हर्याव त्यार-पर्यावरण कैं समर्पित उत्तराखण्ड क लोकपर्व


Harela-festival-of-Uttarakhand
Harela Festival Wishes - हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनायें। 

हमर उत्तराखण्ड पर्यावरण प्रति संवेदनशील शुरू बटी छू। यां भौत यास त्यार छन जो पुरै पर्यावरण कैं समर्पित छन। हरयाव/हर्याव यानि हरेला त्यार उनन में एक छु। य त्यार यां सम्पन्नता, हरयाळी, पशुपालन और जंगल क संरक्षण सन्देश दीं। 

उत्तराखण्ड में सौंण महैण क १ पैट हर्याव त्यार बड़ै ख़ुशी दगाड़ मनाई जां। य दिन बारिश ऋतु क स्वागत पर्व ले छु। आज क दिन मैस आपण घर क आसपास, खाली खेतन में डाव-बोट लगुनि। माटाक शिव-पारवती ज्यू कि डिकार बणाई जनि। उनन में बढ़िया रंग भरी बेर य दिन उनरी पुज करी जां। 

हर्याव शब्द क मतलब छु चारों तरह हर्याव यानि हरयालि। हर्याव वे नौ दिन पैली यैकि शुरुवात हर्याव ब्वैण बटी है जां। एक रिंगाल क टुपर में माट भरि बेर ऊमें सात प्रकार क नाज (अनाज ) बोई जां। उ नाज छान ग्युं, जौ, घौत, घ्वाक, जड़ी, भट और मास। य तुपर कैं घर में मंदिर क आसपास धरी जां। रोज रत्ती-ब्याल पूज पाठ क टैम में य हर्याव क टुपर में पाणि डाली जां। घाम बटी दूर धरीं जां यैकेँ। नौउं दिन यैकि एक लकड़लै गुड़ाई करी जां। दसुं दिन यानि सौंण महैंण एक पैट काटि जां। धूप, दी जगै बेर आपण ईष्ट देवों कैं हर्याव चढ़ाई जां। फिर घर कि सयाणी सैणी (महिला) द्वारा सबै लोगन कैं हर्याव पूजि जां। दुए (दोनों) हाथों में हर्याव क तिनाड़ पकड़ि बेर सबसे पैली खूटन में छुई जां, वी बाद घुनान में, फिर नौर (कंधे) में और आंखरी में यो हर्याव क तिनाड़न कैं ख्वार में धरि जां। हर्याव पूजते हुए यो आशीर्वचन दीं जां -

लाग हर्याव, लाग दशैं, लाग बग्वाव। 
जी रये, जागि रये, य दिन,य  महैंण कैं भ्यटनै रये। 
स्याव जसि बुद्धि है जौ, स्युं जस तराण ऐ जौ। 
घरती जस चाकव, आकाश जस उच्च है जाये। 
दुबकि जस जड़, पाती क जस पौव है जौ। 
हिंवाव में ह्युं छन तक, गंगज्यू में पाणी छन तक 
जी रये, जागि रये। 

हर्याव पूजि बेर सबै परिवार क लोग एक दगाड़ त्यार में बनि पकवान क आनंद लीनै।  यो दिन मासक बेडु पुरी, बाढ़, हल्लू, खीर आदि विशेष रूपल बनाई जानै। आपण जानवरों कैं खूब हरीं घा (घास) खिलाई जां। त्यार खै बेर लोग आपण-आपण जाग में अलग-अलग प्रकारक डाव -बोट सरूनी। जै मैं विशेष रूपल बांज, फल्यांट, अखोड़, पांगर, नारींग, माल्टा आदि शामिल हुनै। लोग आपण बाड़न में क्याव क बोट ले सरुनै। कुमाऊँ अंचल में डाव-बोट लगुणेकि यो परम्परा सदियों बटि चली ऊँण। हमार बुब, बूड़ बुबु द्वारा लगैई बोटनक फल कैं आज हमि खांणी,  उसी कै हमींन ले आज आपण नाती-पोथों तैंकि बोट लगूँण छन। य बात कहते हुए हमर ईजा-बौज्यू हमींन कैं डाव-बोट लगूँण कि लिजी प्रेरित करनै। 

हर्याव त्यार भल खेती क ले सूचक छु। हर्याव बोते हुए ईष्ट देवों कैं भल खेती, भल उपजकि लिजी कामना करीं जां। मान्यता छु जो साल हर्याव जदु भल और ठुल होल  उ साल उदूकै भलि खेती और पैदावार होलि। 

आज जंगव कम है ग्यान। बारिश टैम पर न हुनैई। कत्ति बाढ़ छु और कत्ति सुख पड़ि रौ। ग्लेशियर गई ग्यान। गाड़ में पाणि न्हैति। यो सब कारण छु पर्यावरण असंतुलन क। जै कि भरवाई लिजी हमर पुरुखों लै हर्याव जस त्यार बणै रखीं, जै दिन पेड़-पौध लगूँणकि अनिवार्यता छु। आज हर्याव जस त्यारन कि जरुरत छु। जो सामाजिक हित में हो। हर प्राणी क हित में हो। तो देर किलै यो हर्याव (हरेला)  त्यार पर आपण आसपास पेड़-पौधानक रोपण अवश्य करिया। तबै हर्याव त्यार कि सार्थकता पुरि होलि। 

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