल से नगर की ओर जनसंख्या के निरंतर आव्रजन के परिणामस्वरूप आवासीय दबाव में वृद्धि हुई है। वर्तमान में मुख्य नगर क्षेत्र (2.02 वर्ग किमी.) के चारों ओर तीव्र बहिर्मुखी नगरीय प्रसार ने आवासीय एवं गैर आवासीय विस्तार को नजदीकी पहाडि़यों के आसपास पहुंचा दिया है, फलस्वरूप आज का बागेश्वर 6.1 वर्ग किमी. से अधिक  क्षेत्रफल एवं 50 हजार से अधिक जनसंख्या वाले नगर का रूप ले चुका है। सूर्यकुण्ड से तहसील तथा मोटर स्टेशन से गाड़गाँव तथा नदीगाँव तक 6 किमी. लम्बी बाजार में लगभग ढाई हजार दुकानें इसके बढ़ते आकार की परिचायक हैं।

मगर विगत डेढ़ दशक के अनियंत्रित एवं अनियोजित नगरीकरण ने बागेश्वर की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को झकझोरा भी है। अधिकांश कस्बों की भाति यहाँ भी आर्थिक समृद्धि के प्रतीक सेरों (नदी किनारे की समतल, विस्तृत एवं उवर्रक कृषि भूमि) का कृषि से इतर अन्यान्य, मुख्यतः आवासों में रूपान्तरण भूदृश्य के सौन्दर्यबोध में चोट पहुँचाने के साथ पारिस्थितिकी तंत्र पर गम्भीर दुष्परिणामों का संकेत देता है। कभी पूरे नगर को स्वच्छ पेयजल प्रदान करने वाला एकमात्र, मण्डलसेरा के दक्षिण में स्थित, नौला अपनी अन्तिम घड़ियाँ गिन रहा है। मेरे शोधकार्य के निष्कर्षों के अनुसार 1971 से 2011 तक के चालीस 40 वर्षो में उत्तराखण्ड के सेरों में विख्यात 1.06 वर्ग किमी. (107 हैक्टेयर अथवा 207 एकड़) क्षेत्रफल वाले मण्डलसेरा की लगभग 40 प्रतिशत, सैंज का सेरा (47 एकड़) की 65 प्रतिशत, नदी गाँव (45 एकड़) की 25 प्रतिशत तथा सूर्यकुण्ड के समीप (18 एकड) कृषि भूमि का 70 प्रतिशत हिस्सा कृषि उपयोग से वंचित किया जा चुका है। भू उपयोग इसी खतरनाक दर से बदलता रहा तो सूर्यकुण्ड अगले दस वर्ष, सैंज का सेरा 15 वर्ष तथा नदी गाँव 25 वर्षों में समाप्त हो जायेंगे। सन् 2050 तक मण्डलसेरा भी अस्तित्वहीन हो जायेगा।


सदानीरा सरयू एवं गोमती के जल स्तर में निरन्तर गिरावट, नदियों के बगड़ व वेदिकाओं पर उपखनिजों का अनियंत्रित खनन तथा मानवीय अतिक्रमण और सौन्दर्यीकरण के नाम पर नदियों का नालों में रूपान्तरण बागेश्वर के भविष्य के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकता है। घटबगड़ के घराट तथा बान और सिंचाई के लिए बनी गूलें अतिक्रमण की चपेट में गुम हो चुके हैं। बहुतायत से पैदा होने वाले फल, आम, अमरूद, केले और नाशपाती के बगीचे, जो बागेश्वर को बागों का शहर बनाते थे, अब कहीं दिखाई नहीं देते। विशिष्ट भूभौतिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास न होने से जल आपूर्ति, मल निष्कासन, ठोस अपशिष्ट प्रबन्धन, जल एवं वायु प्रदूषण आदि समस्यायें स्थायी बन चुकी है। ट्रैफिक जाम जैसी समस्यायों को देख कर आशंका होती है कि अनियोजित नगरीकरण की यह प्रवृत्ति भूतनाथ की इस नगरी को एक मलिन बस्ती में तब्दील न कर दे। जरूरत इस बात की है कि स्थानीय पर्यावरण एवं परिस्थितियों के अनुरूप टिकाऊ विकास की एक दीर्घकालिक महायोजना इस नगर के लिए तुरन्त बनायी जाय।


(लेखक के पिता ईश्वरी लाल साह बागेश्वर ग्राम सभा के प्रथम निर्वाचित सभापति, प्रथम ब्लाॅक प्रमुख तथा टाउन एरिया के प्रथम अध्यक्ष रहे। उनसे प्राप्त सूचनाएँ इस लेख के लिए उपयोगी सि़द्ध हुईं।)
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 **लेखक :-श्री जी. एल साह जी (प्रोफेसर कुमाँऊ वि०वि० नैनीताल) के ब्लॉग से ...🌿



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