उत्तराखंड की कुमाऊंनी होली अपने अनूठे अंदाज के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है। यहाँ होली सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि दो महीने तक चलने वाला भक्ति और संगीत से परिपूर्ण एक विशेष उत्सव है।
जिसकी शुरुआत पौष महीने के प्रथम रविवार से होती है। जिसमें विभिन्न रागों के साथ हारमोनियम, मजीरे और ढोलक की संगीतमयी संगत के साथ होली गीतों को गाया जाता है।
यह होली बैठकी होली कहलाती है। जिसमें 5 से 7 या इससे अधिक लोग किसी विशेष स्थान (मंदिर या सार्वजनिक स्थल ) पर एकत्रित होकर श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्ति और प्रेम से परिपूर्ण होली गीतों को गाते हैं।
इस दौरान पौष माह से प्रारम्भ हुई बैठकी होली में वसंत पंचमी से पहले दिन तक गाये जाने वाले गीतों में भक्ति रस की प्रधानता होती है।
इस होली को निर्वाण की होली कहा जाता है। बसंत पंचमी से शिवरात्रि तक अर्द्ध शृंगारिक होली गीत गाने की परम्परा है और उसके बाद शृंगारिक होलियां गाई जाती है।
फाल्गुन महीने की एकादशी को यहाँ एक विशेष परम्परा यानी चीर बंधन के साथ खड़ी होली की शुरुआत की जाती है और रंगों का प्रयोग प्रारम्भ हो जाता है।
उसके बाद होली गीतों को गाते हुए होल्यार पूरे गांव का भ्रमण करते हुए प्रत्येक घर पर जाते हैं। जहाँ उनका विशेष स्वागत किया जाता है।
हर घर द्वारा चीर की भेंट देकर अबीर-गुलाल चढ़ाया जाता है। होल्यारों को विभिन्न प्रकार के पकवान खिलाये जाते हैं।
पूर्णिमा की रात को निर्धारित लग्न में इस चीर का दहन किया जाता है। जिसे होलिका दहन भी कहा जाता है।
उसके अगले दिन छलड़ी मनाई जाती है। लोग जमकर होली खेलते हैं। दोपहर होते ही होली की आधिकारिक समाप्ति पर होल्यार अपने सफ़ेद कपड़ों को धोते हैं।
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